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बजट का रोडमैप – 3

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देश की आम जनता महसूस तो कर रही है, मगर उसे बोलना नहीं आता। वह चाह कर भी बोल नहीं पाती। इसलिये यह मान लेना, कि उसे बोलना-बतियाना, नहीं आता उसके पास अपने भावों को व्यक्त करने की समझ नहीं है, गलत होगा। गलत है। और सरकारें यह गलती हमेशा से करती आयी हैं।

मीडिया बड़ी होशियारी से यह बताने की कोशिश कर रही है, कि जो भी हो रहा है, वह अच्छा है, कि आर्थिक विकास के लिये सकरार की नीतियां सही हैं, बजट में सभी वर्ग का खयाल रखा गया है। जबकि बजट अंधे की रेवड़ी है। आम जनता के हितों में जो भी है, वह उद्योग जगत के हितों से जुड़ा है। उद्योग जगत और आम जनता के बीच की साझेदारी कुछ ऐसी ही है। नरेंद्र मोदी इसे ही पीपीपी कहते हैं, 3 पी कहते हैं, समझ के हिंसाब से ‘पब्लिक-प्राईवेट पार्टनरशिप‘ है। यह सार्वजनिक-निजी की भागीदारी है। जिसका मतलब है, सार्वजनिक क्षेत्र को भेंड की तरह जिवट करो, आम लोगों को सस्ते श्रमशक्ति के स्थायी स्त्रोत में बदलो और जो मुनाफा हो, उसे निजी क्षेत्रों के हवाले करो।

वित्तीय ताकतों के दबाव में दुनिया भर की सरकारें जिस आरे बढ़ रही हैं, भारत के नरेंद्र मोदी भी वहीं कर रहे हैं।

इस ‘3 पी माॅडल‘ को विकसित करने के लिये 500 करोड़ का आबंटन बजट में किया गया है।

वित्तमंत्री अरूण जेटली ने आधारभूत ढांचा क्षेत्र को विकसित करने के लिये सड़क, बिजली, पानी, उड्डयन क्षेत्रों में ढांचागत सुधार के लिये जो कदम उठाये हैं, वह इन क्षेत्रों में ‘पूंजी निवेश‘ की परिस्थितियों को बनाने और निजी कम्पनियों को इन क्षेत्रों में करों और सहुलियतों में नयी छूट देना है। वह ऐसे विवादों का निपटारा भी जल्द से जल्द करना चाहती हैं।

नये स्मार्ट शहरों के लिये 70 अरब 60 करोड़ रूपये का प्रावधान है। मोदी सरकार देशी-विदेशी पूंजी निवेश के ‘फण्डा‘ को आजमा रही है। जिसमें मनमोहन सरकार को पर्याप्त सफलता नहीं मिली। 12वीं पंचवर्षीय योजना (2012 से 17 तक) में आधारभूत ढांचा क्षेत्र के लिये 59.5 खरब रूपये की आवश्यकता है। बैंक इस जरूरत को पूरा करने की स्थिति में नहीं है। यही कारण है, कि 110 ऐसे प्रोजेक्ट पूंजी के अभाव की वजह से लम्बित है, सरकार जिसे पूरा करना चाहती है। ऊर्जा, कोयला, स्टील और पेट्रोलियम क्षेत्रों में लम्बित प्रोजेक्ट में निजी कम्पनियों की हिस्सेदारी के लिये सकरार मरी जा रही है। वह अपने प्राकृतिक संसाधनों को न सिर्फ लुटा रही है, बल्कि, सरकार के वित्तीय अधिकारों और आय के स्थायी स्त्रोत में भी सेंधमारी करा रही है।

सच बतायें तो, आधारभूत ढांचे के निर्माण की सोच का आधार देश और आम लोगों के जीवन को बेहतर बनाने की सोच नहीं है, बल्कि आर्थिक विकास के नाम पर मुक्त बाजारवादी नीतियों के लिये मजबूत आधार बनाना है। सरकार राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय कम्पनियों और देशी-विदेशी निवेशकों के लिये इतनी जगह बनाती जा रही है, कि स्वाभाविक रूप से आम लोगों के लिये जगह कम पड़ती जा रही है।

सड़कों को बिछाना या सड़कों को चैड़ा करना गलत नहीं है, लेकिन सड़कें जब बिछती और चैड़ी होती हुई लोगों को कुचलती और खदेड़ती हुई आगे बढ़ती हैं, आम लोगों की तकलीफें बढ़ जाती हैं। सकरार कहती है- ‘‘चुनिंदा हाईवे को इंडस्ट्रियल पार्क, स्पेशल इकोनाॅमी जोन और इण्डस्ट्रियल काॅरीडोर के रूप में विकसित किया जायेगा।‘‘ 100 स्मार्ट शहर, इण्डस्ट्रियल पार्क, स्पेशल इकोनाॅमी जोन और इण्डस्ट्रियल काॅरीडोरों, में देश का बहुसंख्यक वर्ग कहां होता है? शायद यह बताने की जरूरत नहीं है। ऊर्जा और बिजली के लिये ही, राष्ट्रीयकरण के ओट में कायेला खदानों का निजीकरण किया गया। सरकार इसे ही बढ़ाने पर तुली है, बिजली के निजीकरण की शुरूआत हो गयी है। अल्ट्रा मार्डन सुपर क्रिटिकल कोल आधारित ताप विद्युत प्रौद्योगिकी के लिये 100 करोड़ का प्रावधान है।

