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वेनेजुएला में 11 अप्रैल 2002 का तख्तापलट

13abril81998 में वेनेजुएला की आम जनता ने ह्यूगो शाॅवेज को देश का राष्ट्रपति चुना और 1999 में उन्होंने पहली बार राष्ट्रपति पद की शपथ ली।

11 अप्रैल 2002 को वहां के दक्षिणपंथी ताकतों के द्वारा, अमेरिकी सहयोग एवं समर्थन से शाॅवेज के तख्तापलट की कार्यवाही की गयी।

शाॅवेज ही नहीं, वेनेजुएला के इतिहास का यह निर्णायक पल था। इसी दौरान वेनेजुएला के विकास का निर्धारण हुआ।

12 साल पहले घटी यह घटना इसलिये भी निर्णायक है, कि लातिनी अमेरिकी देशों के इतिहास में यह पहली बार हुआ कि बोलिवेरियन क्रांति के प्रति विश्वास रखने वाली वेनेजुएला की आम जनता और वहां की सेना ने तख्तापलट की कार्यवाही को असफल कर दिया और 48 घण्टे के भीतर शाॅवेज की वापसी हुई। यह पहली बार प्रमाणित हुआ, कि तख्तापलट के खिलाफ आम जनता निर्णायक लड़ाई लड़ सकती है, और जीत भी सकती है।

आज भी वेनेजुएला की दक्षिणपंथी ताकतों के द्वारा राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने के लिये हिंसक प्रदर्शन हो रहे हैं। तख्तापलट की उनकी कोशिशें जारी हैं। प्रतिक्रियावादी ताकतें यह समझने में नाकाम रही हैं कि 2002 और 2014 की परिस्थितियां बदल गयी हैं। लातिन अमेरिका में ‘21वीं सदी के समाजवाद‘ की जड़ें मजबूत हुई हैं। वेनेजुएला ‘विकास के जरिये समाजवाद‘ की अवधारणा का महाद्वीपीय ही नहीं वैश्विक प्रारूप में बदल गया है। शाॅवेज ने बोलिवेरियन क्रांति की जिस बुनियाद को वेनेजुएला में रखा था, उस बुनियाद पर स्ट्रीट गर्वमेण्ट और अर्थव्यवस्था पर देश की आम जनता और मजदूरों के नियंत्रण और कम्यूनों के निर्माण की इमारतें खड़ी हो गयी हैं। आम जनता के पक्ष में खड़ी समाजवादी सरकार एक हकीकत बन चुकी है। तेल उत्पादन जैसी कम्पनियों पर राज्य की सरकार और कामगरों का अधिकार हो गया है। यही नहीं सेना के बीच सरकार के लिये मजबूत समर्थन है। लातिनी अमेरिकी देशों की एकजुटता पहले से ज्यादा मजबूत हुई है।

यह ठीक है, कि शाॅवेज आज नहीं हैं, मगर अमेरिकी समर्थन से तख्तापलट जैसी कार्यवाही को अंजाम देना, आसान नहीं है। अमेरिकी सरकार और प्रतिक्रियावादी ताकतों को यह समझने की जरूरत है, कि वेनेजुएला उनकी जागीर नहीं है।

नवम्बर 2001 को शाॅवेज ने 49 डिक्री -अधिनियम एवं कानून- जारी किये थे। जिसके अंतर्गत खनिज तेल उत्पादन, भूमि सुधार, को-आॅपरेटिव और तेल उत्पादन सम्पदा का पुर्न बंटवारा शामिल था। इन अधिनियमों और कानूनों से यह बात बिल्कुल साफ हो गयी कि शाॅवेज सरकार वेनेजुएला को नव उदारीकरण से अलग दिशा की ओर ले जाने का निर्णय ले चुकी है। अमेरिकी वैश्वीकरण और मुक्त व्यापार के वह खिलाफ है। और अध्यादेशों-अधिनियमों के इस समूह को वेनेजुएला के प्रभावशाली वर्ग ने अपने खिलाफ खुली चेतावनी मान लिया। उनके अंदर इसकी तीखी प्रतिक्रिया हुई।

