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अमेरिकी जेहादी एरिक हारौन का अंत

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सीरिया के मुद्दे पर अमेरिकी सरकार अपने देश की आम जनता को धोखा देती रही है। धोखाधड़ी ओबामा सरकार की ही विशेषता नहीं है, जाॅर्ज बुश की सकरार इराक-अफगानिस्तान के मुद्दे पर धोखा दी। क्यूबा, वियतनाम आज भी जारी धोखा है। अब तो इस धोखे में वियतनाम की सरकार भी आ गयी है, और ‘ट्रांस पैसेफिक पार्टनरशिप‘ का सदस्य देश बन रही है, जिसका मकसद मुक्त व्यापार के नये क्षेत्र की रचना करना है।

विश्व समुदाय को धोखा देने का कारनामा लीबिया का पतन और कर्नल गद्दाफी की हत्या है।

9 अप्रैल को पूर्व अमेरिकी सैनिक एरिक हारौन के मौत की जानकारी दी गयी। एरिक सीरियायी विद्रोही गुट ‘फ्री सीरियन आर्मी‘ के साथ मिल कर सीरिया में बशर-अल-असद सरकार के खिलाफ, महीनों लड़ाई लड़ता रहा। बाद में, अमेरिकी एफबीआई ने, आतंकवादी होने का आरोप लगा कर हिरासत में ले लिया। महीनों जेल में रहने के बाद उसकी रिहाई हुई। 31 वर्षीय एरिक फीनिक्स एरिजोना में अपने पिता के घर में रहता था। परिवार वालों ने उसके अचानक मृत्यु की जानकारी दी। कारण अज्ञात है।

एरिक मध्य-पूर्व की यात्रा करने से पहले मिसौरी और केंसास के आर्मी बेस में काम करता था। जब उसकी मौत हुई, उस समय वह सीरिया के विद्रोही गुटों के साथ असद सरकार के खिलाफ जारी गृहयुद्ध में सक्रिय हिस्सेदारी निभा कर अमेरिका आने के बाद हिरासत और रिहाई के साथ कानूनी लड़ाई के कठिन दौर से गुजर रहा था। एरिक के ‘फेसबुक‘ पेज पर उसके परिवार वालों ने लिखा- ‘‘हमें बड़े दुख के साथ यह सूचित करना पड़ रहा है, कि हमारे प्रिय एरिक की मौत हो गयी है।‘‘

2000 से 2003 तक वह अमेरिकी सेना में रहा। न्यूयाॅर्क टाईम्स द्वारा यह जानकारी दी गयी कि ‘‘उसकी तैनाती कहीं बाहर नहीं की गयी थी।‘‘ इसलिये सीरियायी विद्रोहियों के साथ उसका होना और सीरियायी गृहयुद्ध में हिस्सा लेना, एक विवादास्पद स्थिति है। सीरिया में वह अल-कायदा से जुड़े आतंकी संगठन अल-नुसरा में शामिल हो गया। एरिक वहां आतंकी गुटों के साथ दो महीना सक्रिय रूप से गृहयुद्ध का हिस्सा रहा। उसने अपनी तस्वीरें और वीडियो, जिसमें वह हथियारों का प्रदर्शन करते हुए विद्रोहियों के साथ है, इंटरनेट पर लगातार पोस्ट करता रहा। जिसके साथ ‘अमेरिकी जेहादी‘ का उपनाम जुड़ गया था। वह इस्ताम्बुल, तुर्की में अमेरिकी दूतावास के लोगों से भी मिला था। और वहां उसने सीरियायी विद्रोहियों को समर्थन देने के बारे में बातें भी की थी।

सीरियायी विद्रोही गुटों से मिली जानकारी के आधार पर वो एरिक को अपने अंग्रेजी प्रवक्ता के रूप में जिम्मेदारी सौंपना चाहते थे, किंतु, एरिक ने उनके इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। एरिक ने एबीसी-15 से कहा था, कि ‘‘मैं कई अलग-अलग बटालियन के साथ लड़ा, मगर मैं फ्री सीरियन आर्मी के साथ था।‘‘ जिसे अमेरिका एवं पश्चिमी देशों का समर्थन हासिल था। यह भी सच है कि अमेरिकी सरकार फ्री सीरियन आर्मी को युद्धक सामान एवं हथियार देती रही है। सच यह है, कि वैश्विक स्तर पर -एशिया और अफ्रीका में- सबसे ज्यादा सक्रिय इस्लामी आतंकवादी संगठनों को अमेरिकी सरकार और यूरोपीय देशों का समर्थन एवं सहयोग मिलता रहा है, जिसमें अल कायदा और उससे जुड़े आतंकी संगठन भी शामिल हैं।

