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वित्तीय ताकतों का वैश्वीकरण

gomitolo_902267343राज्यों के नियंत्रण से बाहर होती वित्तीय पूंजी का विस्तार तेजी से हुआ है, भारत भी उससे बाहर नहीं है। ‘वल्र्ड वेल्थ’ के इस साल की रिपोर्ट के अनुसार – भारत में करोड़पतियों की संख्या 2012 में 1,53,000 थी, जो 2013 में 1,56,000 हो गयी। एक साल में 3,000 लोग करोड़पति बन गये। यहां अरबपतियों की तादाद भी कम नहीं है। यूपीए की मनमोहन सरकार ने 6 अरबपतियों की तादाद को अपने 10 सालों के कार्यकाल में 70 तक पहुंचा दिया। आॅक्सफेम रिपोर्ट के आधार पर अब उनकी तादाद 100 के आंकड़े को पार कर रही है। अर्थव्यवस्था का उदारीकरण इस विकास दर की बड़ी वजह है। 2014 में यह रफ्तार थमेगी नहीं, क्योंकि मनमोहन सिंह यदि अमेरिकी स्कूल के अर्थशास्त्री हैं, तो नरेन्द्र मोदी उसी स्कूल के मेधावी छात्र हैं, जिनके हाथ में अब केन्द्र की सरकार है।

सरकार यदि चाहे तो, अपने देश की आम जनता के लिये बहुत कुछ कर सकती है – वित्ती पूंजी को नियंत्रित कर सकती है, प्राकृतिक सम्पदा, उत्पादन इकाईयों का राष्ट्रीयकरण कर सकती है, मूल्य एवं वितरण प्रणाली को अपने नियंत्रण में ले सकती है और सामाजिक विकास योजनाओं को, आम लोगों की हिस्सेदारी से पूरा कर सकती है, उस लूट को रोक सकती है जो समाज और आम लोगों के खिलाफ है। लेकिन, दुनिया की ज्यादातर सरकारें ऐसा कुछ नहीं कर रही हैं। वो वित्तीय पूंजी को राज्य के नियंत्रण से, पूरी तरह बाहर निकालने की साजिशों की साझेदार हैं। प्राकृतिक सम्पदा और उत्पादन इकाईयों का निजीकरण कर रही हैं। बाजार को बाजारवादी ताकतों के लिये मुक्त कर रही हैं। सामाजिक विकास योजनाओं को भी लूट का जरिया बना रही हैं। नरेन्द्र मोदी ने निजीकरण को राष्ट्रीय नीति में बदल दिया है।

अपनी अर्थव्यवस्था को बचाने के लिये उन्हीं ताकतों का हाथ बंटा रही हैं, जिनसे देश की अर्थव्यवस्था को सबसे बड़ा खतरा है, और जिन्होंने वैश्विक वित्तीय संकट को जन्म दिया। अब वित्तीय ताकतें राज्य की सरकारों के साथ मिल कर, वित्तीय संकट का लाभ उठा रही हैं। शोषण, दोहन और दमन पर टिकी समाज व्यवस्था बनाये रखने की ऐसी कोशिशें कर रहे हैं, जो विसंगतियों से भरी है। वो वित्तीय पूंजी की छड़ी से राज्य को बौना कर रही है, और बौनी सरकार से समाज को नियंत्रित करने की कोशिशें भी जारी हैं। उन्होंने मान लिया है कि पूंजी से बड़ी कोई ताकत नहीं है। जबकि पूंजी न तो उनके द्वारा पैदा की गयी वैश्विक संकट को संभालने की क्षमता रखती है, ना ही बढ़ते जन असंतोष को संभाल सकती है। सम्पत्ति वास्तव में एक मुर्दा वस्तु है।

भारत दुनिया के सबसे दौलतमंद लोगों के देशों की सूची में 16वें स्थान पर है। जिसके सामने उभरती हुई अर्थव्यवस्था के शानदार सपनों की तस्वीरें रख दी गयी हैं। जिसके विस्तृत बाजार से विश्व काॅरपोरेट को 1 ट्रिलियन डाॅलर, हर साल हासिल करने की पक्की उम्मीदें हैं। उन्होंने नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री और भाजपा के नेतृत्व में एन.डी.ए. सरकार को बनाने में अपनी साझेदारी का सबूत 2014 के आम चुनाव में दे दिया है। यह स्वाभाविक नहीं है, कि नरेन्द्र मोदी के नाम पर भाजपा को स्पष्ट बहुमत हासिल हो। वास्तव में यह राजनतिक दल – और काॅरपोरेट के बीच की साझेदारी का परिणाम है। जिसकी वसूली भी हो रही है। मोदी की सरकार बनाने का भारी मुनाफा काॅरपोरेट जगत ने कमाया है, और अब राजनीतिक मुनाफे की बारी है। उनके लिये अब भारत का कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं है, जहां अब उनकी नीतिगत वैधानिक उपस्थिति न हो। घुसपैठ का जमाना गुजर गया।

