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रूस पूर्व सोवियत संघ की ओर लौट रहा है?

अमेरिका और रूस के बीच, दो दशक की चुप्पी और संबंधों को सामान्य बानाने की कोशिशें, फिर उलझने लगी हैं। सोवयित संघ के विघटन के बाद, शीतयुद्ध के समापित की घोषणा महज स्थगन प्रस्ताव था। अमेरिकी साम्राज्य ने जिसे अपने लिये खुली छूट के रूप में लिया और दुनिया पर अपनी पकड़ को मजबूत बनाने की कोशिशें तेज कर दी। परिणाम हमारे सामने है शांति और सहअसितत्व अमेरिकी हमले और हस्तक्षेप में बदल गया। एकधु्रवी विश्व अमेरिकी आतंक और वैशिवक संकट में बदल गया। सोवियत संघ और समाजवादी देशों का न होना दुनिया ही नहीं, अमेरिकी साम्राज्य और पूंजीवादी देशों के लिये भी खतरा बन गया है।

रूस सोवियत संघ नहीं है, हम यह जानते हैं। हम यह भी जानते हैं कि उसके विकास की दिशा समाजवादी नहीं है, इसके बाद भी विश्व परिदृश्य में उसकी अनिवार्यतायें बढ़ गयी हैं। वह पूंजीवादी विश्व और अमेरिकी साम्राज्य के सामने अब एक गंभीर चुनौती है। हम यह भी कह सकते हैं कि अमेरिकी मनमानी अब बेराकटोक नहीं है। उसने अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य में चंद ऐसी महत्वपूर्ण घोषणायें की है जिसे अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी किलंटन ‘सोवियत करण’ कह रही हैं। उन्होंने कहा है कि ”रूस में पूर्व सोवियत संघ बनने की महत्वाकांक्षाओं का पुर्नजन्म हो रहा है।”

एक अमेरिकी राजनीतिज्ञ -रिपबिलकन या डेमोक्रेटस- इससे बेहतर कुछ सोच भी नहीं सकता। सोवियत संघ एक सोच, एक समाज व्यवस्था का नाम था, रूस में वह सोच और समाज व्यवस्था नहीं है, इसलिये रूस में आज जो भी हो रहा है, वह उसकी राष्ट्रीय एवं वैशिवक अनिवार्यता है, सोवियत संघ बनने की महत्वाकांक्षा नहीं। सोवियत संघ इतिहास है, जिसे फिर से लेनिन के साथ पाया नहीं जा सकता। बहरहाल, इस बारे में बातें करने के बजाये हम आज के रूस, रूसी राष्ट्रपति पुतिन की नीतियों और अमेरिका के उस विरोध के बारे में चर्चा करें, जिसकी वजह से उसे यह लग रहा है कि रूस में सोवियत संघ बनने की महत्वाकांक्षा पैदा हो गयी है। जिसे राष्ट्रपति पुतिन ‘बकवास’ कहते हैं।

अमेरिका के सेक्रेटरी आफ स्टेट -विदेशमंत्री- हिलेरी किलंटन ने दिसम्बर की शुरूआत में कहा था कि ”पुतिन पूर्व सोवियत संघ के देशों को संगठित कर के पूर्वी यूरोप और मध्य एशिया का फिर से सोवियतिकरण करने की कोशिश कर रहे हैं।”

10 दिसम्बर को पुतिन ने कहा कि ”विदेश के अपने ही किसी समकक्ष एवं समकालीन से यह सुनना बड़ा ही आश्चर्यजनक है कि रूस में पूर्व सोवियत संघ बनने की महत्वाकांक्षओं का पुर्नजन्म हो रहा है। क्या बकवास है।” उन्होंने अमेरिकी विदेश मंत्री की बातों को यह कहते हुए खारिज किया कि ”पूर्व सोवयित संघ को संगठित करने के पीछे सिर्फ आर्थिक कारण है।” उन्होंने कहा- ”यह प्रक्रिया पूरी तरह प्राकृतिक एवं स्वाभाविक है। हमारी भाषा समान है, कुछ हद तक हमारी मानसिकता एक जैसी है, हमारे यातायात के साधन और उसकी संरचना समान है।”

