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‘मेक इन इण्डिया‘ – निवेशकों के साथ निर्माण का सपना

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अपने देशी की सरकार बनाने के अधिकार की तरह ही, आम जनता के हाथ से अपने देश के निर्माण का हक छीना जा रहा है, जिसकी शुरूआत 25 सितम्बर को देश की चुनी हुई मोदी सरकार राजधानी के विज्ञान भवन से ‘मेक इन इण्डिया‘ के रूप में करने जा रही है।

कल तक अपने देश और समाज का निर्माण देश की आम जनता करती थी, और सरकारें आम जनता के साथ होती थीं, आम जनता सरकार का हाथ बंटाती थी। आज पाशा पलट दिया गया है, समाज के बहुसंख्यक वर्ग का दर्जा बदल दिया गया है। वह उत्पादन का साधन और बाजार में उपभोक्ता है। एक भीड़ है, जिसकी जरूरतें सरकार नहीं बाजार से पूरी होगी। बाजार अब सरकार के सिर पर है। और सिर पर ज्यादा लोगों के लिये जगह नहीं है।

अब जनता ही तय करे, कि यदि वह सरकार की पहली वरियता नहीं है, तो उसकी जगह कहां है?

आम जनता को निचले दर्जे पर लाने की शुरूआत हो चुकी है। अब उसकी समझ में यह भी आ जायेगा, कि काॅरपोरेट सरकार का मतलब क्या होता है? उधार के पैसे से घी पीने और पिलाने की योजना बन चुकी है। भारत ‘मैन्यूफेक्चरिंग हब‘ बनेगा। घोषित तौर पर कुछ ऐसी ही योजना है। जिसमें देश और दुनिया के पूंजी निवेशक, निजी कम्पनियां और काॅरपोरेशन उनके सहयोगी होंगे। उनका मकसद ऐसे ही लोगों के साथ मिल कर भारत का निर्माण करने की है।

ये महानुभव अपने देश का निर्माण कर चुके हैं। उसकी लुटिया डुबा चुके हैं। उसकी अर्थव्यवस्था के पंख नोच चुके हैं। उन्हें विकासशील देशों के परिन्दों से बड़ा प्यार है। मोदी ही उन्हीं के प्यारे हैं। जो भारत निर्माण की योजना के योजनाकार हैं।

उनके इस ‘मेक इन इण्डिया‘ के अभियान की शुरूआती समारोह़ में देश के सभी औद्योगिक घरानों और समूहों सहित ग्लोबल काॅरपोरेट जगत के मानिंद सीईओ के शामिल होने की उम्मीद है। जिनके सामने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने विचार रखेंगे। अपने नजरिये को समझायेंगे। यह भी बतायेंगे कि आपके लिये ‘रेड कारपेट‘ है। काॅरपोरेट बंधुओं अपने मुबारक कदमों को रखिये। कारपेट कदमबोशी को तैयार है।

मोदी जी की ‘मेक इन इण्डिया‘ अभियान को दिल्ली के साथ मुम्बई, बंगलुरू, चेन्नई और सभी राज्यों की राजधानी में एक साथ शुरू करने की है। वह वैश्विक निवेशकों को संदेश देना चाहते हैं, कि पूरा देश आपके निवेश के लिये तैयार है।

विदेशों में ‘मेक इन इण्डिया‘ के लिये रोड शो होगा। निश्चय ही मदारी के साथ जमूरों को भी तैयार किया गया होगा। निवेशकों को यह बताने की योजना है, कि भारत में ई-काॅमर्स सहित विभिन्न क्षेत्रांें में कारोबार शुरू करने के लिये एक ही खिड़की से सब निपट जायेगा, सहुलियतों की कोई कमी नहीं होगी। आधारभूत ढांचे के निर्माण की कमान प्रधानमंत्री कार्यालय संभाल चुका है। योजना के प्रस्ताव और अनुमोदक नरेंद्र मोदी जी हैं। आम जनता जहां थी, वहीं है। उसे इस बात की खबर नहीं है, कि ‘मैन्यूफेक्चरिंग हब‘ क्या होता है? देश की अर्थव्यवस्था और औद्योगिक क्षेत्रों के पूंजी निवेश का क्या मतलब है? वह नहीं जानती कि यदि बाजार सरकार पर भारी है, तो बाजार की चलती ही सरकार पर चलेगी। और सरकार यदि बाजार के इशारे पर चलेगी तो क्या होगा?

