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भगत सिंह की जगह आम जनता के बीच है

bhagat-singh-at-central-jailअभी, इस बात की खबर थोड़ी देर पहले मिली कि ‘‘सरदार पर जानलेवा हमला हुआ है, और वह इमरजेन्सी वाॅर्ड में हैं।‘‘

सरदार के लिये मैं एक खत्म हुई संभावना की तरह हूं, जिसके बाल सफेद हो गये हैं, शरीर भी खास दमदार नहीं। बस, बात इतनी सी है, कि सोच और समझा अभी बाकी है, जिसे पूरी तरह गलत नहीं कहा जा सकता, मगर सही कहने में उम्र आड़े आ जाती है। एक बात और भी आड़े आती है, कि ‘‘जो झण्डा नहीं उठा सकते, उनकी सोच, क्या खाख काम आयेगी।‘‘

इसलिये, सरदार और मेरे बीच ‘‘कुछ बीते हुए और कुछ बनते हुए‘‘ का ऐसा रिश्ता है, जिसकी ठीक-ठीक सूरत नहीं बनती। सरदार बन रहा है और मैं शायद बीत रहा हूं। और सच बताऊं तो मुझे इस बात का अफसोस नहीं है।

‘‘समाजिक सोच के बीच भी चैराहे होते हैं।‘‘ यह समझने में थोड़ा समय लगता है।

सरदार छात्र और नौजवानों के बीच है। और ऐसे लोगों के बीच भी है, जिनकी जुबान बड़ी अच्छी होती है। जो किसी विचार और सोच के साईनबोर्ड की तरह होते हैं, आकर्षक कई रंगों से लिखे। जिनके शोख रंगों को तेज धूप, सर्द हवायें और मूखलाधार बारिश का सामना नहीं करना पड़ा है।

न जाने क्यों मुझे लगता है, कि ऐसे लोग तेज धूप से बद्रंग हो जाते हैं। सर्द हवायें ऐसे लोग झेल नहीं पाते और मूसलाधार बारिश में कई पक्के रंग भी बह जाते हैं। ये जब अपनों के बीच होते हैं, बड़े क्रांतिकारी होते हैं, मगर अकेला पड़ते ही खुद को संभाल नहीं पाते। और ऐसे लोगों की तादाद ज्यादा है। जूलियस फ्यूचिक बनना, या चेग्वेरा की तरह जीना, या डेविड़ की तरह सूली पर टंग कर अपनी गल्तियों के बारे में सोचना, आसान नहीं है। या भगत सिंह की तरह आने वाले कल पर यकीन करना भी आसान नहीं है।

सरदार की नजरों में भगत सिंह क्रांतिकारी हैं। कम्युनिस्ट हैं। उनकी शहादत बेमिसाल है। उन्होंने अपने हिस्से की लड़ाई बड़ी ईमानदारी से लड़ी।

इस बात से किसी को आपत्ति नहीं हो सकती। मुझे भी नहीं है।

उनका हासिल शायद किसी भी गांधी से बड़ा है।

इसके बाद भी, जीवन में मैं कभी इतना रोमानी नहीं हुआ, किसी को टूट कर इतना प्यार नहीं किया, कि उसके नाम का गोदना गुदवा लूं, या अपने होने पर उसे टांक लूं। आप चाहें तो कह सकते हैं, कि माक्र्सवादी हो कर भी मैं माक्र्स का दिवाना नहीं हूं। एंगेल्स या लेनिन के लिये मुझमें दिवानगी नहीं है। मुझे लगता है- ‘‘उन्हें जीने की जरूरत है। उन्होंने जो जीया उसे आगे बढ़ाने की जरूरत है।‘‘

मगर, मेरी उपलब्धियों के खाते में बड़ा नाम होने का मुनाफा नहीं है। इसलिये मेरी बातें मेरी औकात से बड़ी लगती हैं। चेग्वेरा और फिदेल कास्त्रो से बड़ी लगती हैं। जिन्होंने समाजवादी क्रांति के लिये, उठाया तो हथियार, मगर आज आदमी के यकीन में बंट गये हैं, शाॅवेज और राज्य की सरकार को आम लोगों के पक्ष में खड़ा करने की लड़ाई में बंट गये, कि विचार से बड़ी कोई ताकत नहीं होती।

सरदार मुझसे नाराज नहीं, ना ही मैंने कभी यह कहा कि ‘‘वह गलत है।‘‘ सच तो यह है कि मैंने उसे और उसने मुझे अपने हाल पर छोड़ दिया। उसने यह मान लिया कि ‘‘मैं क्रांतिकारी नहीं बन सकता और सोच से हालात की वास्तविक सूरत नहीं बदलती।‘‘

मैंने भी मान लिया कि ‘‘संघर्षों‘‘ से सबक मिलता है। वह जो कर रहा है, वह अच्छा है।

भगत सिंह ने भी संघर्षों से ही सीखा था, कि धमाकों से लोगों की नींद टूटनी चाहिये।
सीखने के लिये कोई उम्र नहीं होती।

कि सोच और समझ के बीच भी कोई चीज है। विभाजन की लकीर खींच कर जीना, आसान नहीं, अपने जान की बाजी लगानी पड़ती है। भगत सिंह ने जान की बाजी लगा दी, यह बड़ी बात है।

इन सब के बीच सरकारें कहां हैं? हमें यह जानना चाहिये।

मैं नहीं जानता, कि यह हमला क्यों और कैसे हुआ?

खबर देने वालें ने इन सवालों का ठीक-ठीक जवाब नहीं दिया। उसने यह जरूर कहा कि ‘‘यह हमला नौजवानों के बीच सरदार के काम से नाराज लोगों ने किया है।‘‘

न चाहते हुए भी सरदार की फिक्र मुझे है। क्योंकि एक बनते हुए सही आदमी का टूटना गलत है। उसे अकेला छोड़ा नहीं जा सकता। भले ही मुझसे यह कहा गया है कि ‘‘आप उससे सम्पर्क न करें। उसकी निजगरानी हो रही है।‘‘

निगरानी ही यह समझने के लिये काफी है, कि मामला सिर्फ दो गुटों के बीच का नहीं है।

विभाजन की खींची गयी लकीरों का भी है। जो बीते हुए कल और आज को जोड़ती है।

मैंने हमेशा यह महसूस किया है, कि भगत सिंह की जगह आम जनता के बीच है। उन्हें फांसी के फंदे में नहीं होना चाहिये।

आलोकवर्द्धन

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