निजीकरण के मामले में नरेन्द्र मोदी दौड़ते हुए चल रहे हैं। वो पांच साल में कुछ ऐसा कर गुजरना चाहते हैं, जो मनमोहन सिंह दस साल में नहीं कर सके। उनकी तात्कालिक सफलता तय है, क्योंकि काॅरपोरेट उनके पक्ष में है और कांग्रेस जैसी विपक्षी पार्टियों की नीतियां भी निजीकरण की हैं। निजीकरण के लिये राजनीतिक जाल की मजबूत बुनावट हो चुकी है। वामपंथी राजनीतिक दल ध्वस्त हैं। वो किस घटना की बाट जोह रहे हैं, और उनकी नजरें कहां टिकी हैं? वो खुद नहीं जानते। उनकी सोच में तीसरे मोर्चे का खयाल है, और इस खयाल ने वाम मोर्चा के खयाल को अपनी मुट्ठी में जकड़ रखा है। वो बिना लड़े या चले ही थके-थके से हैं। भारतीय वाम मोर्चा के राजनीतिक दलों को देख कर आप कह सकते हैं, कि ‘उनकी मति भ्रष्ट है।‘ उनका यूं हासिये पर होना देश और देश की आम जनता के उतना ही विरूद्ध है, जितना देश में काॅरपोरेट सरकार होना। जिसके लिये न जतंत्र है, न जन समस्यायें और ना ही जन आकांक्षायें। वह अपनी व्यवस्था को बचाने और बढ़ाने के लिये आम जनता को कड़वी दवाईयां खिलाती है। बीमार उनकी वैश्विक अर्थव्यवस्था और राजनीतिक संरचना है, मगर दवाईयां वो आम जनता के गले के नीचे उतार रही हैं। भूख, गरीबी और बेरोजगारी के साथ रोज नयी कटौतियों का प्रस्ताव पेश करती हैं।

रिपोर्ट के आधार पर अधिक आय वाले व्यक्तियों की सबसे बड़ी संख्या अमेरिका में है। अमेरिका में 40,60,000 मिलिनियर हैं, जापान में 23,27,000, जर्मनी में 11,30,000 और चीन में 7,58,000 मिलिनियर हैं। दुनिया में कुल अधिक आय वाले व्यक्तियों की संख्या का आधे से अधिक 59.9 प्रतिशत हिस्सा इन चार देशों में है। रिपोर्ट में इस बात का उल्लेख है कि दुनिया में करोड़पतियों की संख्या 175 करोड़ हो गयी है, जिनके पास 52,630 अरब डाॅलर की सम्पत्ति है।

चंद लोगों के हाथों में दुनिया भर की सम्पत्ति का यूं जमा होते जाना ही इस व्यवस्था की सबसे बड़ी मुसीबत है, जिससे चाह कर भी वह पार नहीं पा सकती है। जिसकी वजह से सरकारें दीवालिया हो रही हैं। और आम जनता की दुश्वारियां रोज बढ़ती जा रही हैं। मगर सरकारें आम जनता के साथ होने के बजाये, वित्तीय ताकतों का साथ दे रही हैं, क्योंकि उन्होंने दुनिया की ज्यादातर सरकारों को अपने कब्जे में कर लिया है। यही कारण है कि सरकारें अब जन अपेक्षाओं का नेतृत्व नहीं करतीं। आम जनता के द्वारा चुनी हुई सरकारें भी अब आम जनता के लिये काम नहीं कर रही हैं। वो लोकतंत्र और लोक कल्याण की संवैधानिक अवधारणाओं से कट गयी हैं। आर्थिक विकास एवं सामाजिक विकास की दूरियों ने आम जनता और सरकारों को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा कर दिया है।

