Home / राष्ट्रीय परिदृश्य / प्रधानमंत्री जी, ‘देश की सेवा‘ जम कर कर रहे हैं

प्रधानमंत्री जी, ‘देश की सेवा‘ जम कर कर रहे हैं

teach6

प्रधानमंत्री जी ने, शिक्षक दिवस के दिन, बच्चों के साथ बच्चों जैसी बातें की।

मीडिया जी खोल कर तालियां बजाई।

कई दिनों तक तालियां बजती रहीं।

गूंज अभी भी बाकी है।

अब रेडियो की बारी है। टी.वी. चैनलों पर आप छा गये।

कितनी परिपाटियां टूटीं। हार्डटास्क मास्टर ने मास्टरों के कान खींचे या नहीं खींचे? यह सवाल नहीं है।

प्रधानमंत्री जी अब खुद को प्रमोट कर रहे हैं।

अच्छा है।

बुरा सिर्फ इतना है, कि यदि गल्तियां होती हैं -और होनी तय है- तो दोष आप किस पर मढ़ेंगे?

जाने दीजिये। ओहदा बड़ा है, सुप्रिम पीएम का खिताब, खिताबी दौड़ में शामिल हुए बिना, आपके पास है। आपके हौसले बुलंद हैं।

एक सवाल है-

आपकी नीतियां नैतिक जुमलों और लच्छेदार जुबान के भरोसे कब तक चलती रहेगी?

कब तक एक आदमी राजनीतिक मंच पर करतब दिखा सकता है?

एक बच्चे ने आप से सवाल किया- ‘‘मैं देश का पीएम कैसे बन सकता हूं?‘‘

यह बच्चे की उत्सुकता थी, या महत्वाकांक्षा, या प्रधानमंत्री बनने की जटिलताओं या आपके प्रधानमंत्री बनने के गणित को समझने की उसकी चाहत? हमें नहीं पता। हमें पता है, कि उसके सवाल पर ‘छोटा मुंह, बड़ी बात‘ की तर्ज पर लोग हंसे।

आपने जवाब दिया- ‘‘आप 2024 के चुनाव की तैयारी कीजिये। और हां, पीएम बने तो मुझे शपथ ग्रहण समारोह में जरूर बुलाइयेगा।‘‘

लोगों के लिये यह हाजिर जवाबी थी।

कुछ को यह चुटकुले की तरह लगा।

लेकिन बच्चे की प्रतिक्रिया जब चैनलों पर आयी, तो उसने कहा- ‘‘पीएम को इस जवाब के लिये मैं ए-प्लस तो नहीं दे सकता।‘‘

क्या समझे आप?

हमारी समझ में सिर्फ इतनी बात आयी प्रधानमंत्री जी, कि जवाब नाकाफी था। इंफाल के निक्सन के लिये जो जवाब तसल्ली बख्श नहीं, उसे शानदार करार देने की कवायत कितनी तसल्ली बख्श हो सकती है?

वैसे, आपकी यह तो मानना ही चाहिये, कि सवाल पूछने वाले को ही जवाब का स्तर तय करने का अधिकार है।

प्रधानमंत्री जी को चाहने वाले यह तय करने में लगे हैं, कि लोग मान लें- जवाब शानदार है, इसलिये यह गुस्ताखी है, कि सवालकर्ता ए-प्लस देने में कोताही कर रहा है और इंटरनेट पर इसका प्रचार भी हो रहा है।

वैसे, प्रधानमंत्री जी अभी-अभी जम्मू-कश्मीर के बाढ़ का नजारा देख कर आ रहे हैं। जो भयावह है। घोषित तौर पर प्राकृतिक आपदा है, मगर वास्तव में है नहीं। उत्तराखण्ड के बाद नाराज प्रकृति का सबक। जिसे सरकारों की नीतियां ही निर्धारित करती है। सुनिश्चित करती है।

असम की अनीता का सवाल था- ‘‘पर्यावरण की रक्षा की बात हर बार की जाती है, लेकिन हम इसकी रक्षा कैसे कर सकते हैं?‘‘

जवाब था- ‘‘पर्यावरण जैसा है, वैसा ही है, वह नहीं बदला, लेकिन हम बदल गये।‘‘ और प्रधानमंत्री जी पे्रम का पाठ पढ़ाने के बाद चांदनी रात में खम्भे पर जल रहे बत्ती को बुझा कर, पर्यावरण के लिये बेहतर करने की राह दिखा रहे हैं।

सवाल जहां था, वहीं छूट गया।

देश की सेवा से लेकर शिक्षा के सवालों के साथ भी यही हुआ।

बड़े-बड़े कामों से देश की सेवा करने का अधिकार प्रधानमंत्री जी ने अपने और जिनकी सेवा से भारी मुनाफा होता है, उनके जिम्मे छोड़ दिया, बाकी जो बचा, जिसमें सफाई से लेकर बिजली बचाने का काम है, उसे उनके हवाले कर दिया, जिन्हें आने वाले कल में कर्मचारी और अधिकारी बनना है। अपनी पूरी क्षमता और अपनी पूरी जिंदगी को निजी कम्पनियों को बेचना हैं।

जो प्रधानमंत्री जी की सोच और राजनीति को समझते हैं, शायद उन्हीं में से एक ने सवाल किया-

‘‘क्या राजनीति एक मुश्किल प्रोफेशन है?‘‘

प्रधानमंत्री जी ने कहा- ‘‘राजनीति प्रोफेशन नहीं। यह सेवा करने का मौका है।‘‘

जिसे उन्होंने कांग्रेस को पछाड़ कर, आम आदमी को पटकनिया मार और क्षेत्रीय दलों को धूल चखा कर, और करने के वायदे के साथ, हासिल किया है।
हमें लगता है, सवाल ठीक था। जवाब चाशनी में डूबा हुआ रसगुल्ला है।

हमारे देश में, प्रायोजित सरकार के प्रधानमंत्री जी, हर एक मौके पर खुद को प्रमोट कर, देश की सेवा जमकर कर रहे हैं।

Print Friendly

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

Select language:
Hindi
English
Scroll To Top