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भारत में विकास के जरिये समाजवाद-6

व्यापक जनाधार वाले जनतंत्र के लिये, जनधु्रवीकरण की अनिवार्यता पहले से ज्यादा, बढ़ गयी है, क्योंकि पूंजीवादी जनतंत्र में, राजनीतिक धु्रवीकरण की सिथतियां बदल गयी हैं। आम जनता के हितों की बातें तो की जाती हैं किंतु राजसत्ता के लिये, राजनीतिक समझौतों को अब वैधानिक मान्यता मिल गयी है, जिनमें विचार और नीतियों के लिये कोर्इ जगह नहीं बची है। भारत में वामपंथी राजनीतिक दलों की हरकतें, किसी भी पूंजीवादी राजनीतिक दलों से, खास अलग नहीं है। यदि अलग हैं भी तो, वो उनके अलग होने की विभाजन रेखा साफ नहीं है। चुनाव हो या कोर्इ भी नीतिगत मामला, आम जनता के हितों में, वो सड़कों पर कम उतरती है। जन संघर्षों से जनसमस्याओं का समाधान और जनचेतना के इजाफे की सोच कमजोर पड़ गयी है। संसद भवन में बड़ी-बड़ी बातें कर ली जाती हैं और यह मान लिया जाता है कि देश की आम जनता उन्हें समझ गयी है। जबकि देश की आम जनता की सोच संसद के बारे में बदल चुकी है, जहां भारी कोहराम मचा रहता है। उठा-पटक और मारा-मारी की नौबतें बनी रहती हैं। मगर होता कुछ नहीं। समस्याओं के समाधान का प्रदर्शन किया जाता है, उन्हें स्थगित करने के लिये।

इस बीच, देश के सामने कर्इ मुददों ने सिर उठाया, जिन्हें भ्रष्टाचार के दायरे में दर्ज कर दिया गया। इस सवाल को खड़ा ही नहीं होने दिया गया, कि इन मुददों की वजह क्या है? मुददों को मुददा ही बने रहने दिया गया, उनका कोर्इ समाधान नहीं निकला, यहां तक कि जिन मुददों को भ्रष्टाचार के दायरे में लाकर आंदोलन की शक्ल दी गयी थी, उन मुददों का भी दम निकल गया। सभी मुददे बाधित संसदीय प्रक्रिया और प्रायोजित आंदोलनों की भेंट चढ़ गये। आम जनता जहां थी और मुददे जहां थे, वहां से और भी बदतर सिथति में पहुंच गये। सरकार और सरकार पर लगाये गये आरोपों का जवाब राबर्ट वाड्रा को मिला क्लीन चिट और सलमान खुर्शीद की तरक्की है। मनमोहन सिंह जहां थे, वहीं हैं। कोल ब्लाक आबंटन का मसला दबा-दबा है। राष्ट्रीयकरण की ओट में किया गया निजीकरण एक शांत पड़ता घोटाला भर रह गया है। 2-जी स्पेक्ट्रम की नीलामी की असफलता से घोटाले को आधारहीन बना दिया गया। एफडीआर्इ का घमासान संसद भवन में आंकड़ों के गणित से पराजित हो गया। इसके बाद भी परास्त लोगों में बड़ी हलचल है। यह हलचल सत्तारूढ़ राजनीतिक दलों में भी है। जिन्हें लग रहा है कि उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की मांगों को बड़ी र्इमानदारी से पूरा कर दिया है। मनमोहन सिंह यह सोच सकते हैं कि अब बाजारवादी देशों का समर्थन उन्हें हासिल हो जायेगा, जिसके बिना वो 2014 का आम चुनाव जीत नहीं सकते हैं।

