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तीसरे मोर्चे का वाम चेहरा

INDIA-POLITICS-LEFT-KARAT‘‘कांग्रेस और भाजपा की पूंजीपरस्त, जनविरोधी और भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाली नीतियों के खिलाफ तीसरा मोर्चा आम चुनावों के बाद ठोस शक्ल लेगा। वाम दलों के बिना कोई भी वैकल्पिक मोर्चा नहीं बन सकता। देश में जहां कुशासन, महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार के लिये कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार जिम्मेदार है, वहीं भाजपा साम्प्रदायिकता और पुरातनपंथी पार्टी है।‘‘

माकपा के महासचिव प्रकाश करात जी कहते हैं।

अखबार में छपी खबरें अक्सर मुंह चिढ़ाती सी लगती हैं।

यह मत पूछियेगा कि ‘किसको?‘ क्योंकि, जो भी उनसे नजरें मिलाता है, वो उसको ही मुंह चिढ़ाने लगती है। मगर प्रकाश करात जी की इस खबर ने तो हद ही कर दिया, वह पलट कर करात जी को ही मुंह चिढ़ाने लगी, कि हद कर दी आपने। लोग तो लकीर पीटते हैं, मगर आप तो पिटी हुई लकीरों को पीट रहे हैं।

ज्यादा की तो मुझे याद नहीं, मगर जब से इस देश में मोर्चे की राजनीति शुरू हुइ्र है, तब से वाममोर्चा तीसरे मोर्चे की बात कर रही है। आप कहते हैं- ‘‘तीसरा मोर्चा आम चुनाव के बाद ठोस शक्ल लेगा।‘‘ और ‘‘वाम दलों के बिना कोई भी वैकल्पिक मोर्चा नहीं बन सकता।‘‘

जी चाहता है, आपके इस बात पर तालियां बजाऊं और दो चार तमाचा अपने ही गालों पर जड़ लूं, जो सोचता है, कि ‘‘वाम मोर्चा ही वास्तव में तीसरा मोर्चा बन सकता है।‘‘

हो सकता है करात जी, कि आपको मेरी यह बेवकूफी समझ में न आये, मगर देश की आम जनता की मूर्खतापूर्ण अपेक्षाओं की खोज खबर ले लिया करें। शायद अक्ल के समझदार दरवाजे पर आपको दस्तक सुनाई पड़े।

हम तो कहेंगे- कनखजूरों के सैंकड़ों टांगों पर भरोसा करना बंद करें। देश की आम जनता पर भरोसा करने की आदत डालें, जिसे वास्तव में विकल्पहीन बना दिया गया है। वह तंग आ चुकी है, कांग्रेस, भाजपा और क्षेत्रीय दलों की राजनीति से। वह आप से भी तंग आ गयी है, जिसके लिये तमाम बदलाव के बाद भी राजनीति का ककहरा आज तक नहीं बदला।

कांग्रेस और भाजपा को आपने ‘पूंजीपरस्त‘ और ‘जन विरोधी‘ बताया। बात सोलहों आने सही है, मगर सिर्फ भाजपा को साम्प्रदायिक और पुरातनपंथी समझने का क्या मतलब है? जब दोनों की आर्थिक नीतियां एक हैं और दोनों ही काॅरपोरेट जगत के हितों के लिये आम जनता को धोखा दे रही हैं, तो एक तरक्की पसंद और दूसरा पुरातन पंथी कैसे हो गया? एक गैर साम्प्रदायिक और दूसरा साम्प्रदायिक कैसे हो गया?

जिस आंकलन को देश की आम जनता ने ड़ेढ-दो दशक पहले ही खारिज कर दिया, आप आज तक उसी आंकलन के इर्द-गिर्द क्यों चकरा रहे हैं?

करात साहब, आपके लिये क्या माक्र्सवाद भरे पेट की जुगाली है? या विपन्नता का दर्शन है?

कहां थे आप जब ज्योति बसु के बाद माक्र्सवादी मुख्यमंत्री बने बुद्धदेव बजरबट्टुओं की तरह विदेशी पूंजी निवेश की वकालत कर रहे थे?

कभी सोचा आपने कि पश्चिम बंगाल की सरकार क्यों गिर गयी और तृणमूल को क्यों जगह मिली? सिंगूर और लालगढ़ का क्या मतलब है?

क्यों आप इतने सीट पर भी उम्मीदवार खड़ा नहीं कर पाते कि देश की आम जनता गिन-गिन कर सभी को जिता कर आपकी सरकार केंद्र में बना सके।

और कितने दिनों तक खुद धोखे में रहेंगे, और देश की आम जनता को धोखे में रखेंगे, कि भारतीय राजनीति में कोई तीसरा मोर्चा भी है? जबकि अपने को तीसरा मोर्चा बनाने का खयाल भी नहीं आता, और आम चुनाव से पहले ऐसे राजनीतिक दलों को ले कर मोर्चा बनाने का खयाल आता है, जो तराजू के पलड़े पर रखे मेढ़क हैं।

आप कहते हैं ‘‘चुनाव के बाद तीसरा मोर्चा ठोस शक्ल लेगा।‘‘ इस बात की घोषणा अभी कर दीजिये और चुनाव से बाहर खड़ा हो जाईये कि ‘‘पांच साल बाद अपनी ठोस शक्ल ले कर आप चुनाव लड़ेंगे।‘‘ आपको हैरत होगी, कि वाम मोर्चा भी टूट जायेगा। मगर देश की आम जनता को यह भरोसा होगा, कि पांच साल बाद ही सही वाममोर्चा तीसरा मोर्चा बनेगा। विकल्पहीन राजनीति में राजनीतिक विकल्प खड़ा होगा। आप महज जुगाली नहीं कर रहे हैं, जन समस्याओं के समाधान के लिये जनसंघर्षों की रहा पकड़ रहे हैं।

इसलिये ‘ठोस शक्ल‘ की बात तो अभी आप कीजिये ही मत, क्योंकि बेशक्ल लोगों से सूरतें नहीं बनतीं। यदि सचमुच आप विचारों की सूरत से अपनी सूरत बनाना चाहते हैं, तो समान सोच वाले राजनीतिक दलों का मोर्चा बनाईये। देश की आम जनता को विकल्पों की जरूरत है। मगर आज आप जो कर रहे हैं, वह गले में फांसी का फंदा डाल कर, पांव के नीचे से तख्ता हटाना है।

जरा गौर से देखिये, जिसकी गर्दन फांसी के फंदे में फंसी है, वह कोई और नहीं तीसरे मोर्चे का वाम चेहरा है।

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