रूस पूर्व सोवियत संघ के कुछ देशों को एक साथ लाने की कोशिश कर रहा है, जिसे पुतिन ‘यूरेशियन युनियन’ का नाम देते हैं। जो रूस, बेलारूस, और कर्इ मध्य एशिया के राज्यों का आर्थिक एवं राजनीतिक संघ है। पूर्व सोवियत संघ के राज्यों का एक साथ आना स्वाभाविक है। मुक्त बाजारवाद वित्तीय सहयोग एवं राजनीतिक समर्थन को अपने खिलाफ मानता है। अमेरिका बात वैश्वीकरण की करता है, किंतु उसकी नीतियां अमेरिकी वर्चस्व की है। यही कारण है कि यूरेशियन यूनियन की अवधारणा उसे पूर्व सोवियत संघ की ओर वापसी लग रही है, जिसका नेतृत्व रूस कर रहा है। अमेरिका और यूरोपीय संघ की चिंता रूस के द्वारा घोषित गैस पार्इप लार्इन की योजना -साउथ स्ट्रीम पार्इप लार्इन है, जिसका व्यापक आर्थिक एवं राजनीतिक प्रभाव पड़ेगा।

सीरिया, र्इरान में हस्तक्षेप, अफगानिस्तान में अमेरिकी सैनिकों की वापसी, मगर सैन्य ठिकानाें के होने का मामला। तुर्की में पेटि्रयाट मिसाइल की तैनाती और पूर्वी यूरोप में एंटीमिसाइल सिस्टम जैसे अनगिनत मुददे हैं। जहां रूस और अमेरिकी हित टकराते हैं। रूस विश्व के सभी महत्वपूर्ण जलमागोर्ं पर अपनी गस्त बढ़ाने की बात कर चुका है। उसने 2020 तक अपने सभी पुराने हथियारों को दुरूस्त करने तथा नये हथियारों के निर्माण के साथ अपनी मारक क्षमता बढ़ाने का काम शुरू कर चुका है। 8 दिसम्बर को बाइकानूर से ‘प्रोटोन-एम’ राकेट प्रक्षेपण किया है। उसकी डयूमा ने निर्णय लिया है कि अमेरिका के द्वारा किये जा रहे मानवाधिकार के उल्लंघन के प्रति, अब रूस अनदेखी नहीं करेगा।

अमेरिकी सीनेट और रूसी डयूमा के बीव मानवाधिकार के मुददे को लेकर वैधानिक लड़ार्इ शुरू हो गयी है। दोनों एक दूसरे के विरूद्ध एक के बाद एक प्रतिबंधों की घोषणायें कर रहे हैं आरोपों-प्रत्यारोपों की वापसी हो गयी है। चीन पहले से ही डालर के विरूद्ध युआन को खड़ा कर चुका है, वैशिवक मुद्राप्रणाली में परिवर्तन का होना भी तय है, साथ ही रूस और चीन के बीच की निकटता रोज बढ़ रही है। किर्गिस्तान में शंघार्इ सहयोग संगठन को ‘विकास की नयी संभावना’ की तरह देखा जा रहा है। जिसमें रूस और चीन के अलावा पूर्व सोवियत संघ के कर्इ राज्य एवं मित्र देश हैं। भारत और पाकिस्तान ने अपने पर्येवेक्षक देश होने के स्थान पर उसकी सक्रिय सदस्यता की पेशकश की है। ऐसी सिथति में साउथ स्ट्रमी पार्इप लार्इन के निर्माण की शुरूआत अमेरिकी उलझनों को बढ़ाने वाला ही प्रमाणित होगा।

7 दिसम्बर को रूस ने इस गैस पार्इप लार्इन बिछाने के परियोजना की शुरूआत दक्षिणी रूस के शहर ऐनेप्पा में की। यह पार्इप लार्इन काले सागर के तल से गुजरेगी। जिससे दक्षिणी रूस के विशाल गैस भण्डार का उपयोग संभव हो सकेगा। यह पार्इप लार्इन दक्षिणी रूस, काला सागर की तल से होता हुआ, पूर्वी यूरोपीय देश और मध्य यूरोप तक पहुंचेगा। बुल्गारिया, सर्विया, हंगरी, स्लोवानिया से होता हुआ इटली तक जायेगा। इसके रास्ते में यूक्रेन भी आता है, जो पूर्व सोवियत संघ का हिस्सा रहा है। इस गैस पार्इप लार्इन परियोजना को 2015 तक पूरा करने की योजना है।

