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जनतंत्र के लिये, जनसंघर्ष जरूरी है

7737754आम आदमी के हितों से जुड़े मुददों पर राजनीतिक दलों के हितों की सवारी, भारतीय संसद की विशेषता बन गयी है। देश में एक भी राजनीतिक दल ऐसा नहीं है, जो कह सके कि वह आम आदमी के हितों के साथ है। उन्होंने अपने दावे और विरोध को, अपनी हरकतों से बौना बना दिया है। जो हाल यूरोपीय संघ और यूरोपीय देशों की संसदों का हो गया है, कम-ओ-बेस वही हाल भारत के संसद की हो गयी है। सरकार जन विरोधी हो गयी है, और संसद जन विरोधी नीतियों को पारित करने वाली वैधानिक इकार्इ। देखा जाये तो, अब दर्शक दीर्घा में भी कोर्इ नहीं है। आम जनता जन प्रतिनिधियों को टीवी चैनलाें पर देख लेती है। वह नाराज होती है, शर्मिंदा होती है, मगर करती कुछ नहीं।

उसके सब्र का प्याला अभी भरा नहीं है? या वह कुछ करने के काबिल ही नहीं है? यह तो तय आप करें। मगर मुझे लगता है कि केंद्र की मौजूदा यूपीए सरकार, मनमोहन सिंह, संसद में विपक्ष और देश के सभी राजनीतिक दल उसके सब्र का प्याला भरने और उसे नाकाबिल प्रमाणित करने का काम बखूबी कर रही हैं। और मैं समझता हूं कि वो अच्छा कर रहे हैं। सभी ओट, सभी परदे हटा रहे हैं। वो अपने साथ देश की संसद और जनतंत्र की रजानीतिक प्रणाली को बेपर्द कर रहे हैं। महीनों के विवाद और पांच दिनों की संसदीय कार्यवाही को, कोर्इ तो नाम दे रहे हैं।

दिसम्बर 2012 का पहला सप्ताह भारतीय संसद के अवसान का काल है। खुदरा क्षेत्र में 51 प्रतिशत विदेशी पूंजी निवेश -एफडीआर्इ- पर लोकसभा में भी चर्चा हुर्इ, और राज्य सभा में चर्चा हुर्इ। अच्छे बयान आये और अच्छी लफ्फाजी भी की गयी। कहीं दुष्यंत जी की गजलें पढ़ी गयी तो कहीं मुजफ्फर रमजी की शेर। मगर दाद किसी को नहीं मिली। अच्छा लगा कि काठ के पुतलों ने लकड़ी की तलवार से अच्छे करतब दिखाये। संसद की सर्वोच्चता और संसद की गरिमा का भरम चूरचूर हो गया। यह भी लग गया कि मनमोहन सिंह के सुरक्षित जोखिम उठाने की नीति को कामयाबी मिल गयी है। साफ कुछ भी नहीं हुआ मगर एफडीआर्इ के पक्ष में संसद के बहंस को मान लिया गया। सत्ता पक्ष अब यह मानने के लिये स्वतंत्र है कि देश की संसद ने एफडीआर्इ के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। यह अलग बात है कि ऐसा हुआ नहीं है।

लोकसभा में 18 राजनीतिक दलों में से मात्र 4 राजनीतिक दल एफडीआर्इ के पक्ष में थीं और 14 इसके खिलाफ थीं। 224 सांसद पक्ष में और 282 सांसदों को आप खिलाफ में खड़ा कर सकते हैं। सरकार के पास बहुमत के लिये अपेक्षित 272 सांसदों के समर्थन का आंकड़ा भी नहीं है, लेकिन आंकड़ों का गणित यह है कि सपा और बसपा सहित 70 सांसद मतदान में नहीं रहे, उन्होंने अपने को अनुपसिथत कर लिया और 471 मतों में से सरकार के पक्ष में 253 मत मिले और विरोध में 218 मत पड़े। सरकार के लिये सब कुछ अच्छा रहा, जीत का झण्डा मनमोहन सिंह उठा लिये, जबकि सच यह है कि पीटने और पिटने वाला विपक्ष है। सपा और बसपा सचमुच अजीब सिथति में है, न पक्ष अपना है, न विपक्ष अपना है, बस अपनी खाल को बचाने का सौदा अच्छा है। ऐसे सांसदों और ऐसे राजनीतिक दलों के खिलाफ कार्यवाही होनी चाहिये, मगर देश के संविधान में ऐसा कोर्इ प्रावधान नहीं है। यह राजनीतिक भ्रष्टाचार का अनोखा कारनामा है।

