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यूरोप का आम आदमी यूरोपीय संघ के खिलाफ है

380721_398803263535694_1587097913_nयूरोप का संकट रोज बढ़ रहा है।

आर्थिक असमानता, राजनीतिक असंतोष और बिगड़ती हुर्इ सामाजिक सिथतियों में खत्म होती सुधार की उम्मीदों ने लोगों को हतास कर दिया है। सरकारें आम जनता का विश्वास खो दी हैं, और तमाम कोशिशों के बाद भी वित्तीय संकट का लगातार बढ़ना, यूरोपीय संघ और यूरोपीय देशों के बीच की दूरियां लगातार बढ़ा रही हैं। अपनी राष्ट्रीय समस्याओं के समाधान के लिये यूरोपीय संघ और यूरो जोन के पहले की सिथतियों की ओर लौटने की सिथतियां बनती जा रही हैं। इस मामले में, सरकार की वित्तीय नीतियों से पूरी तरह असहमत होने के बाद भी, यूरोपीय देशों की आम जनता, अपनी सरकारों पर दबाव डाल रही है। उनमें पूर्व सिथति में लौटने के साथ-साथ क्षेत्रीय विभाजन की सोच भी बढ़ रही है।

आम जनता अपने देश की सरकार के वित्तीय नीतियों के खिलाफ है।

आम जनता यूरोपीय संघ और यूरो जोन के खिलाफ है।

आम जनता यूरोप की मौजूदा व्यवस्था के खिलाफ है।

आम जनता अपनी सिथतियों में सुधार चाहती है।

सिथतियां जड़ हो गयी हैं, मगर विरोध जारी है। सामाजिक एवं आर्थिक असमानता के विरूद्ध गहरी नाराजगी है। नेशनल इक्वलिटी एसोसिएशन ने अपने वार्षिक रिपोर्ट में कहा है कि ”अमीरों और गरीबों के बीच की दूरियां लगातार बढ़ती जा रही हैं।” रिपोर्ट के अनुसार- ”आर्थिक असमानतायें फैली हुर्इ हैं।” पूरे यूरोप में औधोगिक उत्पादन घट गया है। ग्रीस और स्पेन में 7 प्रतिशत के दर से वार्षिक गिरावट आयी है, इटली में यह दर 4.8 प्रतिशत है और फ्रांस में 2.1 प्रतिशत के दर से औधोगिक उत्पादन में गिरावट दर्ज की गयी है। फ्रांस की सरकार के द्वारा अमीरों पर टैक्स बढ़ाने की वजह से वहां से बड़ी संख्या में यह वर्ग फ्रांस छोड़ रहा है। औधोगिक उत्पादन में गिरावट का सीधा प्रभाव वहां के बाजार और बढ़ती हुर्इ बेरोजगारी पर पड़ रहा है।

यूरोपीय संघ के 27 देशों में से 17 देशों की वित्त व्यवस्था पिछले दो तिमाही में सिकुड़ गयी है।

यूरो जोन का बेरोजगारी दर 11़.7 प्रतिशत के आंकड़े को पार कर गया है। वर्तमान में 1 करोड़ 87 लाख लोग बेरोजगार हैं और यह बेरोजगारी रोज बढ़ रही है, क्योंकि काम करने वालों की संख्या में बढ़ोत्तरी हो रही है, औधोगिक पलायन और औधोगिक इकार्इयों के बंद होने से कामगर बेकार हो रहे हैं, खुदरा क्षेत्रों में निजी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का वर्चस्व होने की वजह से छोटे व्यापारियों की दुकानें बंद हो रही हैं, और वहां काम करने वालों के हाथ से काम छिन सा गया है। जिन देशों की वित्त व्यवस्था पहले से यूरोपीय वित्तीय संकट की चपेट में हैं, उन देशों में हालत और भी बिगड़ गयी है। ग्रीस और स्पेन में 14 लोग पूरी तरह बेरोजगार हैं। जर्मनी और आसिट्रया में बेरोजगारी दर 5 पतिशत से ऊपर है।

