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11 सितम्बर अमेरिकी आतंकवाद

President Barack Obama addresses a joint session of the United States Congress on the subject of job creation on Capitol Hill in Washington

11 सितम्बर को अमेरिकी सरकार ग्राउण्ड जीरो पर खड़ी होती है, और उन लोगों के लिये शोक मनाती है, जो 9/11 की घटना में मारे गये। जिसे संयुक्त राज्य अमेरिका पर आतंकवादी हमला करार दिया गया। बदले की कार्यवाही शुरू की गयी और आतंकवाद विरोधी वैश्विक अभियान की शुरूआत हुई। 11 सितम्बर 2001 की वारदात के बाद से 11 सितम्बर को अमेरिका के राष्ट्रीय दिवस का दर्जा सा मिल गया।

13 साल बाद भी अमेरिकी सरकार यह प्रमाणित करने में लगी है, कि वह आतंकवाद विरोधी है।

यह हास्यास्पद है।

बराक ओबामा दिल पर हाथ रख कर कहते हैं- ‘‘अमेरिका के लिये जो भी खतरा बनेगा, उसका नामो-निशान मिटा दिया जायेगा।‘‘

मैं नहीं समझता, कि ‘‘अमेरिकी सरकार में विश्व समुदाय और आम अमेरिकी के लिये, दुनिया को आतंकवाद से भय मुक्त करने के लिये, खुद को मिटाने का साहस है।‘‘ अमेरिका के ‘आॅकोपायी वाॅल स्ट्रीट मोमेन्ट‘ में ऐसे सैंकड़ों पोस्टर थे, जिन पर लिखा था- ‘‘व्हाईट हाउस, कांग्रेस और वाॅल स्ट्रीट, वास्तविक आतंकवादी हैं।‘‘ जिन्हें कुचल दिया गया।

आज भी ऐसे अमेरिकी नागरिक बड़ी तादाद में हैं, जो यह मानते हैं, कि ‘‘अमेरिका दुनिया भर में स्वतंत्रता और लोकतंत्र के लिये संघर्ष कर रहा है।‘‘ उन्हें नहीं मालूम कि अमेरिका स्वतंत्रता और लोकतंत्र के लिये नहीं, बल्कि उसे खत्म करने, उसे कुचलने की लड़ाई लड़ रहा है। और आतंकवाद के खिलाफ उसकी वैश्विक लड़ाई, उसी का हिस्सा है। जिन्हें वह आतंकवादी कहता है, वो अमेरिकी सरकार के सबसे बड़े सहयोगी हैं। उसके पेशेवर विद्रोही हिंसा और आतंक का माहौल बनाते हैं, किसी भी देश में राजनीतिक अस्थिरता पैदा करते हैं, सैन्य हस्तक्षेप की स्थितियां बनाते हैं। पेशेवर विद्रोही और आतंकी अमेरिकी एवं पश्चिमी देशों के हथियारों से लड़ते हैं, उन्हीं से आर्थिक सहयोग उन्हें मिलता है, और कूटनीति समर्थन भी उन्हें हासिल होता है।

अमेरिकी सरकार और पश्चिमी ताकतों को यह सुविधा हासिल है, कि वो जब चाहें उन्हें लोकतंत्र समर्थक विद्रोही घोषित कर दे और जब चाहे आतंकवादी।

1980 के दशक में अमेरिकी सहयोग से, अफगानिस्तान में, सोवियत सेना और वहां के समाजवादी क्रांति के खिलाफ लड़ने वालों को अमेरिकी सरकार ‘ब्रेव फ्रीडम फाईटर‘ -वीर स्वतंत्रता सेनानी- का दर्जा देती थी, वही अल कायदा और ओसामा-बिन-लादेन को अमेरिका का सबसे बड़ा दुश्मन बनाया गया। कुछ सालों के भीतर ही अमेरिकी स्वतंत्रता के इतिहास में, वह सबसे बड़ा खतरा बन गया। एक ऐसा खतरा जिसकी ओट में सिर्फ अफगानिस्तान में ही नहीं दुनिया भर में -जहां भी आतंकवादी संगठन हैं, उनके खिलाफ सैन्य अभियान चलाने का स्वयंभू अधिकार ही हासिल नहीं किया गया, बल्कि अमेरिकी नागरिकों की स्वतंत्रता पर असंवैधानिक और सर्वाधिकारवादी हमले किये गये, ‘पेट्रियोट एक्ट‘ और ‘एनएसए‘ खुफियागिरी को विस्तार दिया गया।

