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मामला पहले एक तरफा था, अब बराबरी का है

apr_19_nat_212 मई की बनारस में मतदान है।

भाजपा और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को सोच से ज्यादा मशक्कत करनी पड़ रही है।

पहले मामला एकतरफा था, लोगों ने मान लिया था, कि नरेंद्र मोदी बनारसी सांड़ की तरह मजबूत हैं। धर्म और गुजरात का माॅडल उन्हें राजनीतिक संतों की श्रेणी में खड़ा कर देगा। गली और सड़कें केसरिया हो गयीं। लोगों की खोपड़ी में ‘अबकी बार, मोदी सरकार‘ की टोपी सजा दी गयी।

फिर लगा मामला एकतरफा नहीं है। अरविंद केजरीवाल शहर में आ गये। ‘मैं हूं आम आदमी‘ और ‘मुझे चाहिये स्वराज‘ की सफेद टोपी भी लोगों के सिर पर दिखने लगी। रोड़ शो में हंगामें होने लगे। मानना पड़ा कि केजरीवाल की स्थिति खास बुरी नहीं है। बुरी होती तो भाजपा इतनी हमलावर नहीं होती।

कांग्रेस के अजय राय तीसरे नम्बर पर खड़े रहे, बाकी लोगों के होने की खबर अखबारों से ही लगती थी।

अब लग रहा है, कि मुकाबला नरेंद्र मोदी और केजरीवाल के बीच है। यदि कांग्रेस नरेंद्र मोदी के ‘अमेठी चाल‘ में फंसती है, और नरेंद्र मोदी की तरह राहुल गांधी या प्रियंका गांधी वाड्रा प्रचार अभियान के आखिरी दिन अजय राय के पक्ष में आ धमकते हैं, और कुछ असर होता है, तो भाजपा का हाथ बंटायेंगे। वैसे भी कांग्रेस पूरे आम चुनाव में नरेंद्र मोदी के पीछे-पीछे भागती रही है। कह सकते हैं आप, कि कांग्रेस में एक भी चुनावी रणनीतिकार नहीं है। पाशा पलटना तो दूर की बात रही, वो अपना पाशा भी ठीक से फेक नहीं सके। फिर भी राहुल गांधी को यह उम्मीद है, कि तीसरी बार, उनकी सरकार बनेगी। इस बार कांग्रेस मनमोहन सिहं की नहीं, अपने राहुल गांधी के बारे में सोच रही है। वैसे, उनके चेहरे पर यकीन नहीं है। यह अच्छी बात है। होना भी नहीं चाहिये। जिन्होंने दस साल तक सरकार चलाया, वो दिग्गज फरार हैं।

इधर नरेंद्र मोदी आक्रामक हैं। झूठ के सहारे, प्रचार के साथ हैं। यदि केजरीवाल कहते हैं, कि देश की मीडिया को अम्बानी-अडाणी नरेंद्र मोदी के लिये खरीद चुके हैं, तो बात बड़ी है। मीडिया के लिये शर्मनाक भी है। वैसे नरेंद्र मोदी प्रियंका गांधी के ‘नीच राजनीति‘ को ‘नीची जाति‘ बना कर, पूरे देश से झूठ बोल रहे हैं। वो बोल रहे हैं, कि ‘‘मेरी जाति नीची है, राजनीति नहीं।‘‘ इसमें कोई दो राय नहीं, कि वो ऊंचे लोगों के लिये ही राजनीति कर रहे हैं। उनके प्रधानमंत्री पद की असंवैधानिक दावेदारी और बनारस से उनकी उम्मीदवारी संघ की सोची-समझी चाल है।

बनारस में भाजपा नरेंद्र मोदी के नाम के बाद झण्डे और बैनर में है, वास्तविक कमान राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की भगवा सेना संभाल चुकी है। संघ के रणनीतिकारों ने जिस कार्ययोजना को अंतिम रूप दिया है, उसके आधार पर पांच घर पर एक कार्यकर्ता की नियुक्ति की गयी है। जिन पर मतदाताओं से सम्पर्क बनाये रखने की जिम्मेदारी है। बनारस भर में लगभग 125 शाखायें रोज लगती हैं। शाखा में आनेवाले लोगों के बीच घरों का आबंटन किया गया है। जिन पर दैनिक सम्पर्क बनाने के अलावा अपने आस-पास के गतिविधियों की जानकारी रखने और लोगों को भाजपा से जोड़ने की जिम्मेदारी दी गयी है। ‘नमो वालेन्टियर‘ का गठन किया गया है। जिसके छोटे-छोटे समूह घर-घर जा कर मोदी का चुनाव प्रचार कर रहे हैं, और कार्य योजना के अनुसार 17 लाख मतदाताओं से मतदान से पहले 3 बार मिलना है।

