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भारत में जेहादी ताकतों को बढ़ाने की नीति

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सभी प्रचार एवं दुष-प्रचार के बाद भी सच यह है, कि भारत में आतंकवाद की जड़ें जम नहीं सकी हैं। देश का आम आदमी धर्म एवं नस्ल के मामले में अपेक्षाकृत उदार है। अब तक विपरीत परिस्थितयों के बीच भी यह उदारता बनी हुई है। लेकिन यह उदारता बनी रहेगी, यह जरूरी नहीं। क्योंकि मध्य-पूर्व एशिया और अफ्रीकी महाद्वीप में राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने के लिये धर्म, सम्प्रदाय एवं जातीय तथा नस्लवादी हिंसा को बढ़ाया जा रहा है। साम्राज्यवादी ताकतें पूरी तरह से सक्रिय हैं। और इस्लामी आतंकवादी संगठन, पेशेवर विद्रोहियों की भूमिका निभा रही है। इराक, अफगानिस्तान, लीबिया और सीरिया में जो हुआ वह हमारे सामने है। जातीय हिंसा के नये दौर की शुरूआत एशिया में हो चुकी है।

इराक और सीरिया के साथ आईएसआईएस का खतरा भारत को भी है, यह बात बहुत ज्यादा खुलेआम नहीं है, क्योंकि इन आतंकी और पेशेवर विद्रोहियों के पीछे की ताकतों के बारे में भारत सरकार कोई जानकारी नहीं देती और भारतीय मीडिया पश्चिमी मीडिया की बातों को आंख मूंद कर सुनती और पढ़ती है, और उसे ही भारतीय भाषाओं में उगल देती है। जाने-अंजाने वो उन्हीं का हाथ बंटाती है, जिनके लिये यह मुनाफे का धंधा और अपने हितों को साधने का जरिया है।

रेडियो रूस ने जानकारी दी है, कि इस्लामी राज्य -इराक और सीरिया- आईएसआईएस- नामक आतंकवादी इस्लामी गुट ने अपनी जो प्रचार सामग्री बनवाई है, वह अन्य भाषाओं के अलावा उर्दू, हिंदी और तमिल जैसे भारतीय भाषाओं में भी है। यह प्रचार विज्ञापन सामग्री लगभग एक महीना पहले सामने आया।

एक विडियो विज्ञापन में, इस्लाम स्वीकार करने वाले कनाडा के युवा नागरिक -जिसने अपना नाम अबू मुस्लिम रख लिया है, बताता है, कि उसने आईएसआईएस की सदस्यता क्यों ली? वह लोगों से अपील करता है, कि ‘‘इस्लामी राज्य बनाने के महत्वपूर्ण काम में हर व्यक्ति अपना सहयोग दे सकता है।‘‘ वह कहता है- ‘‘यदि आप लड़ना नहीं चाहते तो आर्थिक सहयोग दे सकते हैं, यदि आर्थिक सहयोग नहीं दे सकते हैं, तो तकनिकी सहयोग दे सकते हैं, और यदि तकनिकी सहयोग नहीं दे सकते हैं, तो अपनी योग्यता एवं क्षमता का सहयोग दे सकते हैं।‘‘ वह हर स्तर पर सहयोग देने की अपील करता है।

हमारे सामने सवाल यह है, कि विज्ञापन भारतीय भाषाओं में क्यों तैयार किया गया?

रेडियो रूस में इस मामले के विशेषज्ञ वरीस वलरवोन्स्की का अनुमान है, कि ‘‘जल्दी ही हिंदी, उर्दू और तमिल भाषाओं में यह विज्ञापन फिल्म भारत में दिखायी जाने लगेगी। उर्दू में यह फिल्म भारत और पाकिस्तान के मुसलमानों के लिये बनाई गयी है, जिनकी संख्या 30 करोड़ से ज्यादा है। हिंदी में यह फिल्म इसलिये बनाई गयी कि हिंदी भारत की राजभाषा है और मुसलमानों की संख्या की दृष्टि से भारत दुनिया में दूसरे नम्बर का बड़ा देश माना जाता है। लेकिन तमिल में…? यह एक सवाल है, जहां की 90 प्रतिशत जनता हिंदू है। वहां 40 लाख -लगभग राज्य की जनसंख्या का मात्र 6 प्रतिशत- लोग ही मुसलमान हैं।‘‘

वलरवोन्स्की का कहना है, कि ‘‘इस सवाल का जवाब आसान नहीं है, लेकिन कुछ पुरानी घटनाओं को याद किया जा सकता है, पिछली सदी के नौंवे दशक में भारतीय मीडिया में इस सवाल पर बहस छिड़ी थी, कि तमिलनाडु सहित दक्षिण भारत के कुछ गांवों के निवासियों ने सामूहिक रूप से इस्लाम कुबूल कर लिया था।‘‘

भारत के वर्ग विभाजित समाज व्यवस्था और जातीय उत्पीड़न को इस घटना की वजह मानी गयी। किंतु वलरवोन्स्की का निष्कर्ष है, कि ‘‘सामूहिक रूप से इस्लाम को कुबूल करने का निर्णय इसलिये लिया गया था, कि फारस की खाड़ी के सउदी अरब जैसे देश इस्लाम का प्रचार प्रसार करने में प्रायोजक की भूमिका निभा रहे थे, और धर्म परिवर्तन करा रहे थे।‘‘ उनका मानना है, कि ‘‘इस्लामी राज्य इराक और सीरिया -आईएसआईएस- जैसे कट्टरपंथी गुटों के पीछे भी वही लोग और वही देश खड़े हैं, जिन्होंने भारत में धर्म परिवर्तन के मुहिम को चलवाया था।‘‘ इसलिये तमिल में विज्ञापन फिल्म बनाने को वो नये मुहिम की शुरूआत के रूप में देख रहे हैं, जिसका इस्लाम से कोई वास्ता नहीं है, बल्कि यह ज्यादा से ज्यादा लोगों को मारने और मरने के लिये बनाया गया है।

