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चुनावी जनसमर्थन की तनी हुई रस्सी पर सरकारें

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भारतीय राजनीति की सूरत, भारतीय लोकतंत्र की तरह ही बदल गयी है। इसे

  • देश की आम जनता ने बदला है?
  • राजनीतिक दलों ने बदला है?
  • या उन वित्तीय ताकतों ने बदला है, जिनके कब्जे में दुनिया की ज्यादातर चुनी हुई सरकारें हैं?

यह मुद्दा है।

हम इन मुद्दों का जिक्र, शायद अलग-अलग टुकड़ों और सवालें के सांचे में ढ़ाल कर न कर सकें, क्योंकि हमें इस बात को स्वीकार करके चलना चाहिये, कि मुद्दे आपस में जुड़े और उलझे हुए हैं। हम चाह कर भी उन्हें पूरी तरह अलग नहीं कर सकते।

ऐसा करने की, कोई खास जरूरत भी नहीं है।

देश की आम जनता जनतंत्र के बहुरंगी पोशाक में है। वर्ग विभाजित समाज व्यवस्था में विपरीत परिस्थितियों के बीच बनती-बिगड़ती संभावनाओं को देखने और उसे ना समझने की स्थितियों से घिरी है। यह भी एक सच है, कि बहुसंख्यक वर्ग उस ओर देख ही नहीं रहा है। गैर-अनुपातिक आर्थिक एवं सामाजिक और क्षेत्रीय विकास ने उसकी वर्गगत सामाजिक एवं राजनीतिक चेतना को कुछ ऐसे कपड़े पहना दिये हैं, कि वह अपने ही खिलाफ हो रहे षड़यंत्रों का शिकार हो जाता है।

राजनीतिक दलों ने इस देश के बहुसंख्यक वर्ग को बड़ी बारीकी से धोखा दिया है। ऐसी सरकारों का निर्माण किया है, जिसकी पीठ आम लोगों की ओर होती है, और जब वह आम जनता के ओर मुंह करके खड़ा होती है, उसके हाथ उन ताकतों से जुड़े होते हैं, जिन्होंने अभी-अभी इस देश में एक ऐसी सरकार का गठन किया है, जिसकी सूरत नरेंद्र मोदी है, जो देश की प्राकृतिक सम्पदा, श्रमशक्ति के स्त्रोत और बौद्धिक सम्पदा से लेकर उत्पादन के साधन और बाजार पर ‘आर्थिक विकास‘ के नाम पर निजी कम्पनियों -काॅरपोरेशनों की दावेदारी का पक्का दस्तावेज बनाने में लगे हैं। कह सकते हैं, कि उनकी सोच और समझ की रूह पर नवउदारवाद का कब्जा है। जिन्होंने सरकार की औकात को कर्ज खोर बना दिया है। ऐसा फटीचर और ऐसा भिखमंगा बना दिया है, जो मातम मनाते देशों की सरकार से भी भीख मांगने से नहीं चूक रही है। जिसकी सोच राजनीतिक एकाधिकार और वित्तीय तानाशाही का लिबास पहन रही है।

राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय वित्तीय ताकतें सरकार बनाने और उसे नियंत्रण में रखने का सफल खेल खेल रही हैं। इस भरम को बनाये रखने में लगी हैं, कि ‘‘देश की आम जनता ही, अपनी सरकार बनाती है।‘‘ वह ऐसे विकल्पों को बना रही है, कि देश की आम जनता राजनीतिक रूप से विकल्पहीन हो जाये और नयी सरकार बनाने के चुनावी दंगल में कभी एक को, तो कभी दूसरे को चुनती रहे। केंद्र में काॅरपोरेट की स्थायी सरकार हो, और राज्यों में ऐसी सरकार हो जिसकी कद-काठी वह जब चाहे नाप ले, और जब चाहे दबी हुई कांख की बंधी हुई मुट्ठियां हवा में उछाल दे। आम जनता अपनी सरकार बनाने के भरम में पड़ी रहे।

सरकार भी बनी रहे,

विरोध का भरम भी बना रहे

और बाजारवादी अर्थव्यवस्था के लिये, महावत के हाथों में अंकुश भी हो।

यह तो मानी हुई बात है, कि काॅरपोरेट सरकारों को नियंत्रण में रखने के लिये, अंकुश आम जनता के हाथों में नहीं,, वित्तीय ताकतों के हाथों में है। आम जनता मौजूदा व्यवस्था को बनाये रखने वाले कालाधन, भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन और जन लोकपाल विधेयक की मांग के साथ एक ऐसी भीड़ है, जिसमें गुस्सा तो है, मगर उसके पास विकल्प नहीं। विकल्प के रूप में अपनी सरकार बनाने का चुनावी भरम है।

आईये, देख लें, कि दिल्ली में क्या हो रहा है?

