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गाजापट्टी – लंदन में 1,50,000 लोगों का विरोध प्रदर्शन

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गाजा पट्टी पर हुए इस्त्राइली हमले और फिलिस्तीनियों की सुनियोजित हत्या का विरोध दुनिया भर में हो रहा है। विश्व समुदाय के ज्यादातर देश और विश्व जनमत इस मुद्दे पर एक साथ है, लेकिन न तो इस्त्राइली सरकार को इस बात से कोई खास फर्क पड़ रहा है, ना ही अमेरिकी सरकार को। कह सकते हैं हम कि वो अपनी युद्ध की योजनाओं को अंजाम दे रहे हैं। मध्य-पूर्व एशिया की अस्थिरता को सुनिश्चित कर रहे हैं। वो लगातार हत्यायें कर रहे हैं और विश्व जनमत कह रही है- ‘‘अब और हत्यायें नहीं।‘‘

26 जुलाई को वैश्विक स्तर पर विरोध प्रदर्शन हुआ। तेहरान से लेकर पेरिस तक, इस्ताम्बुल से लेकर बर्लिन तक, भारत से लेकर न्यूजीलैण्ड तक, सिंगापुर से लेकर ब्यूनेस आयरस तक, ट्यूनेसिया से सियोल तक, दक्षिण अफ्रीका के डर्बन से लेकर आयरलैण्ड के डबलिन तक, ओसलो से सैनफ्रांसिस्को तक। सभी महाद्वीप के सैंकड़ों शहरों में, हजारों और लाखों की तादाद में प्रदर्शन कर रहे लोगों ने गाजा पर हो रहे इस्त्राइली हमले को बंद करने की मांग की। उन्होंने फिलिस्तीनियों की की जा रही हत्याओं का विरोध किया।

26-27 जुलाई को आॅस्ट्रेलिया के कई बड़े शहरों में हजारों लोगों ने विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लिया।

‘‘नो मोर डेथ्स -इस्त्राइली-फिलिस्तीनी पीस नाऊ‘‘ के बैनर के तहत इस्त्राइल की राजधानी तेल अबीब में लगभग 5,000 प्रदर्शनकारी इक्कट्ठा हुए। प्रदर्शकारियों ने यहूदी और अरबों की दुश्मनी को अस्वीकार करते हुए गाजा पर हो रहे हमलों को बंद करने और वहां कब्जा छोड़ने की मांग की। उन्होंने मारे गये लोगों को श्रद्धांजली दी और मोमबत्तियां जलायी। यह प्रदर्शन और भी बड़ा होता यदि इस्त्राइली पुलिस द्वारा इसे प्रतिबंधित न घोषित किया गया होता। उन्होंने प्रदर्शनों पर रोक लगा रखी है।

25 जुलाई को उत्तरी इस्त्राइल के अल-फाहम में 3,000 लोगों ने प्रदर्शन किये। हायता के करीब अरब-इस्त्राइली शहर में 1,000 लोगों ने फ्यूरीडस में हमला करने के विरोध में ‘मार्च‘ किया। इस्त्राइल के हायोम के अनुसार कई प्रदर्शनकारी ताबूत लिये हुए थे और नारे लगा रहे थे- ‘‘इसमें अरब राष्ट्रों का जमीर है, जो गाजा के लिये कुछ नहीं कर रहे हैं।‘‘

28 जुलाई को ‘फिलिस्तीन साॅलिडेट्री प्रोटेस्टर्स‘ ने बीबीसी के ब्रिस्टल के मुख्यालय के सामने गाजा में चल रहे भीषण हमले का पक्षपात पूर्ण ‘कवरेज‘ देने के विरोध में अपने ‘टीवी-लाइसेन्स‘ को जला दिया।

