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Category Archives: साहित्य

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पुस्तक समीक्षा : आदमी और आदमियत के सवालों से जूझती कविताएँ

पुस्तक समीक्षा : आदमी और आदमियत के सवालों से जूझती कविताएँ

देश के प्रमुख चित्रकार-कवि कुंवर रवीन्द्र सिंह या के. रवीन्द्र की कविताएँ ‘रंग जो छूट गया था’* के रूप में आई हैं. छोटी-छोटी कविताओं में कवि आदमियत को बचाए रखने के लिए चिंतित नजर आते हैं. ये आदमी निस्संदेह पंक्ति ...

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अजीत सिंह चन्देल की पांच कविताएँ

अजीत सिंह चन्देल की पांच कविताएँ

1. सोचता हूँ टाट वाला लम्बा सा बोरा लाद कर पीठ पर किसी दिन मैं भी निकलूँ अपने शहर की हर गली में चिल्लाते हुए कबाड़ी वाला कबाड़ी वाला तुम बेंच देना अपने पुराने ज्ञानार्जन की किताबें घोंट घोंट कर ...

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निखिल ‘नादां’ की तीन कविताएं

निखिल ‘नादां’ की तीन कविताएं

1. डायरी बोलती है .. तुम्हे पता है, सुलग रही हैं मेरी कितनी डायरियां, जिस भी पन्ने पर हाँथ पड़ता है , दहक उठती हैं उंगलियां | जो वक्त तब चल रहा था न , कभी कभी, मेरी डायरी से ...

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अपने हिस्से का मई दिवस

अपने हिस्से का मई दिवस

दिल की गलियों से गुजरते हैं वो लोग जिन्होंने अपने हिस्से की लड़ाईयां मिल कर लड़ी। आज एक मई है- ‘‘दुनिया के मजदूरों एक हो!‘‘ ‘‘काॅमरेड, लाल सलाम!‘‘ कहता हूं मैं और पूछता हूं आपसे आपने अपने हिस्से का मई ...

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सड़कें आजकल

सड़कें आजकल

1. सड़कें आज कल खून के आंसू रोती हैं और चीखती हैं। एक जोड़ी घिसी हुई चप्पल की तरह सड़क को मैं जीता हूं। 2. एक जुलूस निकलती है सड़क पर। सड़क पर कुछ होता है ऐसा कि लोग गिरते ...

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शिनाख्त

शिनाख्त

हम कहां हैं? हमारी समझ में नहीं आ रहा है, जैसे कोई भूलभुलइया, कोई तिलस्म हो, जहां आग, आग नहीं। पानी, पानी नहीं। जमीन, जमीन नहीं। यहां तक कि आदमी, आदमी और जानवर, जानवर तक नहीं लग रहा है। चारो ...

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अर्पण कुमार की तीन कविताएँ

अर्पण कुमार की तीन कविताएँ

1. पसरता अन्धेरा बाहर से निरंतर खदेड़े जा रहे अंधेरे ने अपनी चादर फैलायी है हमारे अंदर ईर्ष्या, प्रतिशोध और सत्ता मद की आग में जलते-बुझते लोगों ने अपने आस-पास एक दमघोंटू अँधेरा कायम कर रखा है जहाँ एक-दूसरे को ...

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साहित्य में सब कुछ वैधानिक नहीं

साहित्य में सब कुछ वैधानिक नहीं

साहित्य को हम समाज और उसके मानवीय होने से बाहर निकाल दें। उसे जनशून्य बना दें और उसकी प्रकृति का नाश कर दें। उसकी सोच एवं संवेदनाओं को एक खास किस्म का कपड़ा पहना दें। उसके चेहरे पर अपनी पसंद ...

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कीचड़ में

कीचड़ में

मेरे जेहन से यह बात निकल चुकी है, कि ‘‘कीचड़ में कमल खिलता है।‘‘ बे-मौसम के बरसात से भी, घर के सामने कीचड़ इतना भर जाता है, कि घर के पिछवाड़े बसने वाले सूअर सामने भी डेरा डाल देते हैं। ...

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घुंघरू परमार की कविता

घुंघरू परमार की कविता

बिगड़ी हुई लड़कियां 1. गाँव की लड़कियां अब बिगड़ने लगी हैं वे जाने लगी हैं स्कूल साईकिल से पढ़ने लगी हैं किताबें छोड़कर सिलाई –कढ़ाई, अचार-पापड़ सीखने लगी हैं कंप्यूटर तर्क करने लगी हैं कुतर्कों के खिलाफ़ लड़ने लगी हैं ...

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