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Monthly Archives: March 2016

वैश्विक मंदी के फिर से उभरते खतरे – 1

वैश्विक मंदी के फिर से उभरते खतरे – 1

पूंजीवाद और उसकी बाजारवादी अर्थव्यवस्था अनिश्चयता के गहरे दलदल मे है। उसके पास ना तो वापस होने का विकल्प है, और ना ही आगे बढ़ने की कोई सूरत नजर आ रही है। वह जहां है, वहां ठहरने की कोई जगह ...

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युद्ध और आतंक की बढ़ती अनिवार्यता

युद्ध और आतंक की बढ़ती अनिवार्यता

मुक्त व्यापार और बाजारवादी अर्थव्यवस्था का व्यापक प्रभाव दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ा है। जहां गिरावट, आर्थिक अनिश्चयता और वित्तीय संकट है। जिससे लातिनी अमेरिकी एवं कैरेबियन देशों की वित्त व्यवस्था भी प्रभावित हुई है। वैश्विक वित्तीय संकट का सीधा ...

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कीचड़ में

कीचड़ में

मेरे जेहन से यह बात निकल चुकी है, कि ‘‘कीचड़ में कमल खिलता है।‘‘ बे-मौसम के बरसात से भी, घर के सामने कीचड़ इतना भर जाता है, कि घर के पिछवाड़े बसने वाले सूअर सामने भी डेरा डाल देते हैं। ...

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घुंघरू परमार की कविता

घुंघरू परमार की कविता

बिगड़ी हुई लड़कियां 1. गाँव की लड़कियां अब बिगड़ने लगी हैं वे जाने लगी हैं स्कूल साईकिल से पढ़ने लगी हैं किताबें छोड़कर सिलाई –कढ़ाई, अचार-पापड़ सीखने लगी हैं कंप्यूटर तर्क करने लगी हैं कुतर्कों के खिलाफ़ लड़ने लगी हैं ...

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[शहादत दिवस पर विशेष] भगत सिंह सिक्का या शहादत का विज्ञापन नहीं

[शहादत दिवस पर विशेष] भगत सिंह सिक्का या शहादत का विज्ञापन नहीं

पांच रूपये के गिलट छाप सिक्के के सांचे में ढ़ले भगत सिंह को मैं खर्च नहीं कर पाता एक कप चाय, एक पावरोटी या खुदरा पैसा के रूप में जो, एक सदी का सरकारी सम्मान है जहां गांधी हजार रूपये ...

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केंद्रीय विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के हज़ारों पद खाली

केंद्रीय विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के हज़ारों पद खाली

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने एक आरटीआई के जवाब No.F.18-5/2014(CU) में बताया है कि केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में टीचिंग के 35 फ़ीसदी से अधिक पद और नॉन-टीचिंग में 30 फ़ीसदी से अधिक पद खाली पड़े हैं। बेरोजगार युवाओं के एक राष्ट्रीय संगठन ...

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यदि राष्ट्रवाद के मशीन में मुझे डाला गया?

यदि राष्ट्रवाद के मशीन में मुझे डाला गया?

मेरे दिमाग की बत्ती हमेशा गुल रहती है, और जब जलती है, तब कुछ ऐसा होता है, कि सिर चकरा जाता है। पिछले महीने मैं देशभक्त बननेे में लगा रहा। लगभग बन ही गया था, कि मेरी देशभक्ति के साथ ...

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सिर के बल चलती विकल्प की बहस

सिर के बल चलती विकल्प की बहस

बहस जारी है और लम्बी खिंच चुकी है। सवाल यह है- ‘‘क्या हमारे पास कोई विकल्प है?‘‘….. ‘‘यदि है, तो क्या? और नहीं है, तो हम बहस क्यों कर रहे हैं?‘‘ संघर्ष का विकल्प। सत्ता का विकल्प। विकल्प के रूप ...

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यह डर है

यह डर है

किसी मंदिर पर आपने तिरंगा को लहराता हुआ नहीं देखा होगा। किसी मस्जिद, गिरजाघर या गुरूद्वारे के लिये भी यह जरूरी नहीं है। धर्म ध्वज और राष्ट्रीय ध्वज अलग-अलग ही रहे हैं। यह धर्म और राष्ट्र की आपसी समझदारी है….. ...

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रमेश प्रजापति की दो कविताएँ

रमेश प्रजापति की दो कविताएँ

1. महानगर में मज़दूर अभी-अभी आए हैं पूर्वांचल से या शायद मालदा से रेलगाड़ी में चढ़कर दिहाड़ी मज़दूर पेट में मचलती इच्छाएँ और हाथों में लिए रोज़ी-रोटी का हुनर मुस्कुरा रहे हैं उतर के महानगर के प्लेटफाॅर्म पर उमंग से ...

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