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सड़कों के साथ होना

May-Day-2012-Marchसड़कों से
मेरी दोस्ती
पक्की और पुरानी है।
सड़कों को देखना,
सड़कों से बातें करना
और सड़कों के साथ होना,
मुझे, अच्छा लगता है।

अच्छा लगता है-
सड़क बिछाते हुए सड़क होना,
कच्ची सड़कों की बांह थाम कर
दुर्गम इलाकों से गुजरना।
यह सोचना और जानना
कि जिन्हें
हर पल कुचला जाता है
उनका, अब तक न कुचला जाना,
मुझे, अच्छा लगता है।

अच्छा लगता है
कि सड़कें, कभी अकेली नहीं पड़तीं,
वे जुड़ती हैं,
मजबूती से बंधती हैं,
खुले आम,
सरे राह
चैक-चैरस्तों पर मिलती हैं।
आज कल
सड़कों पर बड़ी भीड़ है,
नाराज लोग सड़कों पर उतर आये हैं
सड़कें जुलूस बन गयी हैं।

सड़कों को
बेरियर,
चेक पोस्ट,
खाई-खंदक, रेत की बोरी
और हथियारों के बाड़े से रोका जा रहा है,
हो रही है, उनकी निगरानी
उनकी चैकस घेराबंदी हो रही है
सिर से पांव तक
लोहा पहने लोगों के द्वारा।
क्या ऐसे लोग
वास्तव में सुरक्षित हैं?

न जाने क्यों
उनको यह उम्मीद है
कि सड़कों को आगे बढ़ने से
रोका जा सकता है।
वो देखते ही नहीं
कि जहां वे खड़े हैं- पांव के नीचे,
उनके सामने और पीछे
सड़क है।

सड़कों से
मेरी दोस्ती
पक्की और पुरानी है।
सड़कों ने जागना,
बाधाओं को पार करना
और
अपनी राह चलना, सीख लिया है।
सड़कों के साथ होना
मुझे अच्छा लगता है।
पहली मई भी सड़क है।

                                 – आलोकवर्द्धन

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