Home / सोच की जमीन

Category Archives: सोच की जमीन

Feed Subscription

अक्टूबर क्रांति के शताब्दि वर्ष में

अक्टूबर क्रांति के शताब्दि वर्ष में

आज की बात करने के लिये कल का जिक्र भी जरूरी है। शताब्दि भर पहले अल्बर्ट रीस विलियम ने लिखा था- ‘‘प्रतिक्रियावाद ने अपना मुंह खोल दिया था और वह उद्धत था।‘‘ यह 1917 के अक्टूबर क्रांति से ठीक पहले ...

Read More »

गांधी की औकात घट रही है

गांधी की औकात घट रही है

कभी आजादी की लडाई और आजादी के प्रतीक रहे गांधी जी की औकात मोदी सरकार के ‘स्वच्छता अभियान‘ में चश्में की हो गयी है। बड़े ही तरीके से उन्हें मारा जा रहा है। सोच और व्यक्तित्व के स्तर पर उन्हें ...

Read More »

हमारे पास न जेब होगी, न देश होगा

हमारे पास न जेब होगी, न देश होगा

2014 के आम चुनाव और उसके परिणाम को हमने कॉरपोरेट जगत के द्वारा सत्ता के अपहरण के नजरिये से ही देखा है। हम यह मानते रहे हैं, कि यह वैधानिक तख्तापलट है, जिसमें वॉलस्ट्रीट की निजी कम्पनियां, बैंक और देशी ...

Read More »

स्थगित लोकतंत्र

स्थगित लोकतंत्र

‘‘भारतीय राजनीति में क्या मोदी का कोई विकल्प है?‘‘ यह सवाल विपक्ष की ओर उछाला जाता है, और कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी को नरेंद्र मोदी के सामने खड़ा किया जाता है, यह प्रमाणित करने के लिये कि वे कमजोर ...

Read More »

लोकतंत्र यदि भारत है तो कोई खास बात नहीं – 2

लोकतंत्र यदि भारत है तो कोई खास बात नहीं – 2

प्रतिक्रियावादी ताकतें इस बात को अच्छी तरह जानती हैं, कि अंततः उनका वास्ता जनअसंतोष से ही पड़ेगा। आम जनता से लड़ाई उसे लड़नी होगी। ऐसी सरकारें यह भी जानती हैं, कि आम जनता का भरोसा जब तक बना रहेगा, सरकारें ...

Read More »

लोकतंत्र यदि भारत है तो कोई खास बात नहीं – 1

लोकतंत्र यदि भारत है तो कोई खास बात नहीं – 1

स्तम्भों को हिलाने की नीति- अपने राजनीतिक प्रतिद्वन्दी और विपक्ष को कुचलने की जैसी राजनीति भाजपा कर रही है, वैसी राजनीति भारतीय लोकतंत्र में पहले कभी नहीं की गयी। राजनीतिक एकाधिकार की उसकी सोच उस ओर बढ़ चुकी है जो ...

Read More »

वाम दलों की पीठ

वाम दलों की पीठ

देश में प्रतिक्रियावादी ताकतों ने निर्णायक बढ़त बना ली है। केंद्र में मोदी की कॉरपोरेट सरकार है, और राज्यों में भी भाजपा की सरकारें बनती जा रही हैं। राजनीतिक रूप से भाजपा ऐसी स्थितियां बना रही है, कि आने वाले ...

Read More »

पूंजीवाद – सदियों का हत्यारा – 3

पूंजीवाद – सदियों का हत्यारा – 3

(इस आलेख के लिये हमने मई दिवस को आधार बनाया था, किंतु लगा इतिहास को दुहराने से अच्छा है, जहां उसे रोका गया है, वहां से धक्का दें। उन ताकतों की पहचान जरूरी है, जिन्होंने इतिहास को रोका है।) हम ...

Read More »

पूंजीवाद – सदियों का हत्यारा – 2

पूंजीवाद – सदियों का हत्यारा – 2

(इस आलेख के लिये हमने मई दिवस को आधार बनाया था, किंतु लगा इतिहास को दुहराने से अच्छा है, जहां उसे रोका गया है, वहां से धक्का दें। उन ताकतों की पहचान जरूरी है, जिन्होंने इतिहास को रोका है।) ‘‘हम ...

Read More »

पूंजीवाद – सदियों का हत्यारा

पूंजीवाद – सदियों का हत्यारा

(इस आलेख के लिये हमने मई दिवस को आधार बनाया था, किंतु लगा इतिहास को दुहराने से अच्छा है, जहां उसे रोका गया है, वहां से धक्का दें। उन ताकतों की पहचान जरूरी है, जिन्होंने इतिहास को रोका है।) हम ...

Read More »
Scroll To Top