रेल की पटरियां इस देश में माल गाडियों के लिये ही बिछायी गयी थीं, ताकि ब्रिटिश सरकार कच्चा माल जमा कर सके, सरकार यही कर रही है। जिसका बोझ आम लोगों पर बढ़ता रहा है।

पानी का निजीकरण विश्व काॅरपोरेट की नीतियां हैं। भारत में विश्व बैंक इस क्षेत्र में भारी निवेश कर चुका है। पानी के स्त्रोत और पानी के वितरण पर यदि निजी कम्पनियों और काॅरपोरेट जगत तथा वित्तीय इकाईयों का अधिकार होगा, तो आम जनता के साथ क्या होगा? भारत में इस बारे में कोई सोच नहीं है। जबकि ‘‘पानी को उत्पाद और लाभ का जरिया‘‘ बनाने की शुरूआत हो चुकी है। अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकाई और बहुराष्ट्रीय कम्पनियां न सिर्फ इस बारे में सोच चुकी हैं, बल्कि इसकी शुरूआत भी हो गयी है। बोतल में बंद पीने के पानी को देख कर कभी सोचने की कोशिश कीजियेगा, सारी बातें समझ में आने लगेंगी।

उड्डयन में निजी निवेश की सुविधा बढ़ा दी गयी है।

बजट में 50,000 करोड़ रूपये के ‘टैक्स फ्री इंफ्रास्ट्रक्चर बाॅण्ड‘ जारी करने की घोषणा बजट में हो चुकी है, ताकि आधारभूत ढांचे के लिये फण्ड की व्यवस्था हो सके।

आधारभूत ढांचे का निर्माण करने की सरकार की नीतियां कहां तक सफल होंगी? हमारे लिये सवाल यह नहीं है, बल्कि यह है कि उसके निर्माण की दिशा क्या है?

भारत में कृषि के साथ जो दूर्घटना दशकों से घट रही है, वह दूर्घटना इस बजट में भी है। जिस पर 60 प्रतिशत से ज्यादा आबादी अपनी जीविका के लिये निर्भर करती है। कौशल विकास कार्यक्रमों के जरिये सरकार खेत और किसानों के बीच की दूरियां बनाना चाहती है, क्योंकि विकसित देशों की कृषि व्यवस्था ‘काॅन्ट्रेक्ट फार्मिंग‘ और सरकार के सहयोग से चल रही हैं, और अब निजी कम्पनियों ने जमीन पर अपना अधिकार जमा लिया है। अमेरिकी खाद्यान्न उत्पादन पर बड़ी कम्पनियों का अधिकार है। कृषि का पूरी तरह उद्योगीकरण हो गया है। इस तरह सरकार की छूट का लाभ भी इन कृषि कम्पनियों को मिलता है, जहां किसान अपनी ही, जमीन पर खेतिहर मजदूर है। साथ ही खाद्यान्न भण्डारण और बाजार भी उनके नियंत्रण में है। इसलिये गांवों से किसानों को काट कर शहरों में लाने की योजना सस्ते मजदूरों को उपलब्ध कराने की सोच है। जिसका चैतरफा लाभ वित्तीय ताकतों को मिलता है। मोदी सरकार कृषि से बाजार पर आधारित अर्थव्यवस्था का विकास करना चाहती है।

इसलिये बाजार पर आधारित अर्थव्यवस्था के निर्माण की जो दिशा हमारे सामने है, वह देश की आम जनता के पक्ष में नहीं है। यहां तक कि वह राष्ट्रीय हित में भी नहीं है। यह उन लोगों के हित में है, जिनके लिये दुनिया एक बाजार है। जहां अपनी दुकान खोल कर वो ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाना चाहते हैं।

यह मुनाफा अब अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संतुलन की सीमाओं को लांघ चुका है। जिस वैश्विक मंदी की मार को दुनिया झेल रही है, और स्थापित अर्थव्यवस्थायें लड़खड़ा गयी हैं, उसकी वजह ही यह मुनाफा है। यूरोपीय संघ की पांच में तीन बड़ी अर्थव्यवस्थायें ध्वस्त सी हो गयी हैं, अमेरिकी सरकार पूरी तरह वित्तीय पूंजी -वाॅल स्ट्रीट और फेडरल रिजर्व- के रहम-ओ-करम पर है। चीन की अर्थव्यवस्था में तेजी से बढ़ता ठहराव और तेजी से बढ़ती सामाजिक एवं आर्थिक असमानताओं के विरूद्ध जनअसंतोष विस्फोटक हो रहा है। उस समय भारत का उन्हीं नीतियों पर आगे बढ़ना दूर्घटना को सुनिश्चित करना है।

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