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भारत में अब ऐसे अभियानों की प्रतिक्रिया तीखी होगी। क्योंकि सत्तारूढ़ राजनीतिक दल की पृष्टभमि में हिंदू राष्ट्रवाद की सोच है। ज्यादातर मंत्रियों और स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की पृष्टभूमि रखते हैं, और जिन्हें राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का निर्णायक समर्थन हासिल है। जिसके संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा- ‘‘भारत एक हिंदू राष्ट्र है, और हिंदुत्व इसकी पहचान है।‘‘ मोहन भागवत के इस वक्तव्य का समर्थन केंद्र सरकार या नरेंद्र मोदी ने भले नहीं किया है, मगर नरेंद्र मोदी पर गुजरात में जातीय हिंसा के आरोप लगे हुए हैं। हिंदुवादी संगठनों ने भागवत का समर्थन किया है। इसलिये यह सोचा जा सकता है, कि इन घटनाओं की यदि स्वाभाविक क्रिया-प्रतिक्रिया होती है, तो साम्प्रदायिक तनाव और जातीय हिंसा का स्वरूप क्या होगा? और यह मामला सरकार और राजनीतिक दलों के बीच का मसला बनता है -जैसे कि मोहन भागवत के बयान के बाद बना- तो हदों और मुद्दे का स्वरूप बदल जायेगा। नरेंद्र मोदी के लिये जो दीवानगी रची जा रही है, वह कुछ खास अच्छी नहीं है। यूरोप में बाजारवादी ताकतों ने ही फाॅसिस्ट ताकतों का बढ़ावा दिया है। वहां नस्लवादी जातीय दंगों के जरिये जन समस्याओं के समाधान के लिये, जनविरोधी सरकारों के खिलाफ सड़कों पर उतरे लोगों की एकजुटता में दरारें पैदा की जा रही हैं। बाजारवादी ताकतें और बहुराष्ट्रीय वित्तीय इकाईयां भारत में सक्रिय हैं। मोदी बाजारवादी होने के साथ ही एकाधिकारवादी ताकतों के पक्षधर हैं।

आईएसआईएस के विज्ञापन फिल्मों के बारे में वलरवोन्स्की ने भारत में जिन आशंकाओं को व्यक्त किया था, उसकी आहटें सुनी और नजारा नजर आने लगा है।

कश्मीर घाटी में जैश-ए-मोहम्मद, लश्कर-ए-तइबा और हिजबुल मुजाहिद्दीन की मौजूदगी है। अब आईएसआईएस के झण्डे भी पिछले दो महीनों में तीन बार नजर आये हैं। जिसकी जांच खुफिया विभााग -आई.बी.- कर रही है। जिसके उच्च अधिकारियों का मानना है, कि यह मामला सिर्फ आतंकवाद का खतरा नहीं है, बल्कि इससे शिया और सुन्नी के बीच जातीय हिंसा बढ़ाने के रूप में भी देखा जा रहा है। 27 जून को शिया बाहुल्य जादीबल में हुर्रियत नेता मरि वाइज की रैली में आईएसआईएस का झण्डा दिखाया गया था। इसके बाद ईद वाले दिन ईदगाह में भी यह नजर आया। श्रीनगर के वरांशी स्टेडियम में आईएसआईएस का झण्डा लहराया। कश्मीर घाटी के बडगाम, मागम, श्रीनगर, पाटन, जादीबल, संबल, सोनाबारी और कारगिल में शियाओं की बड़ी तादाद बस्ती है। कश्मीरी अलगाववादी जातीय हिंसा बढ़ाने में लगे हैं। आईएसआईएस का झण्डा नया संकेत है, जिसे लहराने वालों की शिनाख्त अब तक नहीं हो सकी है। राज्य में होने वाले विधानसभा चुनाव और पाकिस्तान से सचिव स्तर की वार्ता रद्द होने के बाद क्षेत्र में सरगर्मी बढ़ गयी है।

जिन ताकतों ने धर्म परिवर्तन को अभियान बनाया, उन्हीं ताकतों ने जातीय हिंसा को बढ़ाने की कोशिशें जारी कर दी है। आईएसआईएस यदि भारत में पांव पसारता है -जिसके जरिये अमेरिकी सरकार और पश्चिमी ताकतें तथा नाटो देश इराक में सैन्य हस्तक्षेप की स्थितियां बना कर अब सीरिया में सैन्य हस्तक्षेप की कवायतें कर रही हैं, जहां आईएसआईएस इन ताकतों की सहयोगी इकाई और बशर-अल-असद के खिलाफ पेशेवर आतंकी विद्रोही हैं- तो मामला उन्हीं बाजारवादी ताकतों के खिलाफ खड़े होने का होगा, जिनके पक्ष में भारत की केंद्रीय सरकार और नरेंद्र मोदी हैं। यह समझने की जरूरत है, कि आतंकवादियों की तरह ही साम्राज्यवादी एवं नवउदारवादी तथा बाजारवादी ताकतें भी यकीन के काबिल नहीं हैं। वो भारत में भी जेहादी ताकतों को बढ़ाने की नीति पर चल रहे हैं।

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