इन पार्इप लार्इनों के द्वारा मध्य यूरोप को प्रतिवर्ष 63 बियिलन क्यूबिक मीटर गैस की आपूर्ति होगी। इसके निर्माण में रूस की स्टेट कम्पनी गैज़प्रौम- जिसके पास 50 प्रतिशत शेयर हैं और यूरोपीय देश जर्मनी, फ्रांस तथा इटली की कम्पनियां भी इस परियोजना के अन्य शेयर होल्डर एवं सहयोगी हैं। जर्मनी कम्पनी विंटरशाल, फ्रांस की कम्पनी र्इ0डी0एफ0 और इटैलियन एनजी ग्रुप अनाय का शामिल होना, रूस एंव यूरोपीय देशों के बीच के रिश्तों में वित्तीय पहल के रूप में देखा जा रहा है। इसका राजनीतिक महत्व इसलिये भी है, कि इस गैस पार्इप लार्इन बिछाने की परियोजना के पूरा होने के साथ ही, यूक्रेन की मोनोपोली घट जायेगी और यूरोपीय देशों को अपनी गैस की जरूरतों को पूरा करने के लिये गैस का बड़ा हिस्सा रूस से लेना होगा।

इस परियोजना की शुरूआत 2013 में होनी थी, किंतु रूस के दक्षिणी क्षेत्र में दो सेक्टरों में काम की शुरूआत समय से पहले शुरू हो गयी, जिसमें रूस के राष्ट्रपति पुतिन की मौजूदगी थी। इस परियोजना का अनुमानित लागत 21 बिलियन डालर है। वैसे निर्माण पर आने वाले खर्च की स्पष्ट जानकारी नहीं है।

रूस के इस परियोजना को यूरोपीय संध के विरोध का सामना करना पड़ रहा है। ‘यूरोपीयन एनर्जी मार्केट’ में रूस के प्रभाव को कम करने के लिये यूरोपीय संघ वैधानिक बाधायें पैदा कर रहा था। यूरोपीय संघ को आज भी इस बात का डर है, कि जर्मनी सहित यूरोपीय संघ के देशों का गैस के लिये रूस पर बढ़ती निर्भरता का राजनीतिक लाभ मास्को उठा सकता है। इससे रूस के वित्तीय सिथति में भी बड़ा फर्क आयेगा। रूस के लिये पशिचमी यूरोप को ऊर्जा का निर्यात करना आर्थिक रूप से काफी महत्व रखता है।

यूरोपीय संघ ने यूरोप में रूस को घुसने से रोकने के लिये हर मुमकिन कोशिशें की है। सितम्बर में यूरोपियन कमीशन द्वारा गैजप्राम कम्पनी पर ऐंटीमोनोपोली ला का उल्लंघन किया है। उसने यूरोपीय संघ के देशों के गैस ट्रांस्पोर्ट को रोक रखा है, बाजार पर अपना आधिपत्य स्थापित कर रहा है, और अपने उपभोक्ताओं से गलत कीमतें मांग रहा है। इसके अलावा यूरोपीय संघ ने कैसपियन सागर से मध्य यूरोप तक नाबुजो पार्इप लार्इन के जरिये गैस को लाने की कोशिश भी कर रहा है, जिसमें रूस की सम्बद्धता नहीं है, मगर इस साल नाबुजो पार्इप लार्इन का काम काफी कम हुआ है और इसका नाम बदल कर नाबुजो वेस्ट कर दिया गया है।

‘ट्रांस-अनालेलिन पार्इप लार्इन’ और नाबुजो वेस्ट ने वर्ष 2018 के शुरूआत से लगभग 10 बिलियन क्यूबिक मीटर गैस अजरबेजान से मध्य यूरोप तक भेजने का लक्ष्य तय किया गया है। इसलिये, यदि रूस यूरोप में गैस के आपूर्ति की व्यवस्था उससे पहले नहीं बना पाता है, तो ऊर्जा बाजार में दबदबा बनाने की कोशिशें नाकाम हो सकती हैं। साउथ स्ट्रमी के निर्माण का काम आगे बढ़ा कर रूस यूक्रेन पर भी अपने वर्चस्व को बढ़ाने की कोशिशें कर रहा है। यूक्रेन की अर्थव्यवस्था के लिये रूसी गैस को पशिचमी यूरोप तक की आपूर्ति बनाने के बदले जो शुल्क मिलना है, उसका बड़ा महत्व है। यूक्रेन की अर्थव्यवस्था पर इसका बुरा प्रभाव पड़ना भी तय है। मास्को अपने गैस पार्इप लार्इन नीति के जरिये कीव पर अपना प्रभाव बढ़ा रहा है। रूस और यूक्रेन की सरकार पिछले तीन सालों से गैस के कीमत पर बेनतीजा वार्तायें कर रही हैं। सस्ते गैस के बदले रूस यूक्रेन के गैस ट्रांस्पोर्ट सिस्टम पर अपना नियंत्रण चाहता है, जबकि गैस ट्रांस्पोर्ट सिस्टम यूके्रन की अर्थव्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण अंग है। रूस यूक्रेन पर मुक्त व्यापार क्षेत्र की सदस्यता का दबाव भी बना रहा है, जिसके अंतर्गत कजाकिस्तान, बेलारूस आदि देश उसके साथ हैं।