दिसम्बर 2001 में फेडिकमारास- जो कि वेनेजुएला का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण व्यावसायिक संगठन था, ने कनफीडरेशन आॅफ वेनेजुएलियन वर्कर्स के भ्रष्ट दक्षिणपंथी नेताओं के साथ मिल कर एक बड़े आम हड़ताल को संगठित किया।

वेनेजुएला के समृद्ध बड़े भू-स्वामियों ने नये भूमि सुधार का विरोध किया। जिसके अंतर्गत खाली पड़े जमीन को किसानों के बीच बांटने की बात कही गयी थी। उन भू-स्वामियों ने सार्वजनिक रूप से भूमि सुधार कानून की प्रतियों को जलाया।

नये ‘हाईड्रो कार्बन लाॅ‘, जिसके तहत देश की तेल सम्पदा पर सरकारी नियंत्रण कायम करने और स्टेट आॅयल कम्पनी -पी0डी0वी0एस0ए0- के लिये नये बोर्ड आॅफ डाॅयरेक्टर्स की नियुक्ति के निर्णय ने, वेनेजुएला के बुर्जुआ वर्ग में व्यापक असंतोष को भर दिया, जो कि तेल सम्पदा को किराये पर दे कर अब तक भारी मुनाफा बटोर रहे थे। उन्होंने इस निर्णय को अपने हितों पर सीधा हमला करार दिया।

वेनेजुएला में निर्णायक लड़ाई की अनिवार्यता को देखते हुए शाॅवेज ने अपने समर्थकों और ‘बोलिवेरियन सर्कील‘ को संगठित करना शुरू कर दिया, जो कि उनके समर्थन का आधार था। उन्होंने लोगों को संयुक्त रूप से देश के नये संविधान पर बहंस करने के लिये प्रोत्सिाहित किया और दर्जनों सुधारों को पेश किया।

शाॅवेज की नीतियों को मिले व्यापक जनसमर्थन ने वेनेजुएला के समाजवादी विकास योजनाओं की दिशा को सुनिश्चित किया। यही कारण है, कि अमेरिकी समर्थन दक्षिणपंथी विपक्ष और प्रतिक्रियावादी ताकतों ने तीन सालों में तीन बार ऐसी कोशिशें की और तीनों बार उन्हें नाकामी का सामना करना पड़ा। और हर बार शाॅवेज की जीत ने उनके राजनीतिक, आर्थिक एवं सेना में उनकी पैठ को नयी मजबूती दी।

वेनेजुएला की दक्षिणपंथी ताकतों ने 11 अप्रैल 2002 को सबसे बड़ी निर्णायक लड़ाई की शुरूआत की। फेडिकमारास और कनफीडरेशन आॅफ वेनेजुएलियन वर्कर्स ने शाॅवेज द्वारा स्टेट आॅयल कम्पनी में लाये गये परिवर्तन के विरोध में एक रैली का आयोजन किया, जिसका मकसद वेनेजुएला के राष्ट्रपति शाॅवेज को सत्ता से बेदखल करना था।

रैली आयोजकों ने पहले से निर्धारित राहों की उपेक्षा करते हुए प्रदर्शनकारी भीड़ को राष्ट्रपति भवन की तरफ मोड़ दिया। जहां पहले से ही ‘स्नाइपर्स‘ मौजूद थे, जिनके निशाने पर शाॅवेज समर्थक और शाॅवेज विरोधी दोनों ही थे। जिनका मकसद संघर्ष को हिंसक बनाना था। शाॅवेज समर्थकों की उपस्थिति में जैसे ही शाॅवेज विरोधी प्रदर्शनकारी पहुंचे दोनों गुटों के बीच आपसी संघर्ष की शुरूआत हो गयी और इसी अफरा-तफरी का लाभ उठा कर पेशेवर हत्यारों ने गोलीबारी शुरू कर दी। माहौल हिंसक हो गया। और वहां मौजूद सेना में शाॅवेज से असहमत सैन्य अधिकारी एवं सैनिकों ने शाॅवेज को बंधक बना लिया। उन्होंने उस दिन हुए खून-खराबे का आरोप लगा कर राष्ट्रपति शाॅवेज से इस्तीफे की मांग की। और तख्तापलट करने वालों ने फेडिकमारास के प्रेसिडेण्ट पेद्रो कारमोना को देश का नया राष्ट्रपति घोषित कर दिया।