जर्मनी में, हाल ही जारी एक रिपोर्ट के अनुसार- जर्मनी में ऐसे लोगों की संख्या में जबर्दस्त इजाफा हुआ है जो गरीबी की सीमा रेखा के मुहाने पर है। पिछले साल 15.1 प्रतिशत जर्मन इस मुहाने पर थे, जो तेजी से बढ़ रहा है। यह जर्मनी के पुर्नएकीकरण के बाद से अब तक का रिकार्ड आंकड़ा है। नेशनल इक्वलिटी एसोसिएशन ने अपने वार्षिक रिपोर्ट में कहा है कि यूरोपीय देशों की तरह जर्मनी में भी अमीरों एवं गरीबों के बीच की दूरियां लगातार बढ़ती जा रही हैं। कम आय वाले लोग- जो मध्यम आय वाले लोगों से 60 प्रतिशत से कम वेतन पाते हैं, वो इस गरीबी के खतरे को झेल रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार- ”आर्थिक असमानतायें पूरे जर्मनी में फैली हुर्इ हैं।” चैरिटी वेलफेयर एसोसिएशन द्वारा कराये गये एक अध्ययन में कहा गया है कि ”जर्मनी के 12.4 मिलियन लोग -सात में से एक व्यकित- गरीबी के मुहाने पर खड़ा है। गरीबी से सबसे ज्यादा प्रभावित बच्चे और जर्मनी का युवा वर्ग हुआ है। जर्मनी यूरोप और यूरोपीय संघ की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है।

फ्रांस यूरोप की सबसे बड़ी दूसरी वित्त व्यवस्था है, जहां की वित्त व्यवस्था में लगातार सिकुड़ने की प्रक्रिया शुरू हो गयी है। औधोगिक घरानों पर लगाये गये नये करों की वजह से भी वहां से उधोगों का पलायन हो रहा है। ‘नेशनल इन्स्टीटयूट आफ स्टैटिसिटक्स एण्ड इकोनामिक स्टडीज’ के अनुसार ”वर्ष 2012 के चौथी तिमाही में फ्रांस की अर्थव्यवस्था में 0.2 प्रतिशत का संकुचन हुआ है।”

मर्इ 2012 में- जब से हालंदे ने राष्ट्रपति का कार्यभार संभाला है, तब से अब तक 2,30,000 लोगों ने अपना रजिस्ट्रेशन बेरोजगार के रूप में कराया है।

ग्रीस को कर्ज देने वाले ‘नेशनल बैंक’ ने इस साल के पहले 9 महीनों में 2.45 बिलियन यूरो (3.23 बिलियन डालर) के घाटे की जानकारी दी है। 21 दिसम्बर को जारी किये गये ‘स्टेटमेण्ट’ में बैंक ने कहा है कि ”इस साल सितम्बर महीने तक बैंक का घाटा 2.45 बिलियन यूरो हो गया है। बैंक को पिछले साल के पहले 9 महीनेां में 1.35 बिलियन यूरो का घाटा हुआ था। जिसका नियंत्रण ग्रीस की वित्तव्यवस्था पर हो गया है और वह यूरोपीय संघ और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष से मिलने वाला कर्ज अब इन्हीं बैंकों के नियंत्रण में रहता है।

13 दिसम्बर को उसके अंतर्राष्ट्रीय कर्जदाता -यूरोपीय संघ और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष- ने लम्बे समय से रोके गये 34.3 बिलियन यूरो का ऋण ग्रीस को देने की स्वीकति दे दी है। ग्रीस पिछले 5 सालों से मंदी की चपेट में हैं, वहां लगभग आधे मिलियन लोगों के पास कोर्इ काम नहीं है, वो पूरी तरह बेरोजगार हैं। हर पांच में से एक व्यकित से ज्यादा ग्रीस में बेरोजगार हैं। ग्रीस और स्पेन में युवाओं मे बेरोजगारी दर 60 प्रतिशत के करीब पहुंच गयी है। ग्रीस में बैंकों की सिथति खराब है। आम ग्रीसवासी के वेतन एवं पेंशन में 40 प्रतिशत की कटौती हो चुकी है। यही नहीं, लगभग इतना ही उस पर नये करों एवं करों में बढ़ोत्तरी का बोझ भी लदा है। बाजार में आवश्यक वस्तुओं के कीमत में भी भारी वृद्धि हो गयी है। सामाजिक सरोकार से जुड़ी सरकारी योजना एवं कार्यक्रम ठप्प हो गये हैं।

ग्रीस की अर्थव्यवस्था इस साल 7 प्रतिशत से ज्यादा सिकुड़ गयी है, और पूर्वानुमान है कि यह 4 प्रतिशत और सिकुड़ जायेगी। इस साल के अंत तक ग्रीस का कर्ज उसके जीडीपी का 189 प्रतिशत से ज्यादा हो जायेगा। इसलिये, ग्रीस के दिवालिया होने की सिथतियां लगभग तय हो गयी हैं।

