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Monthly Archives: August 2017

हमारे पास न जेब होगी, न देश होगा

हमारे पास न जेब होगी, न देश होगा

2014 के आम चुनाव और उसके परिणाम को हमने कॉरपोरेट जगत के द्वारा सत्ता के अपहरण के नजरिये से ही देखा है। हम यह मानते रहे हैं, कि यह वैधानिक तख्तापलट है, जिसमें वॉलस्ट्रीट की निजी कम्पनियां, बैंक और देशी ...

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स्थगित लोकतंत्र

स्थगित लोकतंत्र

‘‘भारतीय राजनीति में क्या मोदी का कोई विकल्प है?‘‘ यह सवाल विपक्ष की ओर उछाला जाता है, और कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी को नरेंद्र मोदी के सामने खड़ा किया जाता है, यह प्रमाणित करने के लिये कि वे कमजोर ...

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क्या लोकतंत्र में अल्पसंख्यकों की देखभाल ऐसे की जाती है?

क्या लोकतंत्र में अल्पसंख्यकों की देखभाल ऐसे की जाती है?

हामिल अंसारी ने कोई गलत बात नहीं की कि ‘‘लोकतंत्र की पहचान अल्पसंख्यकों को मिली सुरक्षा से होती है। देश के मुसलमानों में डर, बेचैनी और असुरक्षा की भावना है।‘‘….. कि ‘‘विपक्ष को यदि सरकार की नीतियों की आलोचना का ...

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मोदी जी हंस रहे हैं

मोदी जी हंस रहे हैं

यह बात समझ से बाहर है अब तक सरकारें बोलती हैं झूठ हम समझते हैं सच क्यों….? क्यों का जवाब है हमारे सामने मगर हम उस जवाब से मिलना नहीं चाहते। मिल गया तो समझते नहीं। समझ गये तो, ‘‘कोये ...

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