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Category Archives: साहित्य

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  • सपाट बनाने का कारखाना

    सपाट बनाने का कारखाना

    कई बार जिंदगी बड़ी सपाट सी लगने लगती है, जो कि है नहीं। सुबह, दोपहर, शाम और रात। यही सिलसिला। दिन का ...

  • [मई दिवस पर विशेष] हंथौड़ा लोहा बन गया

    [मई दिवस पर विशेष] हंथौड़ा लोहा बन गया

    सैकड़ों बाहों के साथ उठी हमारी बाहें और एक मजबूत हंथौड़ा जंग लगे लोहे पर गिरा धड़ाम से। जबर्दस्त शोर हु...

  • सामाजिक विकास की उल्टी दिशा

    सामाजिक विकास की उल्टी दिशा

    समाज में बुद्धिजीवियों की क्या कोई जगह है? इस सवाल से आप टकरा कर देखें, होश उड़ जायेंगे। भारत में यह ...

  • मिट्टी होने की लड़ाई

    मिट्टी होने की लड़ाई

    लोहे को काट और मोड़-बांध कर खड़ा करता है वह उस इमारत का ढ़ांचा जिसकी गहरी बुनियाद में है वह मिट्टी जो ल...

  • उधड़ी हुई सड़कों का चौराहा

    उधड़ी हुई सड़कों का चौराहा

    हम उस चौराहे पर खड़े हैं जहां से निकली और जहां तक पहुंची राहें उधड़ी हुई, बेमरम्मत हैं। ध्वस्त हैं बां...

  • मुद्दा साहित्य के छोटा या बड़ा होने का नहीं

    मुद्दा साहित्य के छोटा या बड़ा होने का नहीं

    साहित्य में राजनीति की बात चलती रहती है, मगर समझ यह पैदा की जाती है, कि राजनीति की बात करने से साहित...

  • भय की बनती सूरतें

    भय की बनती सूरतें

    आज सरकार और सरकार समर्थक मीडिया के किसी भी बात पर यकीन करना मुश्किल हो गया है। जिसे वो आतंकवादी कहते...

  • पोस्टर

    पोस्टर

    ‘जो गुनाह हमने किये नहीं उन गुनाहों की सजा हमें मिलेगी’, खबर पक्की है। और मैं समझता हूं कि सजा हमें ...

सपाट बनाने का कारखाना

सपाट बनाने का कारखाना

कई बार जिंदगी बड़ी सपाट सी लगने लगती है, जो कि है नहीं। सुबह, दोपहर, शाम और रात। यही सिलसिला। दिन का सिलसिलेवार तरीके से बीतना। रात का ऐसा गुजरना जैसे गाफिलों की नींद। बुरा लगता है, कि जो है ...

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[मई दिवस पर विशेष] हंथौड़ा लोहा बन गया

[मई दिवस पर विशेष] हंथौड़ा लोहा बन गया

सैकड़ों बाहों के साथ उठी हमारी बाहें और एक मजबूत हंथौड़ा जंग लगे लोहे पर गिरा धड़ाम से। जबर्दस्त शोर हुआ पपड़ियां उधड़ीं बुनियादें हिलीं और एक बड़ी धरती कांप गयी। गला फाड़ कर चिल्लाया लोहा लौह व्यवस्था के खूनी ...

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सामाजिक विकास की उल्टी दिशा

सामाजिक विकास की उल्टी दिशा

समाज में बुद्धिजीवियों की क्या कोई जगह है? इस सवाल से आप टकरा कर देखें, होश उड़ जायेंगे। भारत में यह वर्ग दशकों से नहीं, बल्कि सदियों से विभाजित है। और यह विभाजन स्वाभाविक है। समाज यदि बंटा हुआ है, ...

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मिट्टी होने की लड़ाई

मिट्टी होने की लड़ाई

लोहे को काट और मोड़-बांध कर खड़ा करता है वह उस इमारत का ढ़ांचा जिसकी गहरी बुनियाद में है वह मिट्टी जो लोहे से ज्यादा मजबूत और मुलायम है, जिसके खिलाफ इमारत मरे हुए ईंट-पत्थर और मरी हुई लकड़ियों से ...

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उधड़ी हुई सड़कों का चौराहा

उधड़ी हुई सड़कों का चौराहा

हम उस चौराहे पर खड़े हैं जहां से निकली और जहां तक पहुंची राहें उधड़ी हुई, बेमरम्मत हैं। ध्वस्त हैं बांये बाजू की राहें दायें बाजू विध्वंस है। चौराहे पर टंगा निर्देश है- ‘बांये बाजू से चलें लालबत्ती से रूकें ...

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मुद्दा साहित्य के छोटा या बड़ा होने का नहीं

मुद्दा साहित्य के छोटा या बड़ा होने का नहीं

साहित्य में राजनीति की बात चलती रहती है, मगर समझ यह पैदा की जाती है, कि राजनीति की बात करने से साहित्य छोटा हो जाता है। क्या वास्तव में ऐसा होता है? क्या यह साहित्य को उसके समय से काट ...

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भय की बनती सूरतें

भय की बनती सूरतें

आज सरकार और सरकार समर्थक मीडिया के किसी भी बात पर यकीन करना मुश्किल हो गया है। जिसे वो आतंकवादी कहते हैं, वह आतंकवादी प्रमाणित नहीं होता। जिसे वो देशद्रोही करार देते हैं, वह देशद्रोही प्रमाणित नहीं होता। और ऐसा ...

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पोस्टर

पोस्टर

‘जो गुनाह हमने किये नहीं उन गुनाहों की सजा हमें मिलेगी’, खबर पक्की है। और मैं समझता हूं कि सजा हमें मिलनी भी चाहिए कि हमने देखा नहीं उस कल को बिगड़ते हुए जो हमारा आज है…शहादत के बाद नयी ...

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बाजार में बिके पतंगों की डोर

बाजार में बिके पतंगों की डोर

खबरें फैलायी गयीं राजभवनों से कि ‘पतंग की डोर हमारे हाथों में है।’ हमने बाजार में बिके पतंगों को देखा आसमान में उड़ते, हमने देखा अपने शहर को, और छतों, मुंडेरों पर खड़े पतंगबाजों को। कौम कुनबा और जमातों से ...

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हमने जो सुना, हमने जो देखा है

हमने जो सुना, हमने जो देखा है

देश में सरकार हमारी है और चरवाहा कस्साई नहीं यह हमने सुना है। X X X देखा है हमने चरवाहे को मवेशियों का झुण्ड ले जाते हुए, झुण्ड में गाय-बैल भेंड़-बकरियां और माल-असबाब ढ़ोने वाले सभी मवेशी हैं, वो लोग ...

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