नवउदारवादी वैश्वीकरण के पक्षधर और मुक्त बाजार व्यवस्था का झण्डा उठाकर चलने वाले राष्ट्रीय एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को भारत में पांव पसारने के लिये मनमोहन सिंह की जरूरतें बढ़ गयी हैं। वो भाजपा पर दांव लगा कर रख सकते हैं, मगर उनकी वरियता की सूची में कांग्रेस ही प्रमुख रहेगी। जिसने न सिर्फ भारत के खुदारा बाजार में 51 प्रतिशत के पूंजी निवश्ेा की सुविधायें उपलब्द्ध करायी, बलिक केजी बेसिन जैसे मुददों को कोल ब्लाक आबंटन के मुददे सा ही, ठण्डे बस्तें में डाल दिया। मुददों के खड़ा होने से किसी राष्ट्रीय एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को कोर्इ क्षति उठानी नहीं पड़ी है। घमासान दिखावटी ही प्रमाणित हुआ और निजी पूंजी को वरियता और निजीकरण को वित्तव्यवस्था का आधार बना दिया गया।

आम जनता उन वायदों के पूरा होने की बाट जरूर जोहेगी जिन्हें पूरा नहीं होना है।

वाम मोर्चा सोच और समझ के स्तर पर सचमुच कमजोर है। इसलिये, उनके खिलाफ मीडिया-वार ही काफी है। वो व्यपाक जनाधार वाले जनतंत्र के लिये जनसंघषोर्ं की पहल करने की सिथति में भी नहीं है। और आम जनता के लिये नकली लड़ार्इ लड़ने की जरूरत भी नहीं है। जो लड़ार्इयां गैर वामपंथी लड़ रहे हैं, उनका निष्कर्ष आम जनता के लिये यही निकलने वाला है कि आम जनता सोच सकती है- इन लड़ार्इयों का निष्कर्ष वह नहीं निकलता, जिसकी अपेक्षायें जगार्इ जाती हैं। वह आंदोलनों के प्रति अविश्वास से भरी रहेगी, और जनसंघर्षों की शुरूआत पहले से कहीं ज्यादा मुशिकल हो जायेगी।

जन असंतोष का यथासिथतिवादी ताकतों या उग्रराष्ट्रवादी ताकतों के हाथों में पड़ना, नयी मुशिकलों को जन्म देगी। आने वाला कल राष्ट्रीय हितों से बहुराष्ट्रीय कम्पनियों और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकार्इयों से जुड़ने वाले परिणामों का कल होगा। वित्तीय पूंजी ने राष्ट्रीय दलों के वर्गचरित्र को बदल दिया है। बदलने की प्रक्रिया तेज हो गयी हैं अब अंतर्राष्ट्रीय सिथतियाें की अनदेखी कर पाना किसी भी राजनीतिक दल के लिये आसान नहीं है, क्योंकि सरकार और वित्तीय व्यवस्था का निर्धारण करने की राष्ट्रीय क्षमता यूपीए की सरकार ने हस्तांतरित कर दिया है। राष्ट्रीय कम्पनियां बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के साथ मिल कर इसका निर्धारण करेंगी। मनमोहन सिंह इन्हीं के अर्थशास्त्री हैं, जो सत्ता के सर्वोच्च पद पर विराजमान हैं।

आज यूरोपीय संघ के किसी भी देश की राजसत्ता पर, और उसकी वित्तीय व्यवस्था पर उस देश की सरकार का अधिकार नहीं है। हालांकि पूंजीवादी जनतंत्र के विधान के आधार पर आम जनता ही अपने देश की सरकार का चुनाव करती है। कहने को वहां जनतंत्र है और सरकारे वित्त्ीय संकट से जूझ रही हैं। यही सिथति अमेरिका की है, जहां 99 प्रतिशत लोगों के विरूद्ध 1 प्रतिशत लोगों की डेमोक्रेट सरकार है, जिसका नेतृत्व बराक ओबामा कर रहे हैं। यदि रिपबिलकन सरकार भी होती, तो इन सिथतियों में कोर्इ परिवर्तन नहीं होना था, और यह प्रमाणित सत्य है।

ऐसा क्यों है? यह सवाल है।

हम उस ओर क्यों बढ़ रहे हैं? यह उससे भी बड़ा सवाल है।

और इसे कैसे रोका जा सकता है? यह सबसे बड़ा सवाल है।

ऐसा क्यों है?

