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Category Archives: साहित्य

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हमने जो सुना, हमने जो देखा है

हमने जो सुना, हमने जो देखा है

देश में सरकार हमारी है और चरवाहा कस्साई नहीं यह हमने सुना है। X X X देखा है हमने चरवाहे को मवेशियों का झुण्ड ले जाते हुए, झुण्ड में गाय-बैल भेंड़-बकरियां और माल-असबाब ढ़ोने वाले सभी मवेशी हैं, वो लोग ...

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बुखार

बुखार

बुखार नया है। डॉक्टरों ने समझ तो लिया, लेकिन मर्ज को चाहने वालों के लिये, उन्होंने कई जांच लिखे। मलेरिया, मियादी, मौसमी बुखार और न जाने क्या-क्या? कुछ ने डेंगू और चिकनगुनिया भी लिखा। दिमागी बुखार के बारे में भी ...

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सोच और सम्बद्धता, अब बाजार में है

सोच और सम्बद्धता, अब बाजार में है

‘‘मगर यह तो दोगलापन है।‘‘ उन्होंने तल्खी से कहा। चेहरे पर भाव ऐसा था, जैसे इससे घिनौनी कोई चीज नहीं। ‘‘हां, है तो।‘‘ मैंने सीधे तौर पर अपनी स्वीकृति दी। मेरे जेहन में सवालों से घिरा तर्क था। ‘‘लेकिन, यह ...

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फिदेल कास्त्रो के लिये

फिदेल कास्त्रो के लिये

एक दबी ख्वाहिश थी, कॉमरेड फिदेल आपसे मिलने की मिल-बैठ कर बातें करने की यह पूछने की कि 21वीं सदी के समाजवाद को मार्क्सवाद की किन संभावनाओं से हम जोड़ें? क्रांति की किस सोच के साथ खड़े हों हम लेनिन के ...

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विलेन ‘शेर खां‘ क्यों है?

विलेन ‘शेर खां‘ क्यों है?

रोज-ब-रोज की जिंदगी में कुछ बातें ऐसी होती हैं, जो फैलाती तो गंदगी हैं, मगर पता नहीं चलता। खिड़की खुली है, तो बाहर के नजारे को भी कमरे में जगह मिलेगी ही। शोर-शराबा होगा, आवाजें घुसेंगी। धूल-धुआं का आना भी ...

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आग के कारोबारी

आग के कारोबारी

जिस आग को सहेज कर रखा कारोबारियों ने हम अश्वेतों को काबू में रखने के लिये, वह आग अब उनके अपने ही घरों में बेकाबू हो रही है। हम जले, जलते रहे, आज भी जल रहे हैं। अपनी बस्ती अपने ...

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काठ के पुतले का रंग

काठ के पुतले का रंग

बढ़ती हुई सामाजिक असहिष्णुता का जिक्र सहसा ही थम गया। इतिहास और साहित्य पर हो रहे हमलों के बारे में भी बातें ना के बराबर हो रही हैं। भारतीय संस्कृति पर हो रहे हिंदूवादी सांस्कृतिक हमलों का जिक्र भी नहीं ...

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रावण का दहन राम के साथ

रावण का दहन राम के साथ

श्री राम भक्त वानरों ने कल मचाया उत्पात। खुले दरवाजे से घुस आये कमरे में किताबों को रेक से, खाने के सामान को फ्रीज से, और जो भी रखा था जहां व्यवस्थित उसे वहां से उठा कर फर्श पर पटक ...

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एक दूसरे पर लदे दिन

एक दूसरे पर लदे दिन

एक दिन को मैं दूसरे दिन पर रख देता हूं यह जानते हुए कि रखे हुए दिनों की अपनी मुसीबतें हैं, उन्हें रोज नये दिन का बोझ उठाना पड़ता है, रातें गुजारनी पड़ती हैं आशंकाओं में, जिन बातों पर उनका ...

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अनवर सुहैल की तीन कविताएं

अनवर सुहैल की तीन कविताएं

1. भागते रहे हम छिपे हुए है कैमरे गुपचुप टोह में हैं और उनकी शिकारी निगाहें खोज रही हैं भागते रहे हम और बचाते रहे अपना वजूद कि संसार में बची रहे हुनर और कला शिकारी निगाहों से बचते-बचाते घने ...

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