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ग्वातेनामो- आरोप मुक्त 79 कैदियों का मामला

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अमेरिका के ‘ग्वातेनामो बे‘ के कारागार में अभी भी 149 कैदी हैं, जिनमें से 79 कैदियों को आरोप मुक्त कर दिया गया है, मगर उनके पास जाने के लिये कोई जगह नहीं है। वो चाह कर भी अपने देश वापस नहीं जा सकते, क्योंकि अमेरिकी सरकार यह मानती है, कि ‘‘उनके साथ जो भी हुआ है, वो रिहा होने के बाद यदि अपने देश पहुंच गये तो अमेरिकी सरकार के लिये खतरा बन सकते हैं।‘‘ इसलिये उनकी रिहाई की राहें उनके अपने देश, अपने परिवार, अपने लोगों तक नहीं पहुंचती। वो अपने घर वापस नहीं हो सकते।

उन्हें हिरासत में भी लिया गया था, इस शक की वजह से कि वो अमेरिकी सरकार के लिये खतरा हैं। और यह शक बे-बुनियाद ही प्र्रमाणित हुआ। सिर्फ अमेरिका के लिये खतरा होने के बे-बुनियाद शक ने उन्हें लम्बी यातनायें दी और इस लम्बी यातना का उनके जीवन में कोई अंत नहीं है। वो बे-वतन हैं, बे-घरवाबर हैं। उनके पांव के नीचे न तो जमीन है, ना ही वो वहां पहुंच सकते हैं, जहां उनके होने की नाल गड़ी है, उनकी पहचान, उनकी जिंदगी दफन है। वे दुनिया के किसी भी देश के ना तो बाशिंदा हैं, ना ही नागरिक हैं। और जहां, जिस कैदखाने में उन्होंने एक दशक से लम्बी जिंदगी गुजारी, अमानवीय यातनायें सही, जिन्हें काल कोठरियों में, किसी भी पल गोली मार दिये जाने की आशंकाओं के बीच जीने के लिये अमेरिकी सरकार ने विवश किया, उसे अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने बंद करने का निर्णय लिया है, क्योंकि ग्वातेनामो जेल और सैनिक यातना शिविर अब अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिये एक बोझ है।

आरोप मुक्त होने के बाद भी, उन कैदियों के पास, अपने जीवन के सबसे सुखद और सबसे दुरूह यादों के साथ कारागार की कोठरियों में रहने के अलावा और कोई जगह ही नहीं है।

अब 30 सितम्बर को ‘आॅर्गनाइजेशन आॅफ अमेरिकन्स स्टेट्स‘ ने लातिनी अमेरिकी देशों से अपील की, कि ‘‘वे ग्वातेनामो कारागार के आरोप मुक्त किये गये कैदियों को अपने देश में रहने की स्वीकृति दें।‘‘ उन्होंने यह भी कहा, कि ‘‘आॅर्गनाइजेशन आॅफ अमेरिकन्स स्टेट्स ने राष्ट्रपति बराक ओबामा से अमेरिका के इस सैनिक करागार को जल्द से जल्द बंद करने की मांग की थी।‘‘ आॅर्गनाइजेशन के सेक्रेटरी जनरल जोसे मिगाॅल इन्सुल्जा ने 29 सितम्बर को, संगठन के सदस्य देशों से अपील की, कि ‘‘यह अवसर मानवता के गंभीर सवाल के सामने खड़े होने का है, उससे मुखातिब होने का है।‘‘ उन्होंने कहा- ‘‘ये वे लोग हैं, जिन्हें किसी भी अपराध के लिये न तो सजा दी गयी है, ना ही सजा दी जानी है। ये आरोप मुक्त लोग हैं।‘‘ और उन्होंने ऐसे आरोप मुक्त कैदियों को अपने देश में जगह देने की अपील की, ताकि वो एक सामान्य जीवन जीने के लायक हो सकें।

अमेरिकी सरकार ने भी इस क्षेत्र के देशों से कहा है, कि ‘‘वे इन आरोप मुक्त कैदियों को अपने देश में जगह देने के बारे में विचार करें।‘‘

अमेरिकी सरकार और आॅर्गनाइजेशन आॅफ अमेरिकन्स स्टेट्स के अपीलों के बारे में यदि हम विचार करें तो यह बात बिल्कुल साफ हो जायेगी, कि-