सपा राममनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण की बातें करती हैं। बसपा अम्बेड़कर, कांशीराम और दलितों की राजनीति कर रही है। दोनों ने संसद में आम जनता के हितों की बातें की। एफडीआर्इ के विरूद्ध अपने को खड़ा किया, मगर इन्होंने लोक सभा में वाकआउट के जरिये सरकार को वाक ओवर दे दिया और राज्य सभा में बसपा सरकार के साथ खड़ी हो गयी। भाजपा ने कहा- ”यह सीबीआर्इ का दबाव है।” दोनों के खिलाफ आय से अधिक सम्पतित के मामले की कार्यवाही चल रही है। सपा इस तरह की सौदेबाजी 2007 में मनमोहन सरकार के द्वारा अमेरिका से परमाणु करार के समय पहले भी कर चुकी है, जब वाममोर्चा के द्वारा समर्थन वापस लिया गया था।

भारतीय राजनीति में किसी भी राजनीतिक दल का इतिहास पाक साफ नहीं है। राजनीतिक सौदेबाजी सबने की है। सरकार बनाने और सरकार बदलने का खेल पहले पांच साल में एक बार -आम चुनाव में- आम जनता को अपने पक्ष में ले कर खेला जाता था, किंतु अब मोर्चे की राजनीति ने, इस खेल को संसद के हर सत्र में बदल दिया है। आम जनता को किनारे से लगा दिया गया है। यदि गंदगी किसी में कम है तो वाम मोर्चा के ही राजनीतिक दल है। हां, उन्होंने ऐतिहासिक भूलें की है। यह सच है। अब उन्हें यह सोचना चाहिये कि-

• सत्ता से साम्प्रदायिक शकितयों को दूर रखने का फामर्ूला कितना निठल्ला है?
• आम जनता के हितों से सीधे तौर पर जुड़ने का समय क्या अब तक नहीं आया?
• क्या संसद से बाहर की लड़ार्इ और जनसंघर्षों की शुरूआत का यह सही समय नहीं है?

