Home / राष्ट्रीय परिदृश्य / नरेंद्र मोदी, वित्तीय ताकतों का निवाला बन चुके हैं

नरेंद्र मोदी, वित्तीय ताकतों का निवाला बन चुके हैं

Untitled-1उग्र राष्ट्रवादी संगठनों में व्यक्ति की पूजा तब तक ही होती है, जब तक वह उपयोगी होता है।

नरेंद्र मोदी भारतीय जनता पार्टी, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय ताकतों का निवाला बन चुके हैं। चुनाव वो जीतते हैं, तब भी, और चुनाव वो हारते हैं, तब भी। अपनी स्थिति और अपनी नियति को बदलने की औकात, अब उनकी नहीं है। वो एक पतनशील अमानवीय व्यवस्था के भीतर हैं, जिससे बाहर निकलने का रास्ता उनकी सोच में ही नहीं है।

उन्हें इस बात की खबर नहीं होगी, कि प्यादे को वजीर बनाया ही जाता है, जीत के लिये। इसलिये जीत अब उनकी जरूरत है, क्योंकि हारने के बाद वो बिसात से बाहर होंगे।

जीत तय है, और फिर से चाय बेचने की नौबत नहीं आयेगी, इस बात का आंकलन करने के बाद ही उन्होंने कहा होगा, कि ‘‘यदि मैं चुनाव हार गया तो, फिर से चाय बेचूंगा।‘‘ लेकिन हार के बाद उनकी हालत सचमुच यही होगी। वो वित्तीय ताकतों के लिये ही नहीं, संगठन के लिये भी अनउपयोगी हो जायेंगे। टूटा हुआ सम्मोहन, खण्डित प्रतिमा हो जायेंगे। जिसकी पूजा फासिस्ट ताकतें नहीं करतीं। उसे सम्मानित ढंग से या तो ठिकाने लगा देती हैं, या बाहर फेक देती है, कबड़ में डाल देती है। नरेंद्र मोदी जी को अटलबिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी की ओर देख लेना चाहिये, जिसे ठिकाने लगाया जा चुका है, कबाड़ में डाला जा चुका है।

भाजपा और संघ की संवेदनायें सत्ता से जुड़ गयी हैं। उन्हें उसे पाने की बड़ी जल्दबाजी है।

नरेंद्र मोदी जी, आप खतरे  में हैं, मगर अफसोस, आपके लिये सम्मान या सहानुभूति, कुछ भी नहीं है। आप अभी नशे में हैं। पोस्टर, बैनर और नारों की धूम है। आपसे बड़ी आपकी छवि बना दी गयी है। जो आप नहीं हैं, उसी विकास पुरूष को आपके सामने खड़ा कर दिया गया है। सोचिये, गगनचुम्बी झूठ की ईमारतों के बीच आपको खड़ा कर दिया जाये, तो आप कितने बौने नजर आयेंगे?

‘‘भारत में मोर्चे की सरकार का राजनीतिक दौर अभी खत्म नहीं हुआ है,‘‘ यह एक तथ्य है।

और यह भी एक तथ्य है, कि ‘‘वित्तीय ताकतें दुनिया भर में फासिस्ट ताकतों को बढ़ा रही हैं।‘‘

क्योंकि उनकी वैश्विक अर्थव्यवस्था संकटग्रस्त है, और उनकी राजनीतिक संरचना, अब उनका साथ नहीं दे पा रही है।

भारत में कांग्रेस और यूपीए की मनमोहन सरकार की मुश्किल सिर्फ एक है, कि वह वित्तीय ताकतों को छूट तो दे चुकी हैं, लेकिन उग्र राष्ट्रवाद को वह बढ़ावा देना नहीं चाहती। उदार पूंजीवादी लोकतंत्र उसकी मुसीबत है। जिससे वह अपना पीछा नहीं छुड़ा सकी। भाजपा और संघ को वित्तीय ताकतों ने चुन लिया है, वो मानते हैं, कि मनमोहन सिंह के उदारीकण को नयी दिशा देने की जिम्मेदारी वह उठा सकती है।

हम हमेशा से मानते रहे हैं, कि नरेंद्र मोदी मनमोहन सिंह के पक्के चेले हैं।

गुजरात में निजीकरण के जरिये उन्होंने जो किया है, उसी दम पर भाजपा वित्तीय ताकतों को अपने यकीन में ले सकी है। यही कारण है कि संघ समर्थित नरेंद्र मोदी भाजपा की सूरत बन गये।