1505509_10152378228613203_758142113_nकारमोना ने जल्दबाजी की और राष्ट्रीय असेम्बली और न्याय व्यवस्था सहित वेनेजुएला के नये संविधान को निरस्त कर दिया। एक ही झटके में उन्होंने यह समझाने की कोशिश की कि शाॅवेज और शाॅवेज की सरकार द्वारा किये गये कार्यों के लिये कोई जगह नहीं है। लातिनी अमेरिकी देशों को व्हाईट हाउस का आंगन समझने वाली बुश सरकार ने कुछ घंटों के अंदर ही इस बात की घोषणां कर दी कि ‘‘वाशिंगटन वेनेजुएला की नयी सरकार -जो वास्तव में असंवैधानिक राष्ट्रपति था- को अपना समर्थन देती है।‘‘ इस घोषणा में दृढ़तापूर्वक कहा गया कि ‘‘शाॅवेज सरकार के द्वारा किये गये अलोकतांत्रिक निर्णयों ने इस संकट को जन्म दिया है।‘‘

शुरूआत में देश की आम जनता को इस बात की निश्चित खबर नहीं थी कि राष्ट्रपति भवन में क्या हुआ? तख्तापलट की छोटी सी खबर देने के बाद मुख्य धारा की पश्चिमी मीडिया ने खबरों पर रोक लगा दी। खबरें अफवाहों की तरह उड़ रही थीं, और यह खबर भी फैलाई जा रही थी कि ‘‘शाॅवेज ने राष्ट्रपति पद से इस्तिफा दे दिया है।‘‘ जो कि आने वाले घटनाक्रम में बेबुनियाद ही प्रमाणित हुई। देश की आम जनता ने भी इस बात पर यकीन नहीं किया। और शाॅवेज समर्थकों की भीड़ बढ़ती चली गयी। राष्ट्रपति भवन में क्यूबा के तात्कालिन राष्ट्रपति फिदेल कस्त्रो से शाॅवेज की  बातें हुईं। फिदेल कास्त्रो ने-

अपनी शर्तों पर अपने को बचाने,

चिली के पूर्व राष्ट्रपति अलेंदे से सबक लेने

और किसी भी कीमत पर राष्ट्रपति के पद से इस्तीफा न देने की सलाह दी। शाॅवेज और वेनेजुएला की समाजवादी सरकार को बचाने की मुहीम फिदेल कास्त्रों के हाथों में आ गयी। और जिस कूटनीतिक दृढ़ता से फिदेल कास्त्रो ने इस मुहीम को संचालित किया, उसी दृ़ढ़ता से शाॅवेज ने तख्तापलट के बाद उनके निर्देशों का पालन किया। और अमेरिकी सरकार के गुर्गों को हाथ आये परिंदे को छोड़ने के लिये विवश होना पड़ा। वेनेजुएला में क्यूबा के दूतावास की घेराबंदी और पानी-बिजली की कटौती ने उनके इरादों को पहले ही स्पष्ट कर दिया था। जिस समय बंधक बने शाॅवेज के ऊपर राष्ट्रपति पद से इस्तीफा देने का कठोर दबाव बनाया जा रहा था, उन्होंने त्याग पत्र देने की 4 शर्तें रखीं-

  •  वो नेशनल असेम्बली के सामने इस्तीफा देंगे।
  •  राष्ट्रपति का चुनाव होने तक सभी संवैधानिक अधिकार उप-राष्ट्रपति के हाथों में हों,
  •  वो देश को लाईव टेलीकास्ट के जरिये सम्बोधित करेंगे,
  •  वो राष्ट्रपति के रूप में ही आत्म समपर्ण करेंगे। जिसे मानने का साहस वो नहीं कर सकते थे।

