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मेरी सूरत आपसे अलग नहीं!

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मैं नहीं जानता, मगर कुछ लोग कहते हैं, ‘‘बंदूक में आत्मा होती है।‘‘ जितना बड़ा हथियार होता है, उसमें उतनी ही बड़ी आत्मा होती है।

आप सोच सकते हैं, कि ‘‘भला बंदूक में आत्मा कैसे हो सकती है?‘‘

मैंने भी यही सोचा था, और बंदूक की नाल से नजरें सटा कर भीतर झांका, वहां गहरा अंधेरा था, मुझे कुछ नहीं दिखा।

पहले मैं सोचता था, चमगादड़ों को रात में दिखता है। बहुत बाद में पता चला क उन्हें दिखता नहीं, वो ध्वनि की प्रतिध्वनि से जान लेते हैं, कि अंधेरे में क्या है?

मुझे लगा- शायद बंदूक की नाल में जो अंधेरा है, जहां कुछ है, पर नजर नहीं आता, शायद उसे देखने के लिये चमगादड़ की दृष्टि होनी चाहिये, प्रतिध्वनि से वस्तु की आकृति गढ़ने, उसे जानने और समझने की, क्षमता होनी चाहिये।

मैं चमगादड़ बन नहीं सका, इसलिये बंदूक के अंदर की आत्मा को देख नहीं सका, मगर मैंने मान लिया कि, बंदूक की नाल में जो अंधेरा है, वहां बंदूक की आत्मा रहती है। बंद, सिल पैक और पूरी तरह से सुरक्षित।

मैंने बंदूक की नाल को हल्के से सहलाया। चिकना, सपाट, बिना रोएंदार, सख्त मगर सर्द। उसमंे न तो कंपकपाहट हुई, ना ही किसी संवेदना का संचार हुआ।

मैंने इंसानों को सहलाया है, जानवरों को सहलाया है, उनके रोएंदार खाल में अजीब सी सनसनाहट होती है, उष्णता होती है, गरमाहट और नमी होती है। मगर बंदूक की नाल सपाट और ठंड से लिपटी होती है, न तो उसे पसीना आता है, न वह स्पर्श की संवेदनाओं से भर उठती है। मगर एक बात है, बंदूक की नाल सहलाते ही मेरे अंदर उत्तेजना भर जाती है। ऐसा लगता है मुझे, जैसे कहीं कोई सोता फूट रहा है, फूट कर मेरे अंदर बहने लगा है। जी चाहता है, नाल के कुन्दे की ओर बढ़ना और उसे सच की तरह मान लेना। सच को जीने की आदत डाल लेना। जोकि मेरे लिये विसंगतियों से भरा, भयावह रहा है।

मेरे अंदर एक भयानक सच जन्म लेता है। जो है मैं उसे बदलना चाहता हूं। जो नहीं है, मैं उसे पाना चाहता हूं। मगर, मैं सच की तस्वीर देख नहीं पाता, यही कारण है कि मेरा सच मुझे भयावह लगता है, अनजान और अबूझ लगता है।

जिसे मैंने जीया है, उसका अंजान और अबूझ होना, मुझे बुरा लगा।

आप पूछ सकते हैं- ‘‘वह भयावह सच क्या है?‘‘

मैं नहीं जानता, मगर मेरे चारो ओर आग जलने लगती है, मैं लपटों से घिर जाता हूं। मुझे लगता है- जलती हुई झोपड़ी के भीतर मैंने अपनी बूढ़ी मां की चीख सुनी थी, मुझे लगता है, अपने गोद के बच्चे को बचाने के लिये मेरी पत्नी जल कर मांस के अधजले ढेर में बदल गयी थी। मुझे यह भी लगता है, कि मैं अपनी झोपड़ी के साथ जल कर राख हो गया हूं।

आप कहेंगे- ‘‘यदि मैं जल कर राख हो गया, तो बंदूक की नाल पर अंगुलियां कौन फिरा रहा है?‘‘

मैं नहीं जानता, मगर कोई है जो ऐसा कर रहा है। नाल पर अंगुलियां फिराने के लिये लंबी ट्रेनिंग मिली है उसे, उसे एक वर्दी पहना दी गयी है। कुछ लोग वर्दी सोच समझ कर पहनते हैं, और कुछ लोग सिर्फ इसलिये पहन लेते हैं, कि उनके पास पहनने के लिये कोई कपड़ा नहीं होता। यह सच है या झूठ नहीं जानता, मगर मुझे लगता है, कि कपड़ों की जरूरत शरीर से ज्यादा आत्मा को होती है। उसका नंगा होना बर्दाश्त नहीं होता।

आपने मुझे देखा तो नहीं, आप नहीं जानते, मेरी सूरत कैसी है? मैं दिखता कैसा हूं?