और देश की सरकार बाजार के इशारे पर चल रही है।

और जो होना है, वह इतना है, कि जो अपना है- देश, दुनिया और सरकारें, वह हमारी नहीं रहेंगी, उन पर निवेशकों, निजी कम्पनियों, दैत्याकार काॅरपोरेशनों का अधिकार हो जायेगा।

‘मेक इन इण्डिया‘ इन्हीं निवेशकों और निजी वित्तीय पूंजी पर अधिकार जमा कर बैठे लोगों को, अपने देश में बुलाने का अभियान है। यह देश की सरकार को छोटा बनाने का अभियान है। यह पूंजी की वरियता को स्थापित करने और देश की आम जनता को उनके हवाले करने का अभियान है।

जिन निवेशकों और वित्तीय ताकतों के साथ मिल कर मोदी जी देश का निर्माण करना चाहते हैं, उन्हीं ताकतों ने यूरोपीय देशों को अपना कर्जदार बनया, उनकी अर्थव्यवस्था को दीवालियापन की कगार पर खड़ा कर, नये कर्जों से उसे अपने कब्जे में कर लिया। अमेरिकी कांग्रेसनल बजट आॅफिस की रिपोर्ट के अनुसार अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर उसकी जीडीपी का 74 प्रतिशत कर्ज है। जापान पर उसके जीडीपी का 180 प्रतिशत कर्ज है। वह सबसे बड़ा कर्जखार देश है। ग्रीस पर लगभग 150 प्रतिशत, इटली पर 109 प्रतिशत और जर्मनी पर उसके जीडीपी का 80 प्रतिशत कर्ज है। अमेरिका 11वें नम्बर का कर्जदार देश है। जिनकी अर्थव्यवस्था के संभलने की संभावनायें खत्म सी हो गयी हैं। क्योंकि आने वाले वर्षों में उसके कर्जों में इजाफा होने का ही अनुमान है, यही हाल यूरोपीय संघ के सदस्य देशों का है।

अपनी अर्थव्यवस्था को संभालने के लिये इन देशों की सरकारों ने पहले कर्ज लिये, देश की आम जनता को काम के अवसर दिखाये गये। किंतु, कर्ज एवं निवेशकों पर टिकी अर्थव्यवस्था की सेहत बिगड़ती चली गयी, बड़े कर्ज से छोटे कर्ज को जमा करने की राह दिखायी गयी। आर्थिक विकास के नये सपने बांटे गये। औद्योगिक नगर, इण्डस्ट्रियल काॅरिडोर और दुनिया भर के बाजार पर अधिकार और अर्थव्यवस्था के संभलने की संभावनायें बनायी गयीं, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ, सरकार के नियंत्रण से बाहर हुई निजी वित्तीय पूंजी ने इन देशों की सरकारों और उनकी अर्थव्यवस्था पर अधिकार कर लिया। अब सरकारें अपने देश की सार्वजनिक सम्पत्तियां नीलाम कर रही हैं। उनके औद्योगिक नगर डेट्राॅयट की तरह दीवालिया हो गये हैं। सरकारें आम जनता पर नये कर लगा रही है, सामाजिक कार्यों में कटौती, वेतन-पेंशन एवं सुविधाओं में कटौतियां कर रही हैं। देशी-विदेशी कर्ज का भुगतान उनके अर्थव्यवस्था की क्षमता से बाहर हो गया है, वो कर्ज पर तय किये गये ब्याज का भुगतान तक नहीं कर पा रही हैं। यूरोप की जनता डस्टबिन में भोजन तलाश रही है, और आम अमेरिकी भी उनके करीब है।

नवउदारवादी नीतियों से अपनी अर्थव्यवस्था को दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के दर्जे तक पहुंचाने वाले चीन में सामाजिक एवं आर्थिक असमानता के खिलाफ व्यापक जनअसंतोष है। वहां समाजवादी सामाजिक सुरक्षा की सीमायें टूट गयी हैं।

मोदी जी चीन, जापान, अमेरिका, यूरोप और दुनिया के ऐसे ही पूंजी निवेशकों के साथ मिल कर भारत का निर्माण करना चाहते हैं। ‘मेक इन इण्डिया‘ का अभियान 25 सितम्बर से शुरू करना चाहते हैं। ऐसे सपने देख और दिखा रहे हैं, जिन सपनों की उम्र बीत चुकी है। लातिनी अमेरिका के समाजवादी देशों से जिन्हें खदेड़ा जा रहा है और पूरे महाद्वीप में सहयोग एवं समर्थन से जनसमर्थक सरकारें अपने देश एवं महाद्वीप की आम जनता के सहयोग से अपने देश का निर्माण कर रही हैं।

मेक इन इण्डिया- निवेशकों के साथ भारत के निर्माण का ऐसा सपना है, जहां देश, देश की सरकार और देश की आम जनता के लिये कोई जगह नहीं है। देश बाजार, सरकार साझेदार और आम जनता श्रमशक्ति का स्त्रोत और उपभोक्ता है, जिस पर मुनाफे की शर्तें लदी हैं।

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