यह सवाल अपने आप में महत्वपूर्ण है कि इतने आर्थिक सहयोग एवं कर्ज के बाद भी ग्रीस की वित्त व्यवस्था में सुधार की संभावनायें क्यों खत्म होती जा रही हैं? यही सिथति स्पेन की हो गयी है।

स्पेन का वित्तीय संकट, देश के विभाजन के खतरे में बदल गया है। स्पेन के उत्तरी क्षेत्र कैटालोनिया से स्वतंत्रता की मांग उठने लगी है। इस क्षेत्र के दो प्रमुख राजनीतिक दलों के नेता आटूर मास और ओरियोल जंग्यूरेस ने 19 सितम्बर को एक समझौते पर हस्ताक्षर किये, जिसके अनुसार दोनों ही राजनीतिक दल जनमत संग्रह कराने और 2014 तक कैटालोनिया को स्पेन से स्वतंत्र कराने के लिये, मिल कर काम करेंगे।

मास ने 4 साल के लिये कैटालोनिया का राष्ट्रपति चुने जाने के बाद अपने शपथग्रहण समारोह में कहा कि ”वे इस क्षेत्र की स्वतंत्रता के मुददे पर जनमत संग्रह करायेंगे।” उन्होंने कहा कि ”कैटालोनिया को भी अपने भविष्य का निर्माण करने का अधिकार, दुनिया के बाकी लोगों की तरह है। इसलिये, वे दृढ़ता के साथ इस मुददे को आगे बढ़ायेंगे।”

मैडि्रड ने जनमत संग्रह का विरोध किया हैं उसका मानना है कि ‘यह स्पेन के संविधान की अवहेलना है।” कैटलोनिया और मैडि्रड के असंतुलित विकास की वजह से इस मांग के तूल पकड़ने की संभावनायें हैं। स्पेन के वित्तीय संकट से जिसे बल मिल रहा हैं, स्पेन की मौजूदा वित्तीय सिथति ग्रीस से भी बदतर होती जा रही है। बेरोजगारी दर 25 प्रतिशत से ऊपर हो गयी है, और युवाओं में यह बेरोजगारी दर अब 60 प्रतिशत के आंकड़े को छूने को हैं, बैंक आफ स्पेन ने 18 दिसम्बर को एक आंकड़े की घोषणा की है। जिसके आधार पर अक्टूबर में स्पेन के बैंकों का बैड़ डेफ्थ 11.2 प्रतिशत हो गया है। जबकि यह दर सितम्बर के 10.7 प्रतिशत था। यह कुल कर्ज 189.6 बिलियन यूरो है, जिसकी वापसी संभव नहीं है।

इटली में भी रोम से अलग होने की मांग हो रही है। वहां भी राजनीतिक संकट गहराता जा रहा है। राष्ट्रपति जीआरजीओं नेपोलिटानों ने इटली की संसद को भंग कर दिया है। राष्ट्रपति के वेबसार्इट पर पोस्ट किये गये वक्तव्य के अनुसार नेपोलियानों ने यह निर्णय मारियो माण्टी के त्यागपत्र सौंपने के बाद लिया। इटली में चुनाव 24-25 फरवरी 2013 को होगा।

इटली के प्रधानमंत्री मारियो माण्टी ने यह निर्णय पूर्व प्रधानमंत्री सिलवियो बलर्ुस्कोनी की पार्टी ‘पिपुल आफ फ्रीडम’ के समर्थन वापस लेने के बाद लिया। ‘पिपुल आफ फ्रीडम’ इटली की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी है।

मोरियो माण्टी ने इटली के लोगों से कर्ज और कटौतियों को स्वीकार करने की अपील की थी, परिणामस्वरूप उनकी ख्याति 60 प्रतिशत से 30 प्रतिशत, चंद हफ्तों में ही हो गयी। इसके बाद भी उन्होंने इस बात के संकेत दिये हैं कि यदि 2013 के आम चुनाव के बाद संयुक्त सरकार बनती है, तो वे केंद्र में गठबंधन सरकार का नेतृत्व कर सकते हैं।

सच यह है कि इटली में चाहे किसी एक राजनीतिक दल की सरकार बने या गठबंधन की सरकार, दोनों की नीतियों में कोर्इ अंतर नहीं होगा, क्योंकि यूरोपीय संघ और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकार्इयों का दबाव उस पर रहेगा, जो आम जनता के हितों के विरूद्ध कटौती के प्रस्ताव के अलावा और कुछ नहीं होता है।