वित्तीय पूंजी ने अपने हिंसाब से पूरी व्यवस्था को अपने हितों के सांचे में ढ़ाल लिया है। राज्य, सरकार, और वित्तीय संरचना पर निजी पूंजी का अधिकार हो गया है। ऐसी सिथतियां वित्तीय पूंजी का राज्य के नियंत्रण से बाहर जाने की वजह से बनी। जिसकी वजह से वैशिवक मंदी की शुरूआत हुर्इ, और जिसने वैशिवक मंदी को भी अपने विकास के लिये अवसर में बदल दिया।

राज्य और बाजार के बीच की साझेदारी वह महत्वपूर्ण पड़ाव है, जिसने आज की सिथतियों को जन्म दिया है।

मुक्त बाजारवाद की सोच निजी पूंजी के वर्चस्व स्थापना है। पूंजीवादी वित्तीय संरचना में भी पूंजी पर राज्य का नियंत्रण होता था। किंतु यह सोच विकसित की गयी कि बाजार को राज्य के नियंत्रण से मुक्त होना चाहिये, क्योंकि बाजार कभी कोर्इ गल्ती नहीं करता है। अमेरिकी वित्तीय साम्राज्यवाद के जरिये इस सोच को फैलाया गया। ताकि वैशिवक वित्तव्यवस्था पर अमेरिकी आधिपतय कायम किया जा सके। राज्य के नियंत्रण से निजी पूंजी के बाहर होने के पारिणाम स्वरूप ही पूंजीवादी वैशिवकमंदी की शुरूआत अमेरिका में हुर्इ। राकफेलर जैसे लोगों ने आम जनता को उसकी क्षमता से बाहर बैंकों एवं वित्तीय इकार्इयों से कर्ज दिला कर, भारी मुनाफा कमाया और पूंजी के बाजारवादी प्रवाह को अपने पक्ष में प्रवाहित कर लिया। अमेरिकी मंदी के पहले दौर में ही वित्तीय इकार्इयां और बैंक दिवालिया होने लगी, आम जनता उससे पहले ही दिवालिया हो गयी।

अमेरिकी सरकार ने बैंकों, वित्तीय संस्थानों और औधोगिक इकार्इयों को बचाने के लिये उनके लिये बेल आउट पैकेजों के जरिये भारी मदद की घोषणायें की। सरकार अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष, विश्व बैंक की कर्जदार हो गयी और निजी क्षेत्रों में पूंजी का केंदि्रयकरण हो गया। बाजारवादी ताकतें इतनी प्रभावशाली हो गयी हैं कि व्हार्इट हाउस में डेमोक्रेटस हो या रिपबिलकन राष्ट्रपति, उसे इन्हीं कारापोरेट जगत के इशारे पर काम करना पड़ता है। भारतीय संसद की हालत भी ऐसी ही होती जा रही है, कि यूपीए हो या एनडीए उनकी नीतियां बाजारवादी ही रहेंगी। मनमोहन सिंह के उदारीकरण ने देश की राजनीति का अमेरिकीकरण कर दिया है। अब बाजारवादी नीतियों की अनदेखी कर पाना किसी भी सत्तारूढ़ राजनीतिक दल एवं गठबंधन के लिये आसान नहीं है। सत्ता में बने रहने की यही शर्त बन गयी है।

यूरोपीय संघ की सिथति इससे भी बदतर है। वहां की सरकारों पर अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष, विश्व बैंक, और यूरोपीय कमीशन का कब्जा है। उन पर कर्ज का ऐसा बोझ है, कि इनकी शर्तों को मानने के लिये विवश हैं। इन देशों की वित्तव्यवस्था इन अंतर्राष्ट्रीय एवं यूरोपीय इकार्इयों के बिना खड़ी नहीं रह सकती। यही कारण है कि सरकारें चाहे जो भी हों, उनकी नीतियों में कोर्इ परिवर्तन नहीं हो सकता है। अलग-अलग देशों की सरकारों की नीतियों का लिबास एक हो गया है। सिथतियां ऐसी बन गयी हैं कि यूरोपीय देशों की अर्थव्यवस्था और राजसत्ता पर बैंको के जरिये विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष और यूरोपीय सेण्ट्रल बैंक का अधिकार हो गया है। इन देशों की सरकार को दिया गया कर्ज भी अब उनके बैंको को ही दिया जाता है। सरकारें बैंकों की गिरफ्त में आ गयी हैं।