जैसे ही लोगों को खबर मिली वेनेजुएला की आम जनता सड़कों पर उतर आयी। बोलिवेरियन सर्किल की सक्रियता बढ़ गयी। पूरे देश में प्रदर्शन का दौर शुरू हो गया और सड़कों पर दमन की कार्यवाही भी शुरू हो गयी। प्रदर्शनकारी शाॅवेज के वापसी की मांग कर रहे थे। हजारों-हजार लोगों ने काराकस के फुएर्तो तिउना मिलिट्री बैरकों तक मार्च किया और उन्होंने सेना पर तख्तापलट के विरूद्ध खड़ा होने का दबाव बनाया।

आम जनता के बीच शाॅवेज की लोकप्रियता ने सेना को काफी प्रभावित किया और उनके बीच के मतभेद भी सामने आने लगे। सेना के सर्वोच्च पदाधिकारियों ने सेना के सैनिकों और आम जनता से, विरोध में खड़ा होने की अपील की। मीराफ्लोरेस -राष्ट्रपति भवन- के चारो ओर शाॅवेज समर्थक प्रदर्शनकारियों का जमावड़ा बढ़ता चला गया। शाॅवेज समर्थकों के साथ देश की आम जनता और सैन्य टुकडियां खड़ी होती चली गयीं। और इसके साथ ही तख्तापलट की कोशिशें भी नाकाम होती चली गयीं।

11 अप्रैल को 19 लोग मारे गये और 60 लोग घायल हुए। राष्ट्रपति भवन को शाॅवेज समर्थकों ने पूरी तरह घेर लिया। जिनमें सैंकड़ों पाराट्रूपर्स भी थे। उनके कमाण्डर जोस बाडुएल ने कारमोना को फोन किया और कहा- ‘‘शाॅवेज की तरह आप भी बंधक हैं।‘‘ जिसका सीधा मतलब था कि यदि शाॅवेज को कुछ होता है, तो आप भी यहां से बाहर नहीं निकल पायेंगे। और चेतावनी दी गयी कि ‘‘24 घंटे के अंदर राष्ट्रपति शाॅवेज को जीवित वापस करें।‘‘

इसी बीच जनरल राउल बाडुएल ने- जोकि माराकाई में शाॅवेज के ओल्ड पाराट्रूपर डिविजन के प्रमुख थे, ने मीडिया से सम्पर्क करने की कोशिश की, मगर मीडिया उनसे बात करने और उनका इण्टरव्यू लेने से इंकार कर दी, क्योंकि वो शाॅवेज समर्थक थे। और मीडिया अमेरिकी दबाव में थी। राउल ने प्रेसिडेन्सियल गार्ड के प्रमुख से सम्पर्क किया, जोकि शाॅवेज के प्रति पूरी तरह वफादार थे, और उन्होंने कहा- ‘‘अभी नहीं, तो कभी नहीं।‘‘

13 अप्रैल की सुबह प्रेसिडेन्सियल गार्डस, ने निर्णायक कार्यवाही की। वो अपने बैरक से अण्डरग्राउण्ड टनल्स के जरिये राष्ट्रपति भवन में घुस गये, और उन्होंने भवन को अपने कब्जे में ले लिया। इस कार्यवाही के दौरान कई तख्तापलट करने वाले षडयंत्रकारी वहां से भाग निकले। यह भी चैंकाने वाला सत्य है कि उस दौरान वहां एक भी गोली नहीं चली। राष्ट्रपति शाॅवेज को सुरक्षित गुप्त ठिकाने में रखा गया। इस दौरान कुछ घंटों के लिये उप-राष्ट्रपति डिओसडाडो कैबेलो ने राष्ट्रपति का पदभार सम्भाला और 48 घण्टे के भीतर शाॅवेज की वापसी हो गयी। वेनेजुएला में देश की आम जनता ने सेना के साथ मिल कर तख्तापलट को नाकाम कर दिया। यही नहीं आनेवाले चंद सालों में शाॅवेज ने अमेरिकी सरकार को आर्थिक एवं विदेश नीति के मामले में भी गहरी मात दी।

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