अमेरिकी सरकार ‘आतंकवाद के खिलाफ युद्ध‘ को अपने लिये किसी भी देश राजनीतिक अस्थिरता पैदा करा कर, सैन्य हस्तक्षेप के लिये करती रही है। सीरिया में भी उसका लक्ष्य यही था, और आज भी यही है। जिसके लिये अरब जगत में वह आतंकवादी गुटों का उपयोग करती रही है। सउदी अरब, जार्डन, कतर और तुर्की जैसे देश उसके मित्र देश हैं। जो आतंकवादियों को आर्थिक सहयोग देते हैं, हथियार और प्रशिक्षण शिविर अपनी जमीन पर चलाते हैं, जहां अमेरिकी सेना के अधिकारी और सीआईए मौजूद हैं। सीरिया में तुर्की की सीमा से ही आतंकी घुसपैठ कराया गया।

तुर्की के द्वारा ही सीरिया में रासायनिक हथियारों का उपयोग कराया गया और सीरिया की सेना पर रासायनिक हथियारों के उपयोग का आरोप रख नाटो देश एवं अमेरिकी सैन्य कार्यवाही की पृष्टभूमि बनाई गयी। आज भी अमेरिका सीरिया में ‘‘उदार‘‘ सीरियायी विद्रोहियों को घातक बड़े हथियारों की आपूर्ति कर आतंकवाद के खिलाफ युद्ध का प्रचार कर रहा है।

जेरेमी सी कामेन, जो कि एरिक हारौन के कानूनी सलाहकार इस रूप में हैं, कि वह अमेरिकी नागरिक है- ने ‘टाईम्स‘ को बताया कि ‘‘इस बात के कोई सबूत नहीं हैं, कि उनका अभियोगी रूढ़ीवादी -जेहादी- है।‘‘ उन्होंने कहा- ‘‘यह प्रकरण अमेरिकी कानून में पूरी तरह से अपने आप में अकेला प्रकरण है।‘‘ उन्होंने इसे एक ‘यूनिक केस‘ कहा।

कामेन ने पिछले साल कहा था- ‘‘मेरी जानकारी में ऐसी एक भी घटना नहीं है, जिसमें अमेरिकी सरकार अमेरिकी नागरिक पर, उसी के हितों से जुड़े लोगों एवं समूहों के साथ मिल कर संघर्ष करने पर, उस पर कोई आरोप लगायी हो।‘‘

6 महीने एकांत कारावास में गुजारने के बाद 19 सितम्बर 2013 को एरिक हारौन को रिहा कर दिया गया। और 9 अप्रैल 2014 को संदिग्द्ध स्थितियों में उसकी मृत्यु हो गयी।

वैसे भी, अमेरिकी एफबीआई और अमेरिकी गुप्तचर इकाईयों के जाल में फंसने के बाद किसी का साबूत निकल पाना मुश्किल है। एरिक का पूर्व अमेरिकी सैनिक होना, आतंकी गुटों के साथ मिल कर सीरिया के गृहयुद्ध में शामिल होना, खुलेआम अपने फेसबुक एकाउण्ट पर तस्वीरें जारी करना, तुर्की में अमेरिकी दूतावास जाना और सीरिया से अमेरिका वापस आना, अपने आप में उसकी हरकतों का और अमरिकी हितों के लिये काम करने का और सीरिया में सीरियायी विद्रोहियों को सहयोग देने की अमेरिकी नीति का, उसकी सम्बद्धता का प्रमाण है। इसके बाद भी एफबीआई के द्वारा उसे हिरासत में लेने और उसे कानूनी बखेड़ों में फंसाना इस बात का सबूत है, कि अमेरिकी सरकार अपने ही देश के नागरिकों के साथ कैसा खिलवाड़ कर रही है।

ब्रेडली मैनिंग, एडवर्ड स्नोडेन और एरोन स्वार्टज की श्रेणी में हम एरिक हारौने को नहीं रख सकते, मगर उसकी संदिग्द्ध मृत्यु एरोन स्वार्टज की संदिग्द्ध मृत्यु की याद जरूर दिलाती है। यदि यह आत्महत्या भी है, तो इसके लिये अमेरिकी सरकार ही दोषी है।

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