मनमोहन सिंह जिस विदेशी पूंजी निवेश की बात, देश की वित्तव्यवस्था में कर रहे हैं, उसकी सर्वोच्च सिथति यही है। सारी दुनिया जब वित्तीय पूंजी के इस भयानक जाल से निकलने की कोशिशें कर रही है, देश के प्रधानमंत्री और उसके प्रमुख राजनीतिक दल, देश की संसद को, उस जाल में फंसाने के लिये अपने को जरिया बना चुके हैं। देश को वित्तीय पूंजी के जाल में फंसा रहे हैं। देश की वित्तीय आजादी को राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय, वित्तीय पूंजी और अमेरिकी गैस चेम्बर में डाला जा चुका है।

हम उस ओर क्यों बढ़ रहे हैं?

और क्या उस ओर बढ़ने से रोका जा सकता है?

यूरोप और अमेरिका में जो नहीं हो सकता है, उसे भारत में होने से रोका जा सकता है?

सच यह है, कि तीसरी दुनिया के देशों ने ही नवउदारवादी वैश्वकीरण, और वैशिवकमंदी में फंसी दुनिया के सामने सही विकल्पों की रचना की है। इसलिये, विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि ”हां! इस प्रक्रिया को रोका जा सकता है।” यह भी कह सकते हैं कि ”साम्राज्यवादी देशों के इस जाल को तोड़ा जा सकता है।”

”पूंजीवादी वैश्वीकरण का जवाब समाजवादी वैश्वीकरण है। व्यापक जनाधार वाले ‘समाजवादी जनतंत्र’ ही, एकाधिकारवाद जनतंत्र का जवाब है। अर्थव्यवस्था का राष्ट्रीयकरण और राजसत्ता में आम जनता की हिस्सेदारी जरूरी है।

हम वैश्वीकरण के खिलाफ नहीं हैं। यह ऐतिहासिक विकास की स्वाभाविक अवस्था है, इसे न तो रोका जा सकता है, ना ही इसे रोकने की जरूरत है, किंतु सारी दुनिया की सम्पतित, उसके लोगों और प्रकृति को अपनी गिरफ्त में रखने वालों को तो रोका ही जा सकता है, उन्हें रोकने के, अलावा और कोर्इ रास्ता भी नहीं है। जिसका नेतृत्तव अमेरिकी साम्राज्य कर रहा है, और जिसके पीछे चलने की कसम देश की सरकार उठा कर रखी है। क्योंकि वित्तीय पूंजी की पकड़ भारत की वित्तव्यवस्था पर और अब खुले तौर पर सरकार पर हो गयी है। संसद में शीतकालीन सत्र ने – यह प्रमाणित कर दिया है कि आज देश में ऐसी एक भी राजनीतिक पार्टी नहीं है, जो आम जनता के पक्ष में र्इमानदारी से खड़ी हो सके। संसद से लेकर सड़क तक लड़ार्इ लड़ सके। और जो लड़ रहे हैं, वो भी सिर्फ दिखावटी लड़ार्इ लड़ रहे हैं। देश की आम जनता भी अपने हितों के प्रति न तो जागरूक है, ना ही उसमें ऐसी सतर्कता भरी वर्गगत चेतना है। भारत में समाजवाद की अवधारणा एक सोच है। जिसके पक्ष में सिर्फ दो ही बातें हैं- एक- पूंजीवादी जनतंत्र वित्तीय पूंजी की तानाशाही में बदलता हुआ, खुद को संभालने की हारी हुर्इ लड़ार्इ लड़ रहा है। और दो- आम लोगों में व्यापक जनअसंतोष है। लातिनी अमेरिकी देशों में आम जनता ने ही, इनसे भी बुरी सिथतियों को बदला है, और भारत में भी यह संभव है। बस, अपनी सिथतियाें को ठीक-ठीक समझने की जरूरत है। आम जनता के हितों से जुड़ने के अलावा -मौजूदा सिथतियों की बदलने के लिये- और कोर्इ विकल्प नहीं है।

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