‘‘मोदी आ रहा है।‘‘

‘‘मोदी को हम लाने वाले हैं।‘‘

‘‘अच्छे दिन आनेवाले हैं।‘‘ के पोस्टरों, बैनरों के बाद ‘‘अब की बार, मोदी सरकार!‘‘ के नारे रचे गये। भारत में यह पहली बार हुआ, कि किसी भी राजनीतिक दल के होने पर किसी एक व्यक्ति का चेहरा सटा दिया गया। आजादी से पहले महात्मा गांधी थे, आजादी के बाद नेहरू-गांधी नेतृत्व भी इतने खुलेआम कांग्रेस की सूरत नहीं रहे। नरेंद्र मोदी के सम्मोहक छवि के निमार्ण के लिये करोड़ों-करोड़ रूपये लगा दिया गया। मोदी आज ‘विकास पुरूष‘ हैं। उनके सांसद के चुनाव को ‘प्रधानमंत्री‘ का चुनाव बना दिया गया। मोदी की लहर पैदा की गयी। यह सब देखते ही देखते लोगों के सामने हुआ, लेकिन किसी को पता ही नहीं चला। काॅरपोरेट वल्र्ड से संचालित मीडिया ने हवा बना दिया।

मोदी हवा के घोड़े पर सवार हैं। लकड़ी की काठी पर विराजमान हैं।

मोदी देश को नयी दिशा दे सकते हैं।

मोदी देश को कांग्रेस मुक्त कर सकते हैं।

मोदी देश में ऐसी सरकार बना सकते हैं, जो भारत को वैश्विक अर्थव्यवस्था के केंद्र में ला सकती है।

मोदी हर वो काम कर सकते हैं, जो अमेरिकी साम्राज्य कर सकता है।

नरेंद्र मोदी के लिये शेयर मार्केट का माहौल बनाया गया।

भारत की ‘योजन आयोग‘ के द्वारा- जहां मनमोहन सिंह की तूती बजती थी, और मोंटेक सिंह अहुलवालिया की चलती थी, वहां गुजरात माॅडल की तारीफ की रिपोर्ट जारी हो गयी।

मोदी विष खोपड़ी के बीच हैं।

जिन ताकतों ने यूपीए के मनमोहन सिंह सरकार को भारत में नियुक्त किया था, उन्हीं ताकतों ने नरेंद्र मोदी को प्रायोजित किया है।

जिस तरह नरेंद्र मोदी को स्थापित किया गया और जिस तरह भाजपा के द्वारा चुनाव का संचालन किया गया, वह पूरी तरह अमेरिकी चुनावी पद्धति है। जिसमें मुख्यधारा की मीडिया, सोशल मीडिया और प्रचारतंत्र का उपयोग किया जाता है। मतदाताओं को चुनावी माहौल के जश्न से घेर दिया जाता है, उसे इतनी भी फुर्सत नहीं दी जाती कि वह प्रचार के दायरे से बाहर निकल अपनी समस्याओं के बारे में सोच सके। आम चुनाव को लोकतंत्र का ‘महापर्व‘ बना दिया जाता है।

मौजूदा आम चुनाव में हमारी सोच इस सीमा तक नियंत्रित रही कि उसने यह सोचा ही नहीं कि देश की आम जनता जन-प्रतिनिधियों का चुनावी करती है, प्रधानमंत्री का नहीं। प्रधानमंत्री का चुनाव प्रत्यक्ष रूप से -सीधे तौर पर- उसके अधिकारों की परिधि से बाहर है। देश और जन-समस्याएं चुनावी मुद्दे से बाहर रहीं। मुद्दे की लड़ाई लड़ी ही नहीं गयी। प्रमुख एजेंडा प्रधानमंत्री कौन? का रहा।

‘गुजरात माॅडल‘ और ‘विकास पुरूष‘ के दावों के पीछे निजीकरण को छुपा दिया गया। यह सवाल पैदा ही नहीं हुआ, कि देश, समाज और देश की आम जनता की प्राकृतिक सम्पदा को निजी कम्पनियों को सौंपने का अधिकार सरकारों को नहीं है। बल्कि आर्थिक विकास के नाम पर निजीकरण की अनिवार्यता स्थापित कर दी गयी और आर्थिक एवं सामाजिक असमानता को स्वाभाविक मान लिया गया। यह भी मान लिया गया कि सरकारें कुछ भी कर सकती हैं।

देश का यह पहला आम चुनाव है, जो वित्तीय ताकतों के वर्चस्व को स्थापित करने के लिये लड़ा गया। प्रमुख राजनीतिक दल- कांग्रेस, भाजपा और यहां तक कि आम आदमी पार्टी तक, आम जनता के हितों की बातें करती हुई वित्तीय ताकतों के हितों के लिये लड़ती रहीं। पहली बार देश की आम जनता पूरी तरह चुनाव हार चुकी है।

भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से उपजी आम आदमी पार्टी ‘मुझे चाहिये स्वराज‘ और भ्रष्टाचार के विरूद्ध नकली लड़ाई के जरिये, इस सवाल को खारिज करते हुए कि भ्रष्टाचार के मूल में निजी कम्पनियां और काॅरपोरेट जगत है, जिनके घेरे में देश की सरकार है, राजनीतिक भ्रष्टाचार की बातें करती रही, और भारत के समाजसेवी – बुद्धिजीवी वर्ग को अपने दायरे में ले ली। उसने सही राजनीतिक विकल्प की रचना के लिये आधार तो दिया, किंतु खुद को यहां खड़ा कर वैकल्पिक राजनीति की जमीन ही खींच ली।

