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बजट का रोडमैप – 2

35661आम बजट के जरिये बिछाये गये रोडमैप में नया कुछ खास नहीं है, पिछले दस सालों से यूपीए की मनमोहन सरकार जिस सड़क को बिछा रही थी, और बिछाने की योजना बना रही थी, एनडीए की नरेंद्र मोदी सरकार उस सड़क पर अपनी तख्तियां लगाते हुए चल रही है, जिसे ‘गुजरात माॅडल‘ कहा जा रहा है। जिसके बारे में पढ़ और सुन कर आपको ऐसा लगेगा, जैसे हिंदुस्तान की जमीन पर गुजरात नयी फसल की तरह उग आया है, पूरा का पूरा प्रदेश विकास यात्रा की सीढि़यां चढ़ गया है, वहां जो भी है, वह आकर्षक है। यदि, गुजरात के नक्शे को हिंदुस्तान पर बिछा दिया जाये तो, सारी दुनिया में देश के लिये ‘‘वाह-वाह‘‘ होने लगेगा।

गुजरात माॅडल के बारे में हमने ई-न्यूज के पिछले के अंकों में चर्चा की है, आप से आग्रह है, कि थोड़ी सी जहमत उठा लीजिये।

इस बजट के बारे में दो टूक कहा जा सकता है, कि ‘‘यह बजट उद्योग जगत को और विदेशी पूंजीनिवेशकों को सामने रख कर बनाया गया है। आम जनता के लिये बाकी जो भी है, वह सोच, फिक्र है, वायदों की खानापूर्ति है।‘‘

आईये देखें, नरेंद्र मोदी जी को हिंदुस्तान में क्या चाहिये?

मोदी जी को इण्डस्ट्रियल पार्क चाहिये, स्पेशल इकोनाॅमी जोन चाहिये। हाईटेक सीटी, जहाजों की ऊंची उड़ान, रेलों की तेज रफ्तार चाहिये। निवेशकों की तवज्जू और देश की ब्राॅण्डिग चाहिये। अर्थव्यवस्था में उद्योग जगत की साझेदारी और वल्र्ड काॅरपोरेट का सहयोग चाहिये। कृषि का औद्योगिकीकरण और उद्योगों का निजीकरण चाहिये। प्राकृतिक संसाधनों का भरपूर उपयोग और उपयोग के लिये हर एक क्षेत्र में काॅरपोरेट जगत की तगड़ी हिस्सेदारी चाहिये। मध्यम वर्ग का संतोष और समाज के बहुसंख्यक वर्ग के लिये जो बन जाये, वह भी चाहिये। उनकी चाहतों को अरूण जेटली ने बजट का जामा पहना दिया है। मनमोहन सिंह का जो साथ प्रणव मुखर्जी और पी0 चिदम्बरम दे रहे थे, वही साथ जेटली जी दे रहे हैं।

और यह साथ देना कुछ और नहीं उद्योग जगत की तनी हुई रस्सी पर ऐसे करतब दिखाना है, कि देश की आम जनता को लगे कि जो हो रहा है, वह उसके सामाजिक विकास, आर्थिक तरक्की और रोजी-रोजगार के लिये है। लोग खुश रहें और मुनाफा रस्सी तानने वालों के खजाने में जमा होता रहे। कुछ लोग इसे बाहर के पैसे पर सरकार के नियंत्रण के नजरिये से देख रहे हैं, जबकि सरकार किश्तों में नियंत्रण छोड़ने की योजना से संचालित हो रही है। गुजरात में कृषि का औद्योगीकरण, उद्योगों का तकनिकीकरण इस तरह किया गया है, कि 5 लाख से अधिक ऐसे बेरोजगारों की फौज तैयार हो गयी है, जिनके हिस्से कोई काम नहीं है। वहां काम की संभावनायें और काम के नये अवसर के पांव जम गये हैं। किसानों की जमीन सस्ते में लूटी जा चुकी है, सरकारी जमीनों को आबंटन सस्ते दामों में उद्योगपतियों को किया जा चुका है, सामाजिक विकास और आम जनता को दी जाने वाली सहुलियतें, उद्योग जगत को दी जा चुकी हैं। उनके मुनाफा के जितने दरवाजे है, वहां अच्छी आवा-जाही है। उनके लिये मोदी जी विकास पुरूष हैं। जो सरदार पटेल के स्टेच्यू आॅफ यूनिटी के लिये 200 करोड़ का आबंटन कर, अमेरिकी स्टेच्यू आॅफ लिबर्टी के समकक्ष खड़ा कर रही है। जिसकी देख-भाल अब अमेरिकी सरकार नहीं कर पा रही है, उसका सबसे बड़ा औद्योगिक शहर डेट्राॅयट दीवालिया हो चुका है। नीलामी हो रही है। राज्य सरकार अपना कर्ज नहीं पटा पा रही है और संघीय सरकार हाथ खींच ली है। शहर विरान, कारखाने खण्डहर हो रहे हैं। माफियाओं का कब्जा हर एक गली में है। पेशेवर अपराधियों के लिये शहर स्वर्ग है। इण्डस्ट्रियल पार्क और स्पेशल इकोनाॅमी जोन की हालत पतली है। जिन निवेशकों और औद्योगिक घरानों ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर कब्जा कर लिया है, अब तो अपना विस्तार सस्ते कच्चे माल, सस्ती मजदूरी और बड़े बाजार के लिये तीसरी दुनिया के देशों में पलायन कर रहे हैं। राज्य के नियंत्रण से बाहर हुई वित्तीय पूंजी के निशाने पर अपने विस्तार के लिये चीन के बाद भारत भी है। जिसके दम पर मोदी जी सपने बुन रहे हैं।

सरकार को अपने इशारे पर चलाने का गुर उन्होंने सीख लिया है। भारत की मोदी सरकार इस बात को जानती नहीं, हम यह नहीं मानते। हम मानते हैं, कि वह योजनाबद्ध तरीके से आगे बढ़ रही है। जिस रफ्तार से नरेंद्र मोदी आार्थिक सुधार के नाम पर निजीकरण की अनिवार्यता स्थापित कर रहे हैं, उसे देखते हुए कहा जा सकता है, कि विदेशी पूंजी निवेश की साझेदारी का सौदा पहले से तय है। वो उन्हीं शर्तों के तहत आधारभूत संरचना का निर्माण कर रहे हैं। बिजली-बत्ती, ऊर्जा, सड़क, परिवहन और खनिज सम्पदा का दोहन। दोहन के लिये राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को लीज और उत्पादन इकाईयों को उनके हाथों में सौंप कर बाजार में उनके वर्चस्व को बनाना। पीपीपी और एफडीआई का फार्मूला। सार्वजनिक क्षेत्रों को समेट कर निजीकरण को बढ़ाना।

नरेंद्र मोदी का होना वैधानिक औपचारिकताओं की पूर्ति और जन-प्रतिरोध की अड़चनों को हटाना है।

और यह दोनों ही बातें आम जनता के पक्ष में नहीं हैं। जिसके बारे में मीडिया में शोर है, कि ‘‘बजट अच्छे दिनों की आहट है‘‘, ‘‘सार्वजनिक एवं उपभोक्ताओं के हित में है।‘‘

कल भी…

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