21 दिसम्बर को इटली में हजारों लोगों ने सरकार द्वारा स्वास्थ्य एवं चिकित्सा के क्षेत्र में घोषित किये गये 1.25 बिलियन डालर की कटौती के खिलाफ रोम में प्रदर्शन किये। सरकार इस कटौती के पक्ष में तर्क देती है कि इस क्षेत्र में 13 बिलियन डालर का घाटा हो रहा है, जिसका वर्ष 2013 तक 20 बिलियन डार का होना तय है, इसलिये प्रस्तावित कटौती अनिवार्य है, क्योंकि राज्य यह घाटा उठाने की सिथति में नहीं है।

यूरोपीय संघ और यूरो जोन के खिलाफ यूरोप की आम जनता हो गयी है। आने वाला कल इस ओर संकेत कर रहा है, कि इस जनचेतना का बढ़ना तय है। हो यह भी रहा है कि यूरोजोन से बाहर के देश, यूरोपीय संघ से अलग होने की धमकी भी देने लगे हैं।

बि्रटेन 1973 में यूरोपीय संघ का सदस्य देश बना, किंतु उसने यूरोजोन की सदस्यता हासिल नहीं की, जिसके 17 सदस्य देश हैं। यूरोपीय संघ से उसकी सम्बद्धता कभी बेबाक नहीं रही। उसने अपने राष्ट्रीय हितों को कभी नहीं छोड़ा। इसलिये, मौजूदा हालात को देखते हुए उसने अपनी सम्बद्धता पर जब जनमत कराने की बात की, तो यह मान लिया गया कि वह यूरोपीय संघ की सदस्यता छोड़ना चाहता है।

23 दिसम्बर को जर्मनी के वित्तमंत्री वोल्फगैंग शैयुबुल ने यूरोपीय संघ की सदस्यता पर बि्रटेन पर ब्लैकमेलिंग करने का आरोप लगाते हुए कहा कि ”हम बि्रटेन को यूरोपीय संघ में रखना चाहते हैं, मगर, इसका मतलब यह नहीं है कि कोर्इ हमें ब्लैकमेल कर सकता है।”

बि्रटिध प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने पिछले महीने कहा था कि ”वो बि्रटेन के यूरोपीय संघ की सदस्यता का समर्थन करते हैं, मगर वर्तमान सिथति को स्वीकार नहीं कर सकते।” उन्होंने नयी व्यवस्था और समझदारी का जिक्र करते हुए कहा कि बि्रटेन कुछ शकितयां अपने हाथों में भी चाहता है।” कैमरन ने अपने कंजरवेटिव पार्टी के सदस्यों से भी कहा है कि बि्रटेन के यूरोपीय संघ की सदस्यता के सवाल पर वे 2015 में होने वाले आम चुनाव से पहले, इस मुददे पर मतदान का मौका देंंं।” जबकि, जर्मनी इस पक्ष में नहीं है। जर्मनी के वित्तमंत्री ने सलाह दी है कि ”इससे अनिश्चयता का माहौल बनेगा।” उन्होंने कहा कि ”हमारे बि्रटिश मित्र खतरनाक नहीं हैं, मगर जनमत संग्रह से अनिश्चयता की सिथति बन सकती है।” उन्हें इस बात की आशंका है कि बि्रटेन की आम जनता यूरोपीय संघ की सदस्यता के पक्ष में मतदान नहीं करेगी। वो ऐसे कदम को यूरोपीय संघ के हितों के लिये घातक समझते हैं। क्योंकि यूरोप की आम जनता यूरोपीय कमीशन एवं अंतराष्ट्रीय वित्तीय इकार्इयों के द्वारा अपने देश में हस्तक्षेप को स्वीकार नहीं कर सकी है, वह मानती है कि यूरोपीय मंदी और कर्ज संकट के नाम पर की जाने वाली कटौतियां नाजायज हैं।

बि्रटिश अखबार आब्र्जवर द्वारा हाल में कराये गये एक सर्वेक्षण से यह बात सामने आयी है कि ”बि्रटेन के 56 प्रतिशत लोग अपने देश को यूरोपीय संघ से अलग करने के पक्ष में हैं।”

यूरोप का आम आदमी यूरोपीय संघ के खिलाफ है। वह अपने देशों की सरकार के साथ यूरोपीय संघ के जनविरोधी नीतियों का विरोधी हैं।

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