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गाजा – लातिनी अमरिकी देशों की कूटनीतिक एवं सहयोग की पहल

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गाजा पर हुए इस्त्राइली हमले और फिलिस्तीनियों की, की जा रही हत्या के विरूद्ध, दुनिया भर में हो रहे विरोध प्रदर्शनों के साथ, लातिनी अमेरिकी देशों ने, आम फिलिस्तीनी और फिलिस्तीन के दावों के पक्ष में, अपनी ओर से गंभीर पहल की है।

इक्वाडोर के राष्ट्रपति राफेल कोरिया ने इस्त्राइल की अपनी राजकीय यात्रा को निरस्त कर दिया। उन्हें 6 अगस्त को इस्त्राइल के दौरे पर जाना था। उन्होंने इस्त्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और इस्त्राइली सरकार के महत्वपूर्ण राजनेताओं से होने वाले मुलाकातों को निरस्त करने की घोषणां के साथ उन पर ‘जाति संहार‘ का आरोप लगाया। उन्होंने अपने रेडियो साक्षात्कार में कहा कि ‘‘इस्त्राइली डिफेन्स फोर्स ने एक महीने से भी कम समय में 1880 से ज्यादा फिलिस्तीनियों की हत्या की है, जिनमें से ज्यादातर आम नागरिक हैं। मरने वालों में 430 बच्चे भी हैं।‘‘

राफेल कोरिया ने कहा- ‘‘दक्षिण अमेरिकी देशों में इक्वाडोर वह पहला देश है, जिसने इस्त्राइल से अपने राजदूत को वापस बुलाया। हम इस जातीय संहार की निंदा करते हैं।‘‘

4 अगस्त को इक्वाडोर ने घोषणा की, कि ‘‘वह फिलिस्तीन में अपने दूतावास को खोलेगा, जिसके लिये कूटनीतिक पहल की जा चुकी है, और रामल्लाह में राजनीतिज्ञों का एक दल पहुंच चुका है।‘‘

अमेरिकी विरोध की वजह से ही राष्ट्रसंघ में फिलिस्तीन को एक देश का दर्जा हासिल नहीं है। अमेरिकी सरकार उनकी राष्ट्रीयता को नकारती रही है।

इसी बीच उरूग्वे ने भी घोषणा किया है, कि ‘‘वह इक्वाडोर के इस निर्णय को मान्यता देते हुए फिलिस्तीन में अपने दूतावास की स्थापना करेगा।‘‘ 8 अगस्त को ‘टेलेसुर इंग्लिश‘ ने बताया कि ‘‘अर्जेन्टीना, ब्राजील, चिली, पेरू और वेनेजुएला भी फिलिस्तीन में अपने देशों के दूतावास खोलने की घोषणां की है।‘‘

यह घोषणां ऐसे समय में की गयी है, जब अमेरिकी सहयोग से इस्त्राइली सेना फिलिस्तीनियों के खिलाफ ऐसी कार्यवाही कर रही है, जिसका मकसद फिलिस्तीन को आखिरी तौर पर कुचल देना है, ताकि उसके होने और उसके दावों को तोड़ा जा सके। चारो आरे से उनकी घेराबंदी की जा चुकी है। बिजली, पानी, दवाईयों और राशन की भारी कमी है। राजनीतिक दूतावास खोलने का सीधा सा मतलब है, कि लातिनी अमेरिकी देश फिलिस्तीन को एक देश का दर्जा देते हैं, और फिलिस्तीन के दावों को विश्व मंच पर खुला समर्थन देते हैं। पिछले महीने हुए ब्रिक्स देशों के ब्राजील सम्मेलन में ही यह सच खुल कर सामने आ गया था, कि ब्रिक्स देश और लातिनी अमेरिकी देशों का एक बड़ा समूह न सिर्फ इस्त्राइली हमलों की निंदा करता है, बल्कि दुनिया में हो रहे विभाजन की रेखाओं को भी गहरा कर रहा है। कि अमेरिकी साम्राज्य, यूरोपीय संघ और नाटो देशों के सामने बनता हुआ नया समिकरण सिर्फ आर्थिक ही नहीं कूटनीतिक चुनौती भी है। आपसी सहयोग एवं समर्थन का अब सामरिक महत्व भी बढ़ गया है। रूस का विश्व राजनीति में अभ्युदय और चीन की आर्थिक दावेदारी का सकारात्मक अर्थ है। जिनके साथ अब लातिनी अमेरिकी महाद्वीपीय एकजुटता भी है, जहां बहुध्रुवी विश्व की अवधारणायें विकसित हो रही हैं। जो स्वाभाविक रूप से अमेरिकी एकाधिकारवाद के विरूद्ध है।

फिलिस्तीनियों की की गयी घेराबंदी के विरूद्ध को वेनेजुएला 16 टन मानवीय सहायता गाजा पट्टी के लिये भेज रहा है। 10 टन सहायता वेनेजुएला की सरकार दी है, और 6 टन सहायता वहां की आम जनता के द्वारा सामूहिक रूप से जमा की गयी है। 7 अगस्त को भेजी गयी सहायता मिस्त्र पहुंच चुकी है, और वहां से गाजा यह सहायता मिस्त्र के माध्यम से गाजा पट्टी भेजी जायेगी, क्योंकि इस्त्राइल ने इस क्षेत्र की घेराबंदी कर रखी है।

वेनेजुला के मानवीय सहायता को गाजा पट्टी तक पहुंचाने के लिये वेनेजुएला के विदेश मंत्री एलियास जोआ 6 अगस्त को मिस्त्र पहुंचे। मिस्त्र की सरकार से वार्ता के बाद विदेश मंत्री ने बताया कि ‘‘सहायता के गाजा पट्टी तक पहुंचाने का काम मिस्त्र की सरकार के सहयोग से किया जायेगा।‘‘ जिसमें दवाईयां, मेडिकल सर्जरी के सामान, पीने का पानी, जल्दी खराब न होने वाले खाद्य पदार्थ, कपड़ा, जूता, कम्बल, बिस्तर, टेंट, फ्लस लाईट, बैट्री जैसी दैनिक उपयोग की चीजें हैं।

वेनेजुएला के विदेश मंत्री ने बताया कि ‘‘वेनेजुएला की सरकार 2,42,000 बैरल तेल, वार्षिक, गाजा पट्टी भेजेगी, ताकि उस क्षेत्र के पुर्ननिर्माण में वह सहायक हो सके।‘‘ उन्होंने कहा- ‘‘इसका उपयोग स्कूल, अस्पताल, आम जनता के उपयोग और निजी घर -जोकि इस्त्राइली हमले की वजह से नष्ट हो गये हैं, उनके पुर्ननिर्माण में किया जायेगा।‘‘

फिलिस्तीन के विदेश मंत्री रियाद-अल-मलिकी 11 अगस्त को वेनेजुएला पहुंचे। उनकी यह यात्रा फिलिस्तीन के लिये अंतर्राष्ट्रीय समर्थन हासिल करने के उद्देश्य से की गयी यात्रा थी। इसी साल मई में फिलिस्तीन के राष्ट्रपति मोहम्मद अब्बास ने भी वेनेजुएला की यात्रा की थी।

लातिनी अमेरिकी देशों की कूटनीतिक एवं सहयोग की यह पहल विश्व जनमत के उन भावों के अनुकूल है, जिसकी वजह से वह फिलिस्तीनियों के पक्ष में सड़कों पर है।

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