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Category Archives: राष्ट्रीय परिदृश्य

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आतंकवाद के खिलाफ हम कहां हैं?

आतंकवाद के खिलाफ हम कहां हैं?

अजमल कसाब के बाद, अफजल गुरू को फांसी दे दी गयी। लाश भी जेल में ही दफन कर दिया गया। प्रतिक्रिया भी कुछ वैसी ही हुयी, जैसी उम्मीद की गयी थी। देर आये, दुरूस्त आये से लेकर आतंकवाद को कठोर ...

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सामाजिक समस्याओं का निजीकरण

सामाजिक समस्याओं का निजीकरण

‘दिल्ली गैंगरेप’ ने कर्इ सवालों को सतह के ऊपर ला दिया है। यह सोचने के लिये विवश कर दिया है कि तमाम आर्थिक एवं राजनीतिक परिवर्तन के बाद भी, समाज की आधी आबादी की हालत वह नहीं है, जो ऊपर ...

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भारत-पाक – बुलेटप्रूफ कण्टेनर में बैठकर क्रांति

भारत-पाक – बुलेटप्रूफ कण्टेनर में बैठकर क्रांति

भारत और पाकिस्तान के बीच, युद्धविराम और शांतिवार्ता के दौरान भी, युद्ध और आतंक की सिथतियां बनी रहती हैं। सीमा विवाद और कश्मीर का मुददा दोनों ही देशों के बीच खड़ा रहता है। पाकिस्तान आज तक स्वीकार नहीं कर सका ...

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राजसत्ता के लिये, राजनीतिक बाजी

राजसत्ता के लिये, राजनीतिक बाजी

हम यह मानते हैं कि मौजूदा आर्थिक, सामाजिक एवं राजनीतिक परिदृश्य को बदलने का काम, देश की आम जनता कर सकती है। हमारी अपेक्षायें किसी भी राजनीतिक दल, संगठन या मुददों को खड़ा करके, उन्हें लावारिश छोड़ने वालों से नहीं ...

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चुनाव की देहरी पर चिन्तन

चुनाव की देहरी पर चिन्तन

जयपुर चिन्तन-शिविर में कांग्रेस के कपाल पर चिन्ता की गाढ़ी लकीरे उभरी हुर्इ दिखीं। राहुल गांधी के शब्दों में धार कम भावुकता अधिक थी। फिर भी, पार्टी के रवैए और कार्यप्रणाली के बारे में वे फरमा सही रहे थे। ऊपरी ...

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राजनीतिक हिंसा की दो वारदातें

राजनीतिक हिंसा की दो वारदातें

सामाजिक हिंसा के बाद, राजनीतिक हिंसा की दो घिनौनी तस्वीरें हमारे सामने आयी हैं। 8 जनवरी 2013 को जम्मू-कश्मीर के पुंछ जिले में, मेंढर सेक्टर के मनकोट इलाके में, पाकिस्तानी सैनिकों ने भारतीय सेना के दो जवानों का सिर धड़ ...

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वालमार्ट- जो जायज है, वही नाजायज है

वालमार्ट- जो जायज है, वही नाजायज है

भारतीय संसद में कर्इ सवाल खड़े हैं। सवालों की बड़ी भीड़ है। एक दूसरे को धकिया कर आगे निकलने की कोशिश करते हुए सवाल हैं। सवालों की भी अपनी परेशानियां हैं। एक सवाल दूसरे से पिछड़ जाता है, दूसरा सवाल ...

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सेना नहीं सरकारें तख्ता पलटती हैं

सेना नहीं सरकारें तख्ता पलटती हैं

भारत की वित्तव्यवस्था और बाजार पर कब्जा जमाने और उसकी राजनीतिक संरचना को प्रभावित करने की जो कोशिशें हो रही हैं, वह नवउदारवादी वैश्वीकरण और मुक्त बाजारवादी उदारीकरण की नीतियों का परिणाम है। केंद्र की यूपीए सरकार भ्रष्टाचार के सुलगते ...

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जनतंत्र के लिये, जनसंघर्ष जरूरी है

जनतंत्र के लिये, जनसंघर्ष जरूरी है

आम आदमी के हितों से जुड़े मुददों पर राजनीतिक दलों के हितों की सवारी, भारतीय संसद की विशेषता बन गयी है। देश में एक भी राजनीतिक दल ऐसा नहीं है, जो कह सके कि वह आम आदमी के हितों के ...

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भारत में विकास के जरिये समाजवाद-6

भारत में विकास के जरिये समाजवाद-6

व्यापक जनाधार वाले जनतंत्र के लिये, जनधु्रवीकरण की अनिवार्यता पहले से ज्यादा, बढ़ गयी है, क्योंकि पूंजीवादी जनतंत्र में, राजनीतिक धु्रवीकरण की सिथतियां बदल गयी हैं। आम जनता के हितों की बातें तो की जाती हैं किंतु राजसत्ता के लिये, ...

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