आज अमेरिकी लोकतंत्र, लोकतंत्र के नाम से वित्तीय पूंजी की तानाशाही में बदल गया है। वास्तविक सत्ता न तो देश की आम जनता के हाथ में है, ना ही पूंजीवादी लोकतंत्र के प्रतीक बने व्हाईट हाउस और अमेरिकी कांग्रेस के हाथ में है। वह वाॅलस्ट्रीट के बैंकों, वैश्विक वित्तीय इकाईयों और काॅरपोरेट के हाथों में है। अमेरिकी सरकार जिनके निर्देशों का पालन करती है। अमेरिकी सरकार, अमेरिकी सेना, उसकी गुप्तचर इकाई और उसके रणनीतिकारों के कारनामों की कोई सीमा नहीं है। उसने वैश्विक स्तर पर अमेरिकी आतंक की स्थापना की है, जिसके सहयोगी पूर्व औपनिवेशिक देश हैं, और जिसके निशाने पर हमेशा से तीसरी दुनिया के देश रहे हैं।

41 साल पहले, 11 सितम्बर 1973 में लातिनी अमेरिकी देश चिली के जिस तख्तापलट के साथ जहरबुझे नवउदारवादी सोच को अंजाम दिया गया, उसे आज भी बढ़ाया जा रहा है। वही वर्तमान बाजारवाद की नींव पर खड़ा अमेरिकी आतंक है। वास्तव में 11 सितम्बर 1973, 2001 के 11 सितम्बर से बड़ा हादसा है। जो विश्व शांति और दुनिया की स्थिरता के लिये सबसे बड़ा अमेरिकी खतरा बन चुका है। मुक्त व्यापार या बाजारवादी अर्थव्यवस्था की सोच के साथ ही राजनीतिक आतंकवाद की शुरूआत भी नये सिरे से हुई, जिसका मुखिया अमेरिका है। चिली की चुनी हुई लोकतांत्रिक सरकार को, अमेरिकी सहयोग से चिली की सेना ने सत्ता से बे-दखल कर दिया और लोकतंत्र के विरूद्ध जनरल पीनोचेट की तानाशाही को थोप दिया गया।

यह तख्तापलट ‘शिकागो स्कूल आॅफ इकोनाॅमिस्ट‘ के नवउदारवादी सिद्धांतों को लागू करने के लिये किया गया। जिनकी ख्याति(?) ‘शिकागो ब्वाॅयज़‘ के नाम से भी है। यह वैश्विक स्तर पर मिल रहे कम्युनिस्ट अर्थव्यवस्था और दुनिया के समाजवादी देशों के आर्थिक विकास के विरूद्ध रची गयी साजिश थी। जिसका स्वरूप वैश्विक था, जिसके निशाने पर तीसरी दुनिया के देश थे। आज यूरोप के लगभग सभी देशों की सरकारें और राजनीतिक दल नवउदारवादी अर्थव्यवस्था के समर्थक देश हैं। और वो अमेरिका के साथ मिल कर, अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष, विश्व बैंक और विश्व व्यापार संगठन के माध्यम से उसे दुनिया पर थोप रहे हैं। नवउदारवादी वैश्वीकरण और आतंकवाद के खिलाफ युद्ध वास्तव में दुनिया पर आर्थिक एवं आतंकी हमला है।

इसलिये यह सोचना, चिली में नवउदारवाद का जन्म हुआ, उसकी शुरूआत और विस्तार को कम कर के आंकना है। वास्तव में यह समाजवादी सर्वहारा क्रांति और माक्र्सवादी सोच रखने वाले राष्ट्रपति सल्वाडोर अलेंदे की ऐसी सरकार का तख्तापलट था, जिसे चिली की आम जनता लोकतांत्रिक पद्धति से चुनी थी। सल्वाडोर अलेंदे लोकतांत्रिक चुनवी पद्धति से चुने गये दुनिया के पहले माक्र्सवादी राष्ट्रपति थे।

1970 के इस चुनाव ने अमेरिकी साम्राज्य को चिंतित कर दिया। उसके लिये यह बड़ा खतरा था, कि माक्र्सवादी कम्युनिष्टों के द्वारा पूंजीवादी चुनावी प्रक्रिया से राजसत्ता पर अधिकार जमाने की शुरूआत उसकी बुनियादें हिला देंगी। माक्र्सवादियों का लोकतांत्रिक होना और आम जनता का वर्गगत आधार पर जागरूक होना उसके लिये बड़ा खतरा था। और 11 सितम्बर 1973 को अलेंदे का तख्तापलट हुआ। उन्होंने आत्महत्या की(?) उनकी हत्या की गयी। चिली अमेरिकी समर्थक सेना की तानाशाही के अंतर्गत आ गया।

