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कोल ब्लाॅक आवंटन के मामले में आया निर्णायक मोड़

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कोल ब्लाॅक आबंटन के मामले में 25 अगस्त को नया मोड़ आ गया। सर्वोच्च न्यायालय ने 1993 से 2010 के बीच किये गये सभी आबंटनों को अवैध करार दिया है। 1 सितम्बर 2014 से आबंटन रद्द करने पर सुनवाई शुरू होगी। और यहीं से शुरू होगा संवैधानिक प्रक्रिया और कानूनी दांव-पेंच की ऐसी कहानी जो वर्षों की कई गलियों से होती हुई राजपथ तक पहुंच तो जायेगी, किंतु कहानी के अंत को अभी बताना मुनासिब नहीं है। क्योंकि राजपथ पर अब आम लोगों से ज्यादा निजी कम्पनियां और काॅरपोरेट जगत का दखल बढ़ गया है, और यही सबसे बड़ा मसला है। जिस पर अदालत निर्णय नहीं ले सकती। यूपीए की मनमोहन सिंह सरकार जिसे राष्ट्रीय हित का मामला मानती रही है, और मोदी सरकार के लिये, यह अर्थव्यवस्था के निजीकरण और आर्थिक विकास का मामला है। वो मानते हैं, कि निजी कम्पनियां और वैश्विक वित्तीय निवेशक नहीं होंगे, तो देश का आर्थिक विकास नहीं होगा। मूलतः वह मामला सरकार और बाजार की साझेदारी का है।

चीफ जस्टिस आर. एम. लाढ़ा, जस्टिस मदन लोकुर और जस्टिस कोरियन जोसेफ की बेंच अपने 163 पेज के निर्णय में यह मानती है, कि ‘‘आबंटन में विवेक का इस्तेमाल नहीं किया गया। राष्ट्रीय संपदा के उचित तरीके से वितरण की प्रक्रिया में निष्पक्षता और परदर्शिता नहीं थी, जिसका खामियाजा लोकहित और जनहित को चुकाना पड़ा।‘‘

कोल ब्लाॅक आबंटन के मुद्दे पर पहली बार यह कहा गया कि ‘‘सरकारी व्यवस्था के जरिये आबंटन का उद्देश्य भले ही सराहनीय रहा हो, लेकिन वह गैर-कानूनी था, क्योंकि राष्ट्रीकरण कानून की योजना के तहत इनकी अनुमति नहीं थी।‘‘

‘ई-न्यूज‘ के माध्यम से हम हमेशा से इस मुद्द पर यह कहते रहे हैं, कि ‘‘यह राष्ट्रीयकरण की ओट में निजीकरण का मामला है।‘‘ जिसे कभी मुद्दा बनने नहीं दिया गया। एनडीए और यूपीए की सरकारों के लिये यह मुद्दा ही नहीं था। मीडिया सरकारी नजरिये की वकालत करती रही। इस निर्णय में भी सरकार की नियत पर शक नहीं किया गया है। और निजी कम्पनियों के सामने सरकार खड़ी है।

सरकार सतर्क हो गयी है।

निजी कम्पनियों की निगाहें सिकुड़ गयी है।

मीडिया इन दोनों की जुबान बनी हुई है, कि 218 कोयला खदानों का आबंटन रद्द होने से अर्थव्यवस्था को लगेगा झटका।

देश की राजनीति में सरकार और बाजार का जो समिकरण बन चुका है, उसमें देशहित, जनहित और लोकहितों का गच्चा खाने की स्थितियां हैं।

नरसिम्हाराव, अटल बिहारी वाजपेयी, मनमोहन सिंह ने जो किया नरेंद्र मोदी वह नहीं करेंगे, यह सोचा हीं नहीं जा सकता, क्योंकि मोदी की सरकार इस देश में काॅरपोरेट की पहली सरकार है। उसके सामने निजीकरण की उड़ान है। उसे आर्थिक विकास के नाम पर राष्ट्रीय सम्पत्ति की नीलामी में कोई हर्ज नजर नहीं आता। यह सरकार के सिकुड़ने और मरने के बारे में नहीं सोचती। न तो उसके लिये यूरोपीय देशों की सरकारें सबक हैं, ना ही वैश्विक वित्तीय ताकतों के द्वारा अपने कब्जे में ले ली गयी अमेरिकी सरकार। वह चीन के बारे में भी सोचने की जहमत नहीं उठा रही है, जहां आर्थिक एवं सामाजिक असमानतायें विस्फोटक हो गयी हैं, और वैश्विक स्तर पर वह जिस अमेरिकी साम्राज्य, उसकी वित्तीय व्यवस्था और उसकी मुद्रा -डाॅलर- के लिये वह चुनौतियां बन गया है, वह उसके खिलाफ आर्थिक नाकेबंदी और सामरिक घेराबंदी करने में लगा है।

जिस आर्थिक उदारीकरण के जरिये तमाम क्षेत्रों को निजी क्षेत्र के लिये खोल दिया गया है, उसी उदारीकरण ने राजनीति में औद्योगिक घरानों के नये राजनीतिक समिकरण को जन्म दिया है, जिसकी वजह से सरकार बनाने का वास्तविक अधिकार देश की आम जनता के हाथों से छिन गया है। देश के औद्योगिक विकास और समृद्धि की बुनियाद में जिस कोयले और लोहे को रखा गया है, उसी कोयले को निजी क्षेत्रों के हवाले किया गया, लोहे के साथ भी तो यही हुआ है। सवाल यह है, खनिज और खदानें यदि देश की सम्पत्ति नहीं रहीं, तो आर्थिक विकास देश की समृद्धि कैसे बन सकती है?