  • इन कैदियों ने बिना किसी अपराध के एक दशक से भी लम्बी सजा काटी है। जिसके लिये सिर्फ और सिर्फ अमेरिकी सरकार जिम्मेदार है।
  • इन कैदियों को यदि वास्तव में आरोप मुक्त किया गया है, और यह अमेरिकी साजिश नहीं है, तो यह अमेरिकी सरकार की जिम्मेदारी है, कि इराक, अफगानिस्तान, पाकिस्तान या जिस देश से उन्हें हिरासत में लिया गया था, उन्हें उस देश में वापस भेजे। यह आरोप मुक्त हुए कैदियों का वैधानिक एवं मानवाधिकार है।
  • इन कैदियों के विरूद्ध इनके वैधानिक अधिकार एवं मानवाधिकार के लगातार उल्लंघन के मामले में अमेरिकी सरकार को दोषी करार दिया जाये, और इन कैदियों के जीवन को सुरक्षित करने, उन्हें व्यवस्थित करने की जिम्मेदारी अमेरिकी सरकार की है।

जिससे अमेरिकी सरकार बड़ी बेशर्मी से भाग रही है।

1barackpresidentbushअमेरिकी सरकार अपने कारनामों पर कभी शर्मिंदा नहीं होती। शर्मिंदा होने से, उसने अपना पीछा छुड़ा लिया है। उसके लिये स्वतंत्रता, लोकतंत्र और मानवाधिकार और अब, आतंकवाद का विरोध, सैनिक हस्तक्षेप की पृष्टभूमि और मुद्दे हैं। न वह इराक की तबाही के लिये अपने को जिम्मेदार मानती है, ना अफगानिस्तान के लिये वह शर्मिंदा है। उसके लिये न तो लीबिया को मलबों में बदलना गलत है, ना ही फिलिस्तीनियों का कत्लेआम नाजायज है। ना तो सीरिया को गृहयुद्ध की आग में झोंकना गलत है, ना ही उस पर हवाई हमले की कार्यवाही गलत लगती है। उसके लिये चिली में अलेंदे का तख्तापलट, सद्दाम हुसैन और कर्नल गद्दाफी की हत्या भी गलत नहीं है।

लोकतंत्र के नाम पर सैनिक एव वित्तीय पूंजी की तानाशाही, स्वतंत्रता और मानवाधिकार के नाम पर किसी भी देश को गुलाम बनाने की आजादी और किसी को हिरासत में लेकर उसे अमेरिकी सरकार के लिये खतरा बताने की स्वतंत्रता है। उसके लिये स्वतंत्रता अबु गरेब और ग्वातेनामो का जेल है।

ग्वातेनामो की स्थापना 9/11 की घटना के बाद युद्ध अपराध के दोषी लोगों को कैद में रखने के लिये, तात्कालीन राष्ट्रपति जाॅर्ज बुश ने की थी। जिसे अपने पहले कार्यकाल के दौरान बराक ओबाम ने, इस विवादास्पद सैनिक जेल को बंद करने के आदेश पर हंस्ताक्षर किये। लेकिन वह आज भी खुला है। जहां इन कैदियों को अमानवीय यातनायें दी गयीं। कैदी को बांध कर उसके चेहरे को भीगे कपड़े से ढंक कर, उस पर पानी की धार छोड़ी जाती थी, उनका दम घुटने लगता था। वह पानी में डूबते आदमी की तरह मृत्यु की भीषण यातना सहता, उन्हीं परिस्थितियों से गुजरता। गये साल भूख हड़ताली कैदियों को जबरन खाना और पानी देने की जबर्दस्त यातनायें दी जाती थीं। जीने की परिस्थितियां नहीं होती थीं और उन्हें मरने नहीं दिया जाता था।

मानवाधिकारवादियों के द्वारा ग्वातेमाना को बंद करने की मांग की जाती रही है। जहां बिना किसी न्यायिक कार्यवाही के लोगों को शक के बुनियाद पर कैद करके रखा जाता रहा है। यह दौर शायद थमने को है, किंतु इन आरोप मुक्त कैदियों की यातना और मानवीय पीड़ा का अंत नहीं है।

अमेरिकी सरकार और ‘आॅर्गनाइजेशन आॅफ अमेरिकन्स स्टेट्स‘ के अपीलों को लातिनी अमेरिकी देशों में अब तक कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं आयी है। उरूग्वे ने कुछ कैदियों को अपने देश में जगह देने की स्वीकृति दी है। चिली की सरकार इस बारे में विचार कर रही है। अमेरिकी सरकार पर यकीन करना, उसके सहयोगी एवं समर्थक देशों के लिये भी आसान नहीं है।

अमेरिकी हितों के लिये किसी देश को तबाह करना और किसी को मौत के घाट उतार देना अमेरिकी नीति है।

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