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धुंध और कोहरे को चीर कर, निकल रहे हैं कुछ लोग

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सुबह जब होती है
किसी से
यह कहने की जरूरत नहीं पड़ती
कि सुबह हो गयी है।
लोग
जानते और मानते हैं,
कि धुंध और धुआं और घना कुहरा
सुबह के होने को रोक नहीं सकते,
आने वाले कल की शुरूआत
सुबह से होती है।
इसलिये,
सुबह के बारे में, मैंने किसी से कुछ नहीं कहा।

मैंने
महसूस किया
कि ‘‘घना कुहरा है,
सभी के चेहरे भीगे हुए हैं,
लोग
सिमटे सिकुड़े
और लिपटे हुए हैं धुंध की चादर में।‘‘
फिर भी,
कुछ लोग
धुंध की चादर चीर कर निकलते हैं।
और यह बात
मुझे अच्छी लगी।
सड़क के किनारे
खड़े पेड़ों को छूना मुझे अच्छा लगा,
जिनके पत्तों पर ओस की बूंदें
अपने नेजों को लिये
पारदर्शी जिरह बख्तर पहने
किसी टुकड़ी सा खड़ी हैं।
कि सुबह होने दें, जनाब
हमारी मुट्ठियों में
सूरज की चमकदार किरणें होंगी,
रात भर
हमने लोहा लिया है अंधेरों से।

मुझे लगा
पेड़ों को, कम्बल-रजाई की जरूरत नहीं,
गरम ओवर कोट
टोपी और मफलर की जरूरत नहीं,
पेड़ों के भीतर
ढंकी-दबी आग होती है।
वो डरते नहीं
उनके पांव उखड़ते नहीं,
वो खड़े होते हैं, अपनी जमीन पर तन कर।
सर्दी में
वे हाथ-पांव नहीं सेंकते
अपनी सूखी टहनियों को
झोंकते हैं, अलाव में।

मुझे लगा
पेड़ों के साथ होना
अलाव के साथ होना है,
जंगल-पहाड़
नदी-नालों के साथ होना है।
शहर में,
गांव-गिरांव
और पगडण्डियों के साथ होना है,
उनके साथ होना है
जो चलते हैं, नंगे पांव
और पहाड़ों के शिखर पर पहुंचते हैं
जहां कुहरा सबसे पहले छंटता है।

जहां सूरज
अपने कंधे से उतार कर उजाले की गठरी खोलता है,
गर्मजोशी से, ओस की बूंदों से हाथ मिलाता है।
सुबह के बारे में
मैंने किसी से कुछ नहीं कहा
कि धुंध की चादर चीर कर निकलते लोग
पेड़ों के साथ होने लगे हैं।
कि पेड़ों के साथ होना
सुबह के साथ होना है।
सुबह के साथ होना
मुझे अच्छा लगता है।

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2 comments

  1. अच्छी कविता है . बधाई

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