नहीं, मैं भयानक नहीं हूं, मेरी सूरत भयानक बना दी गयी है। भिंचे हुए जबड़े, सख्त खाल, सर्द निगााहें और भावहीन हृदय से मेरा निर्माण किया गया है। जबकि, मैं सूली पर टंगे हुए आदमी की तरह हूं, जिसकी संवेदनाएं उसमें सिमटती चली जाती हैं। मौत जैसे-जैसे उसके करीब आती है, उसकी संवेदनाएं सिकुड़ती और विस्तार पाती रहती हैं। जो सूली पर टंगा नहीं है, वह उसकी पीड़ा और दशकों लम्बे पलों को नहीं जान सकता। वह नहीं जान सकता कि एक पल में पूरी जिंदगी कैसे सिमट आती है? ऐसा कोई भी नजारा नहीं होता -जो गुजरा हो और नजरों के सामने से, फिर से नहीं गुजरे। मां की लोरी, पिता की अंगुजी, पत्नी का सानिध्य, बच्चे की किलकारी। जंगल, पहाड़, नदी-नालों से लेकर परिंदों का पर मारना तक नजर आता है। जिनकी वजह से दर्द की लकीरें बनती और मिटती रहती हैं।

मगर, अपकी सोच इतनी गंदी है, कि आप सूली पर टंगे हुए आदमी के सिर पर कांटों का ताज पहना कर उसे ईसा बना देते हैं। जबकि सूली पर टंगे हर आदमी को ईसा बनने का मौका ही नहीं मिलता, यदि ऐसा होता, तो पहला ईसा कार्थेज में पैदा होता, जहां सूली का जन्म हुआ। पहला ईसा गुलामों की कौम में जन्म लेता, जिन्होंने रोम के साम्राज्य की बुनियाद हिला दी थी। लेकिन ऐसा नहीं है। सूली पर टंगा आदमी तो ईसा बन ही नहीं सकता। उसे सिर्फ ईसा इसलिये बनाया जाता है, ताकि सूली पर टांगने वाले, अपने पाप को धो सकें, अपने सही होने का तर्क ढूंढ सकें।

मैं जेल की सलाखों के पार, मोटी-मोटी दीवारों के घेरे में गोली मारा गया आदमी हूं। जिसे फांसी के फंदे से सिर्फ इसलिये टांग दिया गया, कि उसने बंदूक के अंदर बैठी आत्मा को पहचानने की जिद्द की।

उसने कहा- ‘‘बंदूक के अंदर आत्मा होती है। आत्मा इश्तेहार है, पर्चा है। जिंदगी को जीने की, सपने देखने की जद्दोजहद है, एक ऐसी आजादी है, जो आज तक नहीं मिली।‘‘

मैं पर्चे की तरह दीवार से चिपक जाता हूं, हाथों-हाथ बंट जाता हूं। पर्चे शब्द नहीं, संघर्षों की नब्ज हैं। चाहत का पैगाम, जीने की जद्दो जहद हैं।

मैं आजादी और सपनों के लिये जीने लगता हूं, नहीं जानता मैं इश्तहार हूं या इश्तहारी मुजरिम? फौज में हूं, या फरार फौजी? आज के लिये जी रहा हूं, या आने वाले कल के लिये? मेरे सामने बंदूक की नाल के अंदर बैठा अंधेरा है, अंधेरे में कोई रहता है -बंदूक की आत्मा, जो गोली चलने से पहले, बंदूक की नाल से निकलने से पहले, कसमसाती है, छूटने के लिये छटपटाती है, लेकिन उसे लोहे की दीवार से जकड़ दिया जाता है, उसे हिलने और छटपटाने नहीं दिया जाता और जब वह लोहे की तरह सर्द और बेजान हो जाती है, उसके माथे पर कील ठोंक दी जाती है।

गोली जब भी चलती है, आत्मा गला फाड़ कर चीखती है। जितना बड़ा हथियार होता है, वह उतने ही जोर से चिल्लाती है। उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता, कि उसके माथे पर कील किसने ठोंका है? गोली, चलने से पहले अंधी हो जाती है। कंुदे के पार बैठे आदमी को पहचान नहीं पाती है।

आप विश्वास नहीं करेंगे कि बंदूक के नाल के अंदर जो अंधेरा है, उस अंधेरे में बंदूक की आत्मा रहती है, जो शांति से जीना और हंसना-बोलना चाहती है। मगर उसे हंसने-बोलने नहीं दिया जाता, मुंह बंद करके जीने की सख्त हिदायत होती है उसे। इसलिये हथियार जिसके हाथ में होता है, उसकी आत्मा उसके पक्ष में चीखती है और जिसके जिस्म में पैबस्त होती है, उसकी चीख में बदल जाती है।

हथियार को वर्दी के हवाले कर दिया गया है, अब आप ही तय करे, मैंने किसकी वर्दी पहन रखी है? मेरी सूरत आप ही के जैसी है।

मेरे मारे जाने के बाद आप मुझे शहीद कहेंगे या कुछ और या नक्सलवादी? आप ही तय करें। मैं आपसे बस इतना बताना चाहता हूं, कि मैंने न तो हथियारों की गुलामी की है, ना ही वर्दी की चाकरी की है। यदि मैं लड़ा तो अपनों के लिये, अपनी मां, अपनी पत्नी, अपने दुधमुंहे बच्चे के लिये, जो झोपड़ी के साथ जल गये। मगर, मेरे मरने या मारे जाने की वजह सिर्फ इतनी नहीं है। जो सड़कों पर हैं, मैं उनसे या उनकी उम्मीदों से अलग नहीं हूं। हमारा वास्ता उनसे है, जो आने वाले अच्छे कल के लिये संघर्ष कर रहे हैं। जहां हथियारों की सरपस्ती और वित्तीय सलाखों की बंदिशें नहीं होंगी।

आलोकवर्द्धन

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