यदि जवाब आपके पास है कामरेड़, तो आपको समझ लेना चाहिये कि आपने जो ऐतिहासिक गलितयां की है, उसी की सजा है आज की संसद। यह तो आपको समझ ही लेना चाहिये कि जनतंत्र आज की राजनीति का सबसे बड़ा और कारगर हथियार है। ’21वीं सदी को अमेरिकी सदी में बदलने’ और ’21वीं सदी का समाजवाद’ दोनों, एक ही थैली के चटटे बटटे नहीं हैं, लेकिन, दोनों के लिये जनतंत्र की अवधारणायें, जरूरी हैं। अमेरिकी साम्राज्यवाद जनतंत्र के जरिये, दुनिया पर अपने बाजारवादी अधिपत्य को थोपता हुआ चल रहा है, और ’21वीं सदी का समाजवाद’ आम जनता के पक्ष में प्रतिरोध खड़ा कर रहा है। उसने यह प्रमाणित कर दिया है कि समाजवादी जनतंत्र ही पूंजीवादी जनतंत्र का एकमात्र विकल्प है। आज भारत की संसद में एफडीआर्इ को लेकर जो लड़ार्इ लड़ी जा रही है, वह इन्हीं संघर्षों का एक रूप हैं, जहां समाजवादी जनतंत्र और आम जनता के हितों के लिये संसद से निकल कर सड़कों पर आने की अनिवार्यता तो है, मगर आपकी सोच पर ताले जड़े हैं। न जाने आप क्यों ‘वाममोर्चा’ होने के बाद भी भारतीय चुनाव की राजनीति में आम चुनाव आते ही, तीसरे मोर्चे की बातें करने लगते हंै? उन्हीं राजनीतिक दलों से बातें करने लगते हैं, जो कहते कुछ हैं, और करते कुछ और हैं। सत्ता के लिये मोर्चें की रणनीति को अस्वीकार नहीं किया जा सकता, मगर आप जनता के पक्ष में खड़ा होना और सही सोच के साथ जनसंघर्षों को खड़ा करने की जरूरत हालांकि चुनावी समर में, ऊपरी नजारा यही होता है। दिखता यही है कि जाति समिकरण में बड़ा दम है। बस, एक सवाल- ”वित्तीय पूंजी की धर्म, जाति क्या है? उसके नस्ल के बारे में आप क्या कहेंगे? आर्इये, इस सवाल को थोड़ा और साफ कर दूं, राष्ट्रीय और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की पहचान क्या है? या उनके पीछे खड़ी साम्राज्यवादी शकितयां और उनके साथ खड़ीं अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकार्इयां- अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष, विश्व बैंक, फेडरल रिजर्व, विश्व व्यापार संगठन किस धर्म, जाति, सम्प्रदाय या नस्ल के हैं?”

मुद्रा और पूंजी की कोर्इ जाति नहीं होती। उसका अपना हित होता है। लाभ कमाना और अपने वर्चस्व को बनाये रखना। वह राष्ट्रीय सम्प्रभुसत्ता की दूसरी पहचान बन गयी है।

भाकपा ने संसद में बहंस के दौरान मनमोहन सरकार के द्वारा एफडीआर्इ के लिये जोखिम उठाने का जिक्र किया। माकपा के सीताराम येचुरी ने कहा- ”यह मुददा धर्मनिरपेक्षता या साम्प्रदायिकता का नहीं, बलिक आर्थिक नीति से जुड़ा हुआ है।” उन्होंने 1998 में आर्थिक सर्वेक्षण का भी जिक्र किया, जिसके अनुसार इस नीति से 20.25 करोड़ लोगों के भविष्य पर असर पड़ेगा। इन्होंने ही जानकारी दी कि अमेरिकी संसद ने काह है कि ‘वालमार्ट अमेरिका के छोटे व्यापारी और कारोबारियों के कब्र पर आखिरी कील की तरह है।” जिसे मनमोहन सिंह भारतीय अर्थव्यवस्था में ठोंकना चाहते हैं। अमेरिका से उधोगों का पलायन और बढ़ती हुर्इ बेरोजगारी इन्हीं बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की देन है। जबकि भारत की सरकार कह रही है कि रोजगार के नये अवसर बढ़ेंगे, किसानों को लाभ होगा, बिचौलियों का सफाया होगा, देश का कारोबार बढ़ेगा और विदेशी पूंजी निवेश होगा। हम समृद्ध हो जायेंगे। पटरी से उतरी अर्थव्यवस्था पटरी पर आ जायेगी।

सवाल तो यह है कि अमेरिका की सीनेट यदि इसे आपने कारोबारी कब्र पर कील समझती है? यदि यूरोप की अर्थव्यवस्था का संकट यही है? जो दिवालिया हो रही है, तो मनमोहन सिंह का यह तर्क कहां टिकता है? अमेरिकी सरकार ने आज तक किसी भी देश को, अपने हितों से ऊपर उठ कर, कभी भला नहीं किया। फिर भारत पर उसका इतना दबाव क्यों है कि संसद में कहा जाता है- ”प्रधानमंत्री जी को अमेरिका के बारे में नहीं, बलिक अपने देश के बारे में सोचना चाहिये।”

क्या यह नजारा कुछ अजीब नहीं है, कि देश के प्रधानमंत्री संसद में अमेरिकी हित और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के प्रतिनिधि नजर आते हैं?