मास्को इस पार्इप लार्इन का उपयोग पूर्व सोवियत संघ के देशों और पूर्वी यूरोप के देशों के साथ अपने वित्तीय संबंधों को फिर से जोड़ने के लिये कर रहा है। ये देश वैशिवक मंदी से बुरी तरह प्रभावित है, और अपने उपयोग के लिये गैस का बड़ा हिस्सा रूस से आयात करते हैं।

पिछले साल जब उत्तरी स्ट्रमी की शुरूआत हुर्इ थी तब गैज़प्रौम ने बेलारूस की गैस कम्पनी बेल्टरान्स गैस को अपने अधीन कर लिया था, और अब बेलारूस की पूरी वित्तव्यवस्था को अपने नियंत्रण में लेने की कोशिश कर रहा है। साउथ स्ट्रमी का रूस के लिये राजनीतिक महत्व बढ़ गया है, किंतु साउथ स्ट्रमी के भविष्य के बारे में निशिचत तौर पर अभी कुछ नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि उसके सामने वित्तीय एवं कानूनी समस्यायें हैं। साथ ही बाजार भी सुनिशिचत नहीं है। यूरोपीय मंदी की वजह से प्राकृतिक गैस के मांग में भी कमी आयी है। यही कारण है कि यह सवाल किया जा रह है कि क्या रूस के साउथ स्ट्रमी प्रोग्राम की जरूरत है? उनका तर्क है कि नार्थ स्ट्रमी का पहला पार्इप लार्इन अपनी पूरी क्षमता का मात्र 30 से 40 प्रतिशत के बीच ही उपयोग कर पाता है, यही नहीं, इस साल रूस के द्वारा किये जा रहे प्राकृतिक गैस के निर्यात में, गये साल की तुलना में, 4 से 5 प्रतिशत की भी कमी आयी है।

इसके बाद भी, रूस का यह कार्यक्रम उसके लिये जरूरी बन गया है। जिसके जरिये रूस पूर्व सोवियत संघ के देशों एवं पूर्वी यूरोप के देशों से वित्तीय संवाद की सिथतियां बना रहा है। यूरोपीय संघ और अमेरिका की सबसे बड़ी चिंता भी यही है कि रूस इसका राजनीतिक लाभ उठायेगा। रूस और अमेरिका के बीच मानवाधिकार के मुददे को लेकर एक दूसरे को प्रतिबंधित करने की लड़ार्इ शुरू हो गयी है। जिसे देख कर शीतयुद्ध की सिथतियों का एहसास स्वाभाविक रूप से होता है।

रूस ने अमेरिका के सीनेट द्वारा पारित उस कानून को खारिज कर दिया है, जिसमें रूस के उन लोगों के अमेरिका आने पर रोक लगा दी गयी है, जिन पर मानवाधिकार के उल्लंघन का आरोप लगा हो। अमेरिका के इस कदम को गैर दोस्ताना और राजनीति से पे्ररित बताते हुए डयूमा के द्वारा पारित वाकोवलीव बिल पर हस्ताक्षर कर दिये हैं, जिसके अंतर्गत उन अमेरिकी लोगों को रूस आने से प्रतिबंधित कर दिया है, जिन्होंने रूसी बच्चों को गोद ले, उनके साथ अमानवीय व्यवहार कर, मानवाधिकार का उल्लंघन किया है। यह बिल 1 जनवरी 2013 से लागू हो जायेगा। रूस अमेरिक के द्वारा किये जा रहे मानवाधिकार के उल्लंघन की अनदेखी न करने की घोषणा पहले ही कर चुका है। दोनाें ही देशों के बीच का तनाव और आपसी हितों में टकराव खुलेआम हो गया है।

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