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संसद में राजनीति सदाबहार झूठ है

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‘‘राजनीति में पतझड़ नहीं, बहारों का तबादला होता है। नमो आये तो ममो के बहारों का तबादला हो गया।‘‘

उन्होंने सुना और उनके चेहरे के दो टुकड़े हो गये। एक ने मुझे लानत भेजी, दूसरे ने तंज कसा-

‘‘यह ममो कौन है?‘‘

‘‘अपने मनमोहन सिंह जी। यदि आप नरेंद्र मोदी जी को नमो बना सकते हैं, तो हम मनमोहन जी को ममो क्यों नहीं बना सकते?‘‘

‘‘बना सकते हैं।‘‘ उन्होंने कहा।

और बनने, बनाने का खेल शुरू हो गया। उदारीकरण निजीकरण बना और दोनों को जोड़ कर बने, गुजरात मॅाडल को राष्ट्रीयकरण के दीवार पर चिपका दिया गया। दीवारों पर कोयले की खदानों ने जगह बना ली। उन्हें यह बुरा लगा कि ‘‘कोल ब्लॅाक आबंटन न रद्द होने से नमो को झटका लगा।‘‘ उन्होंने ममो पर आरोप रखे और मुझे ‘अकल का अंधा‘ कहा। उनकी राष्ट्रवादी भावनायें तिमिलाने लगीं।

वो और भी कुछ कहते, कि मैंने नमो भाव से हाथ जोड़ कर आंखें मूंद ली और ममो भाव से मुस्कुराते हुए कहा-

‘‘भाई! अंधों को रात से और अंधी गलियों से कोई फर्क नहीं पड़ता। वो न तो पतझड़ देख पाते हैं, ना ही बहारों का तबादला।‘‘ मैंने अनासक्त भाव से कहा- ‘‘कोयले की खदानें काली होती हैं, वहां उजला कोई नहीं होता।‘‘ और लाख टके की बात मेरे जेहन में आयी-

‘‘यदि कोयला काला है, तो आप उसके चेहरे पर कालिख नहीं पोत सकते।‘‘

न तो किसी ने मुझे लानत भेजी, ना किसी ने मुझ पर तंज कसे। बंटे हुए चेहरों ने भी कुछ नहीं कहा। वो कभी नमो, तो कभी ममो की ओर देखते रहे, जिसकी समझ में नहीं आ रहा था, कि ‘बड़ी अदालत ने यह क्या किया?‘ राष्ट्रीयकरण के जिस कानून को बहस से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था, उसे ही निर्णय का आधार बना लिया। 1993 से 2010 के काले कटघरे में एनडीए औ यूपीए को एकसाथ खड़ा कर दिया।

कल तक जो कोयले के खदानों को पा कर और बांट कर हंस रहे थे, कोयला उन पर हंसने लगा।

कोयले की हंसी किसी को अच्छी नहीं लगी।

रिलायंस के चेहरे जर्द हो गये।

जिंदल के चेहरे सर्द हो गये।

स्टील और ऊर्जा कम्पनियों के चेहरे सुर्ख हो गये।

नमो त्रस्त तो ममो संत्रस्त हो गये।

शेयर बाजार ने गोते लगाये।

कोयले की सट्टेबाज मछलियां तिलमिलाने लगीं।

देश की तरक्की चाहने वालों के सिर आपस में जुड़ने लगे।

नजारा शानदार है।

इशारे में जान है।

जानकारों का मानना है- नमो और ममो एक ही नाव में सवार हैं।

हमने कहीं सुना है- सोना रंग बदलता है, कोयले का रंग उजला है। यह कमाल है कि ‘संसद में राजनीति सदाबहार झूठ है।‘

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