क्या यह नजारा कुछ अजीब नहीं है, कि उनके सहयोगी दल, उनका हाथ बंटा रहे हैं?

क्या यह नजारा कुछ अजीब नहीं है, कि सपा और बसपा जैसे रजानीतिक दल एफडीआर्इ का विरोध तो करते हैं, मगर, सरकार का साथ देते हैं?

यह भी एक नजारा ही है मान्यवर, कि भाजपा और वाममोर्चा जो कभी एक दूसरे की साम्प्रदायिक और देशद्रोही करार देते थे, एक ही मुददे पर एक साथ खड़े हैं? और सबसे अजीब नजारा तो यह है कि नियम 184 के तहत बहंस और मतदान के बाद भी पक्ष या विपक्ष का निर्णय -एफडीआर्इ के प्रति साफ नहीं है। चरमराती हुर्इ वैशिवक वित्तव्यवस्था के लिये संभलने के नये अवसर रचे जा रहे हैं, हमें जिबह किया जा रहा है।

आम जनता का हित आंकड़ों में उलझा हुआ है, और आम आददमी को लतियाने की तैयारियां पूरी हो गयी हैंं। इसके बाद भी, देश की आम जनता के सब्र का प्याला अभी भरा नहीं है। यदि विरोध है, तो विरोध का सही मंच नहीं है।

साम्राज्यवादी ताकतों की घुसपैठ देश की वित्त व्यवस्था में ही नहीं, संसद में भी हो चुकी है। देश में हुए सभी राजनीतिक एवं आर्थिक घोटालों को एक साथ खड़ा कर दिया जाये तो हर घपले और घोटालों के पीछे से वित्तीय पूंजी का चेहरा ही उभर कर सामने आयेगा। मतलब(?) राष्ट्रीय हितों के विरूद्ध निजीकरण की नीतियां नजर आयेंगी। मनमोहन सरकार देश की ऐसी पहली सरकार है, जो खुलेआम राष्ट्रीय एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के हितों में काम कर रही है।

एक बात और भी है, कि इस व्यवस्था के खिलाफ जो लोग, भ्रष्टाचार का बैनर लिये फिर रहे हैं, और आम जनता के वे खैरख्वाह बने हुए हैं, आशंका इस बात की है कि उन लोगों के पीछे भी, वे ही लोग हैं जिनकी पकड़ में सरकार है। विरोध भी आपका और समर्थन भी आपके ही हाथों में है। एफडीआर्इ पर हुए बहंस, उसके निर्णयों का आप चाहे जहां रखें, मुददे की तरह फैसले भी पूर्व निर्धारित हैं। हम अमेरिका हो रहे हैं, हम यूरोप हो रहे हैं, मगर हमें अपनी लड़ार्इ तीसरी दुनिया के देशों की तरह ही लड़नी होगी। हमें इराक, अफगानिस्तान या लीबिया की तरह लड़ना होगा, या क्यूबा, वेनेजुएला और बोलेविया की तरह? यह तय करना ही होगा। जहां आम जनता के हाथों में सरकार है।

सरकार यदि जन विरोधी हो, और जनप्रतिरोध का झण्डा उठा कर चलने वाले भी जनविरोधी हों, तब पूरी व्यवस्था को बदलना ही एकमात्र रास्ता बच जाता है। हमारे सामने भी कुछ ऐसी ही सिथतियां हैं। संसद में देश के राजनीतिक दलों के चेहरे तो साफ हुए हैं, मगर उन चेहरों को समझने की समझ अभी साफ नहीं हुर्इ है। जनतंत्र के लिये जनसंघर्ष जरूरी है।

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