14 फरवरी 2015 को दिल्ली विधानसभा में आम आदमी पार्टी के केजरीवाल की सरकार बन जायेगी।

70 विधानसभा सीटों में आम आदमी पार्टी को 67 सीटा मिली। भाजपा मात्र 3 सीट जीत सकी और कांग्रेस का खात ही नहीं खुला। मतों का प्रतिशत भी कुछ ऐसा ही रहा। परिणाम एकतरफा है, इस हिदायत के साथ कि जन समस्याओं का समाधान करने के लिये सरकार बहानेबाजी बंद करे।

सामान्य रूप से निष्कर्ष है, कि -नरेंद्र मोदी के जीत की हवा अब निकलने लगी है। -इस परिणाम का प्रभाव शेष राज्यों के विधानसभा चुनावों पर पड़ेगा और इसका प्रभाव राष्ट्रीय स्तर पर पड़ना तय है।

मगर, मूल मुद्दा यह है, कि राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय ताकतों ने, जिन्होंने लोकसभा चुनाव और उसके परिणामों को अपने नियंत्रण में रखा, क्यों उन्होंने दिल्ली विधानसभा चुनाव और उसके परिणामों को अपने नियंत्रण में रखना जरूरी नहीं समझा? या यह सब उनके नियंत्रण में है?

यह तो सोचा ही नहीं जा सकता कि मुनाफा और मौके की जगह को वो खाली छोड़ेंगे।

ऐसा भी नहीं है, कि भारतीय लोकतंत्र और देश की सरकार पर उनका नियंत्रण घटा है।

यह भी नहीं हुआ कि केंद्र की मोदी सरकार ने उनके हितों के प्रति लापरवाही की हो। सच यह है, कि यूपीए की मनमोहन सरकार के उदारीकरण की नीतियों में जो हिचकिचाहट थी, उसे भाजपा की मोदी सरकार ने बेहिचक बना दिया है। उन्होंने काॅरपोरेट जगत के हितों के लिये निजीकरण को राष्ट्रीय नीति बना दिया है। मीडिया उनके साथ है और इस मामले में वो बेदाग हैं। नरेंद्र मोदी से कोई चूक नहीं हुई है। वो पक्के वफादार है।

इसके बाद भी राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय ताकतों ने दिल्ली में केजरीवाल सरकार को बनने दिया। मतलब बिल्कुल साफ है, कि-

  • केजरीवाल से इन वित्तीय ताकतों को कोई खतरा नहीं है
  • विकल्पों का राजनीतिक द्वार उनके नियंत्रण में खुला हुआ है।

दिल्ली विधानसभा में केजरीवाल की सरकार, इन ताकतों के लिये चुनावी भरम को बनाये रखने का ‘सेफ्टी वाॅल्व‘ है और केंद्र की मोदी सरकार के लिये अंकुश है।

केंद्र के मोदी सरकार की राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय नीतियां दो राहे पर हैं। और यह दोराहा पिछली सरकारों से लेकर अब तक के मोदी सरकार की नीतियों का परिणाम है। राष्ट्रीय स्तर पर वित्तीय ताकतों को कोई खतरा नहीं है, मगर वैश्विक स्तर पर स्थितियां इतनी निरापद नहीं हैं। उनकी नजरों में मोदी को नकेल की जरूरत है।

दुनिया की बाजारवादी ताकतें दो खेमों में विभाजित हैं।

अमेरिकी साम्राज्य यूरोपीय संघ और अपने मित्र देशों के साथ दुनिया पर अपने वर्चस्व को एकाधिकार की लड़ाई में बदल चुका है। वहीं दूसरी ओर रूस और चीन लातिनी अमेरिकी देशों के साथ मिल कर मुक्त बाजार के नये क्षेत्रों की रचना कर रहे हैं। जिसमें भारत की अपनी हिस्सेदारी है। वह ब्रिक्स देशों के संगठन का सदस्य देश है, और ‘शंघाई सहयोग संगठन‘ की सदस्यता भी उसे मिल गयी है। साथ ही वह ‘एशियन इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक‘ का चीन के बाद सबसे महत्वपूर्ण साझेदार है। जिसे एशिया के अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष का विकल्प माना जा रहा है। रूस से उसके परम्परागत एवं आर्थिक, राजनीतिक एवं सामरिक समझौते हैं। वह भारत के लिये सबसे बड़ा हथियार निर्यातक देश है।

इन महत्वपूर्ण क्षेत्रीय एवं वैश्विक संगठन में रूस और चीन की निर्णायक स्थिति है। और भारत भी महत्वपूर्ण देश है। उसका महत्व इसलिये और बढ़ जाता है, कि चीन के विरूद्ध आर्थिक एवं सामरिक घेराबंदी में अमेरिकी सरकार भारत की भूमिका तय कर चुकी है। और यह भी एक सच्चाई है, कि भारत की मौजूदा सरकार देश में अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की भूमिका बढ़ाना चाहती है, लेकिन उसकी स्थिति ऐसी नहीं है, कि रूस और चीन से तथा उन वैश्विक महत्व पा चुके संगठनों से, अपनी साझेदारी समाप्त कर सके।