वित्तीय पूंजी ने पहले श्रम पर पूंजी की वरियता स्थापित की और अब वो राज्य पर बाजार की वरियता स्थापित करने में लगी है। वैश्विक मंदी के भयानक दौर में भी करोड़पतियों और अरबपतियों की बढ़ती तादाद ने यह स्पष्ट कर दिया है कि सरकारें किसके साथ हैं? यदि वो आम जनता के साथ होती तो मुक्त व्यापार, नव उदारवादी वैश्वीकरण और एकाधिकारवादी ताकतों के लिये अर्थव्यवस्था में निजीकरण की राह नहीं पकड़ती। अपने ही द्वारा निर्मित वैश्विक मंदी का लाभ उठाने वाली एकाधिकारवादी ताकतों के खिलाफ सख्त कार्यवाहियां करती। लोकिन सरकारें जन असंतोष को कुचलने के लिये सख्त कार्यवाहियां कर रही हैं।

यह विरोध और दमन वहां सबसे ज्यादा है जहां करोड़पतियों और अरबपतियों की तादाद सबसे ज्यादा है और वहां सबसे ज्यादा है, जहां इन वित्तीय ताकतों का हित सबसे बड़ा है, क्योंकि एकाधिकारवादी ताकतों का जनसमस्याओं की तरह ही वैश्वीकरण हो गया है। तीसरी दुनिया के देशों में जारी साम्प्रदायिक संघर्ष और लड़ाईयां इन्हीं ताकतों की वजह से हैं, जो राजनीतिक अस्थिरता पैदा कर सरकारों को जन विरोधी बनाती हैं। वो सरकार के वर्ग चरित्र को बदल देती हैं। वैश्विक वित्तीय ताकतों ने विश्व बैंक, अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसी अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकाईयों और विश्व व्यापार संगठन जैसी व्यावसायिक इकाईयों, निजी कम्पनियों और काॅरपोरेशनों के जरिये पूंजीवादी सरकारों को अपने जाल में फंसा रख है। सेण्ट्रल बैंक, फेडरल बैंक और रिजर्व बैंकों तथा दुनिया भर में फैले बैंकों की बुनावट ‘बैंक पूंजी‘ के रूप में इस तरह विस्तार पा ली है, कि जिन मुद्राओं को सरकारें अपनी गारण्टी देती हैं, वास्तव में वो पूरी तरह उनके नियंत्रण में नहीं होती। अमेरिकी फेडरल रिजर्व -जिसे अमेरिकी डाॅलर छापने का अधिकार है, और जिसे अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा का दर्जा भी हासिल है- वास्तव में अमेरिकी सरकार की नहीं बल्कि एक निजी इकाई है, जिसमें सरकार साझेदार है। और यही साझेदारी अब बाजार की साझेदारी में बदल गयी है।

राज्य और बाजार की यह साझेदारी ही नव उदारवादी वैश्वीकरण है, मुक्त व्यापार है, साम्राज्यवादी एकाधिकारवाद है, वित्तीय पूंजी की तानाशाही है।

राज्यों के नियंत्रण से बाहर हुई निजी वित्तीय पूंजी इतनी ताकतवर हो गयी है, कि अब वो सरकारें बनाती और बिगाड़ती है।

यूरोपीय देशों की सरकारें पूरी तरह उनके नियंत्रण में हैं।

अमेरिकी सरकार इन ताकतों के हितों का प्रतिनिधित्व कर रही है। उसकी संघीय व्यवस्था, उसकी आर्थिक संरचना, हजार से ज्यादा सैन्य अड्डों में फैली उसकी सेना, सी.आई.ए. और एफ.बी.आई. जैसी उसकी गुप्तचर इकाईयां ही नहीं उसकी शोध संस्थानों पर भी वित्तीय ताकतों का अधिकार हो गया है। आज व्हाईट हाउस और अमेरिकी कांग्रेस से ज्यादा शक्तिशाली वाॅलस्ट्रीट है।

तीसरी दुनिया में आज जो भी हो रहा है – युद्ध, गृहयुद्ध, इन्हीं ताकतों की कारस्तानियां हैं। जो अपने से असहमत सोच और समाज व्यवस्था के विरूद्ध हमलावर हैं। और यह हमला दुनिया की प्राकृतिक संपदा और अब तक के मानव समाज के विकास को अपने अधिपत्य में लेने की कार्यवाही है।

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