मोदी के विश्वास पात्र और संघ के भरोसेमंद लोगों के हाथों में प्रचार अभियान है। सामाजिक सरोकार और जातीय गणित के आधार पर प्रचार अभियान चलाया जा रहा है।

अमित शाह के अलावा ‘मोदी टीम‘ में गुजरात के पूर्व विधायक सुनील ओझा, संघ के वरिष्ठ प्रचारक सुनील देवधर तथा अरूण सिंह भी हैं। तीनों गुजरात से आये हैं। परदे के पीछे से संघ ने कमान इस तरह संभाल ली है, कि मतदाताओं में हो रहे छोटे से छोटे बदलाव पर नजर रखी जा सके। भाजपा और संघ ने अपनी पूरी ताकत बनारस में झोंक दी है। स्टार प्रचारकों की आवाजाही भी बढ़ा दी गयी है।

इसके बाद भी आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल की स्थिति रोज सुधरती जा रही है। युवा, छात्र, बुद्धिजीवी, समाजसेवी वर्ग में केजरीवाल की स्थिति मजबूत हुई है। बनारस के आस-पास के ग्रामीण क्षेत्रों में कल तक उनकी पूछ नहीं थी, मगर आज उनके पास खड़े होने और बैठने की जगह है। उनके स्टार प्रचारकों में मनोरंजन और सिनेमा के चर्चित चेहरे ही नहीं हैं, समाज के प्रबुद्ध और बनारस में आयी मेधा पाटेकर जैसे समाजसेवी आंदोलनकारी भी हैं। ऐसे लोग हैं, जो आपना खा कर, केजरीवाल के लिये काम कर रहे हैं। उन्होंने अपनी सामाजिक व्यस्तता के बीच समय निकाला है, जिनका मकसद संघ संचालित और राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के पक्षधर नरेंद्र मोदी को रोकना है।

4_1397617472_540x540नरेंद्र मोदी की छवि जिनके लिये फासिस्ट है। जो देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और साम्प्रदायिक सद्भावना के लिये खतरा है। अल्प संख्यकों के लिये नरेंद्र मोदी गोधरा काण्ड हैं। वो डरे हुए हैं। गुजरात से आये 50 किसानों के समूह ने गुजरात के विकास माॅडल की हकीकत को बताना शुरू कर दिया। नरेंद्र मोदी के खिलाफ राजनीतिक ध्रुवीकरण का लाभ भी केजरीवाल को मिल रहा है। इसके बाद भी गुजरात के विकास का भरम बचा हुआ है। ‘आप‘ के पास ठोस संगठनात्मक ढांचा नहीं है। सही सोच और सही समझ नहीं है। वह असहमत और असंतुष्ट लोगों का ऐसा मंच है, जहां लोग जमा हो गये हैं। प्रगतिशील जनवादी और वामपंथी रूझान रखने वालों के अलावा ऐसे लोग भी हैं, जो पूंजीवादी जनतंत्र में सुधार के पक्षधर हैं। वो जानते ही नहीं कि सुधार की सभी संभावनाओं को वह निगल चुकी है। ऐसे लोगों में खुद ‘आप‘ के संयोजक अरविंद केजरीवाल हैं, जो उदार पूंजीवाद अब लोकतंत्र में जन समर्थक सरकारों के विरूद्ध अपने आदेशों को मानने वाली सरकारों की पक्षधर है। जिसका नेतृत्व नरेंद्र मोदी कर रहे हैं।

वाराणसी का चुनाव आनेवाले कल के रूझानों को स्पष्ट कर देगा। इस चुनाव में भाजपा और संघ ने यदि ‘आप‘ कार्यकर्ता और अरविंद केजरीवाल पर, उनके रोड शो के दौरान, हमले नहीं किये होते, तो मतों का ध्रुवीकरण ‘आप‘ और केजरीवाल के पक्ष में इतनी तेजी से नहीं हुआ होता, मगर उन्होंने जता दिया है, कि दिल्ली पर यदि वो काबिज हो गये, तो वो क्या कर सकते हैं? क्या करेंगे।

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