अदालत मानती है, कि जिन दो तरीकों से -पहला- स्क्रीनिंग कमेटी के जरिये, जिसमें कोयला और मंत्रालयों के अधिकारियों के साथ, सम्बंधी राज्य सरकारों के प्रतिनिधि शामिल थे, और दूसरा सीधे सरकारों के द्वारा आबंटन किया गया, वह गलत है। वहां मनमानी की गयी है।

यदि इस नजरिये से हम देखें तो मनमानी की बुनियाद पर उदारीकरण की सोच खड़ी नजर आयेगी। निजीकरण सरकार की मनमानी की बुनियाद पर खड़ी नजर आयेगी।

SupremeCourt1PTI (1)अदालतें देश के कानून की सीमाओं में रह कर ही अपनी बातें रख सकती हैं, और इस निर्णय में भी यही किया गया है। मगर इस निर्णय से यह साफ है, कि देश की केंद्र एवं राज्य सरकारों के द्वारा सार्वजनिक क्षेत्रों, प्राकृतिक सम्पदा और देश की सम्पत्ति का निजीकरण मूलतः गलत है, अवैध और जनविरोधी है। उन्हें चुनौती दी जा सकती है। चुनौती दी जानी चाहिये।

सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय और 1 सितम्बर से आबंटन को रद्द करने की सुनवाई, सरकार की उदारीकरण एवं निजीकरण की नीतियों के पक्ष में नहीं है। लेकिन यह भी तय है, कि सरकार अर्थव्यवस्था के उदारीकरण एवं देश की प्राकृतिक सम्पदाओं का निजीकरण करने की नीतियों से बाज नहीं आयेगी। भारतीय राजनीति में सरकार एवं बाजार के जिस समिकरण का उदय हो चुका है और वह वैश्विक वित्तीय ताकतों से मिल कर जितनी कारगर और प्रभावशाली बन चुकी है, उसे देखते हुए कहा जा सकता है, कि सरकार के सामने वैधानिक परिवर्तन के विकल्प के अलावा और कोई रास्ता नहीं है।

लोग तक मान कर चल रहे हैं, कि कोयला खदानों के आबंटन को अवैधानिक करार देना, मोदी सरकार के लिये मुश्किलों को बढ़ाने वाला निर्णय है। इसलिये मोदी सरकार कोयला खदानों के आबंटन की नई नीतियां एवं नयी प्रक्रिया तय कर सकती है। राष्ट्रीयकरण की नीतियों को संग्रहालयों में जगह दी जा सकती है, और निजीकरण को खुली छूट मिलेगी। वैसे भी सरकार के पास स्पष्ट बहुमत है, और उदारीकरण के विरूद्ध संसद में कोई विपक्ष नहीं है। वामपंथी राजनीतिक दलों की ताकत संसद में शून्य की तरह है, और वो जन संघर्षों की शुरूआत करने का साहस नहीं रखती। मोदी सरकार सिर्फ कोयला खदानों के आबंटन को ही जायज ठहराने का आधार नहीं बनायेगी, बल्कि वह देश की प्राकृतिक सम्पदा को निजी कम्पनियों और काॅरपोरेशनों को सौंपने के लिये वैधानिक स्थितियां बनायेगी।

मीडिया यह कहने लगी है, कि यदि सर्वोच्च न्यायालय कोयले की खदानों के आबंटन को रद्द करती है, तो बिजली एवं ऊर्जा क्षेत्रों पर इसका प्रभाव पड़ेगा, स्टील, सीमेंट और दूसरे उद्योग भी सीधे तौर पर प्रभावित होंगे। रिलायंस पाॅवर, जिंदल स्टील एण्ड पाॅवर, हिंडाल्को, भूषण स्टील, जेएलडी यवतमाल एनर्जी तथा आईएसटी स्टील जैसी कम्पनियों को भारी झटका लगेगा। निजी कम्पनियों के द्वारा लगायी गयी पूंजी संकटग्रस्त हो जायेगी। और यही सरकार की सबसे बड़ी परेशानी है। निजी पूंजी निवेश की राहें अवरूद्ध होंगी और सरकार के आर्थिक विकास के सपनों को लकवा मार जायेगा। और हम जानते हैं, कि मोदी सरकार किसी भी कीमत पर ऐसा होने नहीं देगी।

कैग रिपोर्ट के मुताबिक राष्ट्रीय खजाने को 1.86 लाख करोड़ के नुक्सान के आंकलन को मनमोहन सरकार नकारती रही है, मोदी सरकार उससे चार कदम आग बढ़ कर इसे अस्वीकार करेगी। मोदी सरकार अर्थव्यवस्था को नयी रफ्तार देने के लिये नये समझौते और नये करार कर सकती है। और शर्तें पूर्ववर्ती सरकारों की शर्तों से ज्यादा उदार होंगी।

कोल ब्लाॅक आबंटन के मामले में आया यह निर्णायक मोड़ सरकार और बाजार की नयी साझेदारी को निर्णायक मोड़ देगी, क्योंकि संसद में विपक्ष और सड़कों पर जनप्रतिरोध नहीं है।

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