गाजा में युद्ध विराम और शांति के लिये संघर्षरत समाजसेवियों ने बीबीसी ब्रिस्टल के ‘ग्राउण्ड‘ पर 23 जुलाई से ही कब्जा कर रखा है। बीबीसी ने प्रदर्शनकारियों को मैदान खाली करने का नोटिस दिया है, और धमकी दी है, कि यदि वो अवैध कब्जे को खत्म नहीं करेंगे, तो अदालत के जरिये कार्यवाही होगी। लेकिन प्रदर्शनकारियों ने स्पष्ट कर दिया है, कि ‘‘वो तब तक वहां बने रहेंगे, जब तक बीबीसी फिलिस्तीन की स्थितियों की निष्पक्ष और सही जानकारी देना शुरू नहीं करता है।‘‘ एक प्रदर्शनकारी ने कहा- ‘‘यह हास्यास्पद है, कि वो हमारे कब्जे को अवैध कह रहे हैं, और इस्त्राइल के बारे में यह नहीं कहते।‘‘

url20 जुलाई को लीड्स -पश्चिमी यार्कशायर- में 1,000 से ज्यादा प्रदर्शनकारियों ने इस्त्राइल के खिलाफ प्रदर्शन किया। उन लोगों ने बीबीसी के क्षेत्रीय मुख्यालय तक ‘मार्च‘ किया। इस प्रदर्शन में हिस्सा लेने वाले ज्यादातर लोग युवा थे। उनके हाथों में ली गयी बड़ी तख्तियों में लिखा था- ‘‘बीबीसी- ब्रिटिश ब्रेनवाशिंग चैनल‘‘, प्रदर्शनकारी नारे लगा रहे थे- ‘‘वी आर आॅल फिलिस्तीनियन नाउ।‘‘

लीड्स का यह प्रदर्शन लंदन के 1,00,000 लोगों के प्रदर्शन के दूसरे दिन हुआ। जिसकी खबर बीबीसी के प्रमुख समाचार में नहीं दी गयी। 19 जुलाई को हुए इस प्रदर्शन के लिये लोग ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन के 10 डोविंग स्ट्रीट के पास जमा हुए और वहां किंगस्टन स्थित इस्त्राइली दूतावास तक उन्होंने रैली निकाली। विरोध प्रदर्शन के खत्म होने के बाद भी हजारों लोग दूतावास तक पहुंचते रहे। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को घेर रखा था। इस मार्च को सम्बोधित करते हुए एम. पी. जाॅर्ज ग्लोवे ने मलेशियायी एयर लाईन्स के एम.एच-17 यात्री विमान के पूर्वी यूक्रेन में मार गिराये जाने तथा 298 लोगों के मारे जाने और 300 फिलिस्तीनियों के इस्त्राइली हमले में मारे जाने की खबरों में किये गये भेद-भाव का उल्लेख किया।

उन्होंने कहा- ‘‘एक तरफ इन्हीं समाचार पत्रों, टेलीविजन स्टेशनों और राजनेताओं ने 300 फिलिस्तीनियों के मारे जाने की खबरों की पूरी तरह अनदेखी की, जो कि रूस के खिलाफ प्रतिबंध लगाने और युद्ध की धमकी दे रहे थे। वहीं दूसरी तरफ वो हथियार, पैसा और कूटनीतिक और मीडिया सपोर्ट के साथ इस्त्राइली हत्यारों का साथ दे रहे थे।‘‘ उन्होंने सवाल किया- ‘‘क्यों? यह दोहरा मापदण्ड क्यों है? क्यों वे यूक्रेन और गाजा में बहाये गये खून में फर्क कर रहे हैं? क्यों इनके लिये गाजा से ज्यादा यूक्रेन महत्व रखता है?‘‘

इस रैली के आयोजकों ने कंजरवेटिव कैमरन सरकार पर इस्त्राइल के खिलाफ प्रतिबंध लगाने और उसे अंतर्राष्ट्रीय कानून को मानने के लिये विवश करने की मांग की।

इस प्रदर्शन से ठीक पहले ब्रिटिश प्रधानमंत्री कार्यालय के प्रवक्ता ने ‘रिपोर्टर्स‘ को सूचित किया, कि ‘‘डेविड कैमरन ने अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के साथ एक संयुक्त वक्तव्य जारी किया है। जिसके तहत इस्त्राइल के द्वारा गाजा पर किये गये हमले को इस आधार पर जायज ठहराया है, कि गाजा की तरफ से होने वाले राॅकेट हमलों से खुद को सुरक्षित करने के लिये उसे बराबर का हमला करने का अधिकार है।‘‘

अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा और ब्रिटिश प्रधानमंत्री कैमरन, क्या यह अधिकार सिर्फ अमेरिकी लाॅबी, नाटो देश और सिर्फ इस्त्राइल को प्राप्त है, या दुनिया के बाकी देशों को भी है? तीसरी दुनिया के देशों के बारे में वो क्या सोचते हैं? जहां उनकी सेनाओं ने हमले किये, तख्तापलट किये, लोगों का जनसंहार किया। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान पर्लहार्बर पर जापानी हमले के बाद संयुक्त राज्य अमेरिका और उसके सैनिक ठिकानों पर कभी किसी देश ने हमला नहीं किया। लेकिन अमेरिकी सेनायें सारी दुनिया में, तीसरी दुनिया के देशों पर, हमले करती रही है। युद्ध और गृहयुद्ध की स्थितियां बनाती रही है, यह प्रचारित करती रही है, कि विश्व के शांति एवं स्थिरता को खतरा है। यही तर्क है उसके पास, दुनिया के बाकी देशों -खास कर तीसरी दुनिया के देशों- पर हमला करने का। ओबामा और कैमरन द्वारा इस्त्राइल के साथ होने का, दिये गये तर्क को, यदि मान लिया जाये तो, दुनिया के शेष देशों को अमेरिका और उसके खेमे के देशों पर हमला करने का अधिकार उन्हें है।

पूर्व औपनिवेशिक और साम्राज्यवादी देशों की सोच दीवालिया हो गयी है। वो खुद दुनिया की शांति और स्थिरता के लिये खतरा बन चुके हैं।

इस्त्राइल के खिलाफ हो रहे जनप्रदर्शन और विश्व समुदाय के देशों के द्वारा की जा रही निंदा और लातिनी अमेरिकी देशों के द्वारा उससे राजनीति सम्बंधों के समाप्ति की घोषणां, सिर्फ इस्त्राइल नहीं, बल्कि सतह के नीचे साम्राज्यवादी ताकतों के लिये बढ़ती नाराजगी है। एक महाद्वीपीय एवं वैश्विक सोच है। यूरोपीय देशों में हो रहे विरोध प्रदर्शनों का महत्व इसलिये विशेष है, कि यूरोपीय संघ के सदस्य देशों की सरकारें भी इस्त्राइल के साथ नहीं हैं। 23 जुलाई को राष्ट्रसंघ ह्यूमन राईट्स कांउसिल में हुए मतदान में 47 सदस्य देशों में से 29 मत फिलिस्तीनियों के पक्ष में पड़े और 1 मत विपक्ष में पड़ा, जोकि अमेरिका का था, और 17 देशों के प्रतिनिधियों ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया, जिसमें 9 देश यूरोपीय संघ के सदस्य देश थे।

लंदन के अलावा ब्रिटेन में बर्मिंघम, ब्रेडफोर्ड, ब्रिंघटन, कैम्ब्रिज, कार्डिफ, डोनकाॅस्टर, एडिनबर्ग, हेस्टिंग, हिबटन ब्रीज, लंकास्टर, लीसेस्टर, लिंकन, लिवरपुल, मिडिल्सब्रा, आॅक्सफोर्ड, न्यूकैसल, प्रिस्टन, सेल्सबरी, शेफील्ड, साउथ एम्पटन और स्ट्राउट शहरों एवं नगरों में विरोध प्रदर्शन हुआ।

9 अगस्त को लंदन में बीबीसी मुख्यालय -हाइड पार्क- के सामने मीडिया के अनुमान से 1,00,000 लोगों ने प्रदर्शन किया। जबकि आयोजकों के आधार पर 1,50,000 से अधिक लोगों ने प्रदर्शन किया।

लंदन में स्थित इस्त्राइल के दूतावास के प्रवक्ता ने कहा कि- ‘‘हमें इस विरोध प्रदर्शन से कोई फर्क नहीं पड़ता। यह आतंकवादियों को समर्थन देना जैसा है।‘‘

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