सोच और समझ के स्तर पर आम आदमी पार्टी के पास सोच की जमीन और समाज व्यवस्था के नाम पर, निश्चित अवधारणां नहीं है। वह पतनशील पूंजीवादी समाज व्यवस्था में सुधार की पक्षधर है। इसलिये ‘आप की क्रांति‘ जेपी के ‘सम्पूर्ण क्रांति‘ की तरह ही अबूझ है। राष्ट्रीय स्तर पर सरकार बनाने लायक जनसमर्थन ‘आप‘ की पकड़ से बाहर है।

आज भी सरकार बनाने की संभावनायें भाजपा नित एनडीए, और कांग्रेस नित यूपीए खेमे में सुरक्षित है। तीसरे मोर्चे की सरकार का गठन साझे की ऐसी खिचड़ी है, जिसके टिके रहने की उम्मीदें पाली नहीं जा सकतीं।

भाजपा 272 सीटों का दावा ठोंक रही है, क्योंकि नरेंद्र मोदी को मुद्दा बना कर, शेष मुद्दों को ध्वस्त करने में वह सफल रही है। सत्तारूढ़ कांग्रेस की सबसे बड़ी नाकामी यह है, कि वह भाजपा के द्वारा रचे गये मुद्दों के पीछे भागती रही है। चुनाव प्रचार के आखिरी दिन तक वह भाजपा के जाल में फंस कर नरेंद्र मोदी की मुश्किलें आसान करती रही। उसके पास समझदार कूटनीतिक और रणनीतिकारों का ऐसा अभाव है, कि वो समझ ही नहीं सकी कि अमेठी में चुनाव प्रचार में नरेंद्र मोदी के होने का जवाब बनारस में राहुल गांधी का रोड शो नहीं है। उन्होंने ‘आप‘ के अरविंद केजरीवाल की, नरेंद्र मोदी को दी गयी जबर्दस्त चुनौती में, सेंधमारी कर दी। जहां अरविंद केजरवाल के खिलाफ भाजपा अपनी पूरी ताकत झोंक चुकी है, और वह नरेंद्र मादी के भारी जीत के प्रति आश्वस्त नहीं है। मोदी जीत सकते हैं, मगर विश्व कीर्तिमान बनाने का उनका सपना ध्वस्त है।

इसके बाद भी यदि भाजपा राष्ट्रीय स्तर पर सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बन कर उभर आती है, तो भी 272 सीट उसके लिये टेढ़ी खीर है। कांग्रेस मरी नहीं है। आम आदमी पार्टी की मजबूती संगठनात्मक स्तर पर बढ़ सकती है। तीसरे मोर्चे की अनिवार्यता वास्तव में बढ़ जायेगी। वाम मोर्चा को शायद अक्ल आ जाये। जन समर्थन के बिना दलगत समर्थन की राह में भाजपा के लिये नरेंद्र मोदी ही सबसे बड़ी बाधा भाजपा के लिये बनेंगे। और यदि ऐसा हुआ तो मोदी संघ की थाली में राजनाथ सिंह का निवाला बनेंगे।

यह देखना दिलचस्प होगा, कि जिस मुद्दे के तहत चुनाव लड़ा गया, उस मुद्दे के लिये भाजपा क्या करती है?

नरेंद्र मोदी वित्तीय ताकतों को निवाला बनते हैं? या उनका फासिस्ट संगठन ही उन्हें मलबों में तब्दील करता है?

राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय ताकतें भारत में अपने मतलब की सरकार चाहती हैं, जो राजनीतिक रूप से उग्र राष्ट्रवादी और आर्थिक रूप से मुक्त बाजारवादी हो। नरेंद्र मोदी के निवाला बनने से हमें कोई आपत्ति नहीं है, मगर उनके साथ यदि देश निवाला बनता है, तो लड़ाई लम्बी होगी। जिसे देश की आम जनता को ही लड़ना होगा।

Print Friendly

2 comments

  1. आपकी भविष्यवाणी तो अक्षरशः गलत हुई और मोदी की सरकार पूर्ण बहुमत से आ गई. अब देश में पूंजीवाद का नंगा नाच होगा

    • ‘अब देश में पूंजीवाद का नंगा नाच होगा’ आपका कहना है, कम-ओ-बेश ‘वित्तीय ताकतों का निवाला’ बनना यही है। अब आप ही तय करें कि पूर्वानुमान सही है या गलत? कृपया आलेख को फिर से पढ़ें। धन्यवाद।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

Select language:
Hindi
English
Scroll To Top