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Category Archives: सोच की जमीन

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दमन के छोटे-बड़े हथियार उठाती सरकार-3 (राष्ट्रवाद में घुला वित्तीय पूंजी का रंग)

दमन के छोटे-बड़े हथियार उठाती सरकार-3 (राष्ट्रवाद में घुला वित्तीय पूंजी का रंग)

किसके पास कितना राष्ट्रवाद है? यदि हम यह सवाल करें और विज्ञापन दें, तो पता चलेगा कि राष्ट्रवाद की इतनी गठरियां जमा हो गयी हैं, कि उन्हें रखने के लिये हमारे पास जगह नहीं है। भाजपा अपनी गठरी को सबसे ...

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दमन के छोटे-बड़े हथियार उठाती सरकार-2 (किसके पास कितना राष्ट्रवाद है?)

दमन के छोटे-बड़े हथियार उठाती सरकार-2 (किसके पास कितना राष्ट्रवाद है?)

राष्ट्रवाद पर जारी बहस में मोदी सरकार के द्वारा ‘राष्ट्रगान‘ और ‘राष्ट्रीय ध्वज‘ को भी शाामिल कर लिया गया। 10 अप्रैल को केंद्रिय गृह मंत्रालय के द्वारा राज्य सरकारों को एक फरमान जारी कर कहा गया है- ‘‘उसे राष्ट्र ध्वज ...

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दमन के छोटे-बड़े हथियार उठाती सरकार-1 (भारत में अघोषित आपातकाल नहीं)

दमन के छोटे-बड़े हथियार उठाती सरकार-1 (भारत में अघोषित आपातकाल नहीं)

कुछ लोगों को लगता है, कि ‘‘इस देश में अघोषित रूप में आपातकाल की शुरूआत हो गयी है।‘‘ उनको यह लगना, एक सीमा तक इसलिये जायज है, कि उनके पास सरकारी आतंक और दमन का और कोई दूसरा अनुभव नहीं ...

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सिर के बल चलती विकल्प की बहस

सिर के बल चलती विकल्प की बहस

बहस जारी है और लम्बी खिंच चुकी है। सवाल यह है- ‘‘क्या हमारे पास कोई विकल्प है?‘‘….. ‘‘यदि है, तो क्या? और नहीं है, तो हम बहस क्यों कर रहे हैं?‘‘ संघर्ष का विकल्प। सत्ता का विकल्प। विकल्प के रूप ...

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राष्ट्रवाद का हंथियार

राष्ट्रवाद का हंथियार

यदि सरकार काम करना चाहे तो, इस देश में काम की कोई कमी नहीं है। या कहिये दुनिया में कोई भी ऐसा देश नहीं है, जहां सरकारों के लिये काम की कमी हो। लेकिन अपने देश की आम जनता को ...

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जेएनयू मुद्दा, फासीवाद की शिनाख्त है – 2

जेएनयू मुद्दा, फासीवाद की शिनाख्त है – 2

आज हम देश की वर्तमान स्थितियों की बात करें, तो हिंसा, अस्थिरता और विभाजन समाज और हमारी सोच में है। आम आदमी डरा हुआ है। देशभक्ति बनाम देशद्रोही का खेल खेला जा रहा है। लोग यह सबक सीख रहे हैं, ...

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जेएनयू मुद्दा, फासीवाद की शिनाख्त है – 1

जेएनयू मुद्दा, फासीवाद की शिनाख्त है – 1

जेएनयू का मुद्दा इस देश में फासीवाद के होने की शिनाख्त करता है। इस बात की शिनाख्त करता है, कि भले ही इस देश में चुनी हुई सरकार है, मगर एक ऐसी समानांतर व्यवस्था, एक ऐसी समानांतर सरकार भी है, ...

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राज्य के वर्चस्व की पुर्नस्थापना का सवाल

राज्य के वर्चस्व की पुर्नस्थापना का सवाल

सोच की स्तर पर समाजवाद पूंजीवाद का विकल्प और समाज के विकास की उच्च अवस्था है। होना भी यही चाहिये। किंतु, संकट और संक्रमण के इस दौर में, -जब वैश्विक वित्तीय ताकतों ने निर्णायक बढ़त हासिल कर ली है, और ...

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दावोस के लोग

दावोस के लोग

दावोस में ‘वल्र्ड इकोनाॅमिक फोरम‘ का वार्षिक सम्मेलन हुआ। जिसमें आर्थिक मानदण्डों को पूरो करने वाले दुनिया भर के चुने हुए अमीर, वैश्विक वित्तीय इकाईयों एवं बैंकों के प्रमुख, अपने क्षेत्र के विशेष लोग, मीडिया के गिने-चुने लोगों सहित, ज्यादातर ...

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वित्तीय ताकतों ने समाज व्यवस्था की सूरतें बदल दी हैं

वित्तीय ताकतों ने समाज व्यवस्था की सूरतें बदल दी हैं

‘‘फाॅसिस्टवाद से हर मोर्चे पर लड़ने की जरूरत है, मगर हम कहीं भी खड़ा हो कर उससे लड़ नहीं सकते।‘‘ यदि आप भारत में हैं, तो यह सोचने की जरूरत भी पड़ेगी कि ‘‘वह मोर्चा कहां है? …है भी, या ...

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