जनरल पीनोचेट की 17 साल की क्रूर तानाशाही के दौरान 3000 से ज्यादा लोगों को सरकारी हिरासत में यातना दे कर मार डाला गया। 28,000 से ज्यादा लोगों को बिना किसी न्यायिक प्रक्रिया के हिरासत में रखा गया। उन्हें अमानवीय यातनायें दी गयीं। 40,000 से ज्यादा चिलीवासी पीनोचेट की तानाशाही के शिकार हुए। चिली में मिल्टन फ्राइडमैन शैली की पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के ऐसे प्रारूप को लागू किया गया, जिसका लाभ 1 प्रतिशत लोगों को मिलता था। जिसकी वजह से सामाजिक एवं आर्थिक असमानता और आम लोगों की गरीबी अपने चरम पर पहुंच गयी। पीनोचेट के खिलाफ होने वाले जनप्रदर्शनों को बड़ी बेरहमी से कुचला गया। प्रदर्शनकारियों को सड़कों पर जिंदा जला दिया जाता था। गोली मारने से पहले संगीतकारों की अंगुलियां तोड़ दी जाती थी। मिल्टन फ्राइडमैन शिकागो विश्वविद्यालय का वह अर्थशास्त्री है, जिसने नवउदारवादी अर्थव्यवस्था के प्रारूप को तैयार किया, जिसे चिली में तख्तापलट के बाद पहली बार लागू किया गया और जिसके विद्यार्थी शिकागो ब्वाॅयज कहे गये।

चिली ‘शिकागो स्कूल‘ के नवउदारवादी अर्थशास्त्रियों के लिये खेल का ऐसा मैदान बन गया, जहां उन्होंने उदारवादी अर्थव्यवस्था के नियमों और कायदों को लागू किया। उसे क्रूरता की हद तक लागू किया। चिली को अमेरिकी शोषण और आर्थिक दमन के लिये पूरी तरह खोल दिया गया। चिली को अमेरिकी आर्थिक सहयोग से चलने वाले ‘आॅपरेशन काॅनडोर‘ का हिस्सा बना दिया गया। जिसकी योजना थी -दक्षिण अमेरिका के महाद्वीप के साउदर्न कोन में वहां की आम जनता को अपने नियंत्रण में लेने के लिये सैनिक तानाशाही की स्थापना।

‘आॅपरेशन काॅनडोर‘ के प्रमुख सदस्य देश थे- अर्जेन्टिना, चिली, उरूग्वे, पराग्वे, बोलेविया और ब्राजील की सरकार। विकिपीडिया के अनुसार ‘‘अमेरिकी सरकार जिन्हें इस योजना को लागू करने के लिये तकनिकी सहयोग और सैनिक सहायता देती थी।‘‘ बाद में इस अभियान में इक्वाडोर और पेरू की सरकारों को भी शामिल कर लिया गया। इस तरह लातिनी अमेरिका के ब्राजील और अर्जेन्टिना जैसे बड़े देश और दक्षिणी क्षेत्र के कई देशों पर अमेरिकी सरकार का नियंत्रण हो गया। जहां लोकतंत्र के विरूद्ध अमेरिकी सरकार ने सैनिक तानाशाही की स्थापना की। ‘आॅपरेशन काॅनडोर‘ का सबसे क्रूरतम तानाशाह था, अर्जेन्टिीना का जाॅर्ज राफेल विडेला। जिसने 1976 में इसाबेल पेओर का सैनिक तख्तापलट किया।

यह ‘शिकागो स्कूल‘ के नवउदारवादी अर्थशास्त्रियों के लिये, अब तक की सबसे बड़ी सफलता थी। उन्होंने चिली की तरह अर्जेन्टिना को भी अपनी उदारवादी आर्थिक नीति को लागू करने का, ‘बड़ा खेल का मौदान‘ बना लिया। सैनिक तानाशाही के इस खेल में, एक अनुमान के अनुसार -30,000 से ज्यादा लोगों की हत्या की गयी और अनगिनत लोगों को यातनायें दी गयीं। नवउदारवादी आर्थिक नीतियों को लागू किया गया, जिसके तहत सरकार की नीतियों से व्यापार में ढ़ील देना, पूंजीपतियों पर लगाये गये करों को कम करना, समाज के सबसे कमजोर वर्ग पर नये कर लगाना और सरकार के द्वारा चलाये जा रहे कल्याणकारी योजनाओं को खत्म करना, आम लोगों की स्वतंत्रता और उनके अधिकारों को समाप्त करना, मजदूरी दरों में कटौती करना और विरोध का दमन करना जैसे कदम उठाये गये। जिसकी वजह से अर्जेन्टिना के लाखों-लाख लोगों को भूख, गरीबी और अव्यवस्था का सामना करना पड़ा।

obama-nixonचिली के तख्तापलट के बाद लगभग 2,00,000 चिलीवासियों को अपना देश छोड़ना पड़ा।

‘आॅपरेशन काॅनडोर‘ की वजह से 60,000 से ज्यादा लोगों की मौतें हुईं। जिसका मकसद समाजवादी एवं साम्यवादी प्रभाव को जड़मूल से उखड़ना और मजबूत विपक्ष एवं जनप्रतिरोध को समाप्त करना।

लातिनी अमेरिका के दक्षिण क्षेत्र के देशों में चलाये गये आॅपरेशन काॅनडोर के साथ 1970 के दशक में अमेरिका ने अर्जेन्टिना के साथ मिल कर मध्य अमेरिकी देशों के लिये ‘आॅपरेशन चार्ली‘ की शुरूआत की। जिसके निशाने पर मध्य अमेरिका के निकारागुआ, हुण्डुरास, अल् सल्वाडोर और ग्वातेमाला जैसे देश थे। जहां दक्षिणपंथी तानाशाही को स्थापित करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया। 1980 में अर्जेन्टिना के तानाशाह अमेरिकी प्रशासन और नाजी युद्ध अपराधी क्लाउस बार्बी ने मिलकर बोलेविया के ‘कोकीन तख्तापलट‘ को खड़ा किया और वहां लुइस गार्सिया मेजा को स्थापित किया। जिसने सत्ता में आते ही सभी राजनीतिक दलों को गैर-कानूनी करार दिया, विपक्षी दलों के नेताओं को देश से निष्कासन का आदेश दिया, सभी ट्रेड यूनियनों को बैन कर दिया, प्रेस को प्रतिबंधित घोषित किया गया और सत्ता संभालने के 13 महीनों के अंदर 1000 से ज्यादा लोगों की हत्या करा दी।

कई पुरस्कारों से सम्मानित पत्रकार जाॅन दगिआॅस ने अपनी किताब ‘द काॅनडोर ईयर‘ में अमेरिकी सीआईए और दक्षिण अमरिकी तानाशाहों के इस गठजोड़ को एक ‘आतंकवादी संगठन‘ करार दिया है। जिसने हजारों-हजार नागरिकों की हत्यायें की।

वर्तमान लातिनी अमेरिका एवं मध्य अमेरिका के समाजवादी देश और समाजवादी रूझान रखने वाले देशों के लोग तानाशाही के दौर में मारे गये एवं अब तक लापता लोगों को 11 सितम्बर के दिन याद करते हैं। उनके लिये 11 सितम्बर अमेरिका समर्थित तानाशाही के विरूद्ध, जन एकजुटता का प्रतीक है।

11 सितम्बर 2014 को अमेरिकी सरकार अपने को इस्लामिक स्टेट के जिस आतंकवाद के खिलाफ खड़ा होने को, दिखा रही है, वह उसी के आतंकवादी गतिविधियों की पैदाईश है। इराक में वह जिस आईएस -इस्लामिक स्टेट- के खिलाफ हवाई हमले कर रही है, वही इस्लामिक स्टेट के आतंकवादी सीरिया में बशर-अल-असद सरकार के खिलाफ लड़ रहे हैं, जिन्हें सत्ता से बे-दखल करना अमेरिकी सरकार की नीति है। और अल-कायदा से सम्बद्ध अल-नुसरा फ्रंट को आर्थिक सहयोग एवं हथियारों की आपूर्ति कर रहे हैं, जो बशर-अल-असद सरकार के खिलाफ अमेरिकी हितों के लिये लड़ रहा है। और अल-नुसरा फ्रंट इस्लामिक स्टेट के साथ मिल कर न सिर्फ असद सरकार के खिलाफ लड़ चुका है, बल्कि इस बात के भी प्रमाण हैं, कि वह इस्लामिक स्टेट के आतंकवादियों को हथियार भी पहुंचा रहा है। दोनों सीरिया के गोलान हाईट क्षेत्र पर कब्जा जमा चुके हैं।

9/11 के लिये जिस अल-कायदा को बिना किसी खास सबूत के दोषी करार दिया गया, उसके सरगना ओसामा-बिन-लादेन को पाकिस्तान में मार गिराया गया, वही अल-कायदा अफगानिस्तान, इराक, लीबिया और सीरिया में अमेरिकी सरकार का सहयोगी है।

यह समझना मुश्किल है, कि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा किस आतंकवाद के खिलाफ दुनिया भर में आतंकवाद विरोधी अभियान चला रहे हैं? विश्व समुदाय से साथ देने की गुजारिश कर रहे हैं? मगर यह समझना आसान है, कि ओबामा ऐसा क्यों कर रहे हैं?

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