26 जनवरी -गणतंत्र दिवस- में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को मुख्य अतिथि बना कर जो तमाशा नरेंद्र मोदी ने किया, और रूस तथा चीन की जितनी संतुलित प्रतिक्रिया आयी, लेकिन स्वाभाविक रूव से चीन विरोधी भारतीय एवं पश्चिमी मीडिया ने ‘चीन हिल गया, दहल गया और जल गया‘ जैसी बकवासें की, उसे भरने के लिये भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने चीन की कूटनीतिक यात्रा की।

हमने पहले भी लिखा है, कि रूस, चीन और भारत की आपसी साझेदारी न सिर्फ भारत बल्कि एशिया की शांति एवं स्थिरता के लिये जरूरी है, और भारत को बदलते वैश्विक परिदृश्य में चीन के साथ अपने सम्बंधों की पुर्नव्याख्या करनी ही होगी। जोकि पतनशील अमेरिकी साम्राज्य और उसकी बिखरती वैश्विक संरचना के लिये रूस और चीन बड़ी चुनौती हैं, और आज की तारीख में मौजूदा विश्व की शांति एवं स्थिरता के लिये रूस और चीन सुरक्षा की गारण्टी हैं। जबकि अमेरिका और आतंकवाद के साथ अमेरिकी युद्ध का आतंक सबसे बड़ा खतरा है। तीसरी दुनिया की एकजुटता ही इस खतरे के खिलाफ खड़े होने की अनिवार्यता है।

मोदी सरकार ने भारत को नया चरागाह बनाने का वैश्विक वित्तीय ताकतों को जो संदेश दे दिया है, उसमें उनकी वरियता भले ही अमेरिकी मुक्त व्यापारवादियों को हो, लेकिन निवेश की वित्तीय क्षमता चीन की है। भारत इन देशों के बीच अपनी-अपनी जरूरतों का चरागाह बन गया है, जिसके पास अकूत प्राकृतिक सम्पदा, सस्ते श्रम शक्ति का विशाल स्त्रोत और सवा सौ करोड़ लोगों का बाजार है। एक ऐसी राजनीतिक प्रणाली है, जिसे अपने तरीके से तोड़ा-मरोड़ा जा सकता है। और उन वित्तीय ताकतों के लिये सबसे बड़ा खतरा यही है, कि भारत में मुक्त व्यापार के नये क्षेत्रों की रचना करने वालों को वरियता न मिल जाये, जैसा कि अफ्रीका और लातिनी अमेरिकी देशों में हो चुका है। डाॅलर को चीनी युआन वैश्विक मुद्रा के दर्जे से हटाने के अभियान में है। और इस अभियान में भी भारत महत्वपूर्ण है। ब्रिक्स बैंक के निर्माण की सहमति ‘ब्रिक्स देशों के दिल्ली सम्मेलन में ही बनी थी, जिसे ब्रजील सम्मेलन में निर्माण की प्रक्रिया से जोड़ा गया। यही नहीं द्विपक्षीय सम्बंधों में आपसी मुद्रा में व्यापार को बढ़ावा देने वाले ब्रिक्स देशों के करार का हिस्सा है। ब्रिक्स बैंक से लातिनी अमेरिकी देशों के संगठनों के बैंको से संयुक्त नीतियां बन गयी हैं। अमेरिकी डाॅलर वास्तव में खतरे में है। विश्व मुद्रा बाजार में चीनी मुद्रा की विश्वसनियता बढ़ती जा रही है। स्थितियां सामान्य नहीं हैं।

जिन ताकतों ने मोदी की सरकार को केंद्र में स्थापित कर भारत की राजसत्ता का वैधानिक अपहरण कर लिया है, उन ताकतों के सामने उस पर आर्थिक एवं राजनीतिक वर्चस्व बनाये रखने की अनिवार्यता है।

इस नजरिये से देखें तो नरेंद्र मोदी सरकार पर अंकुश लगाये रखने के लिये आम आदमी पार्टी की दिल्ली में केजरीवाल सरकार विकल्पों का ऐसा अंकुश है, जिसे पूर्ण राज्य का दर्जा भी हासिल नहीं है, और जिसकी निर्भरता केंद्र की सरकार पर बनी रहेगी, जहां मोदी की काॅरपोरेट सरकार है। दिल्ली विधानसभा में आम आदमी पार्टी का संतुलन उस वित्तीय ताकतों के हित है, जो आर्थिक हितों के लिये राजसत्ता का उपयोग कर रहे हैं। वैसे भी यह खुली किताब है, कि आम आदमी पार्टी अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के खिलाफ नहीं है। अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान और लोकपाल विधेयक आंदोलन देश की आम जनता के गुस्से को पतली गली से बाहर निकालने के लिये प्रायोजित आंदोलन था। जिससे अरविंद केजरीवाल ही नहीं भाजपा की किरण बेदी भी राजनीति में आयीं। भाजपा नेतृत्व -नरेंद्र मोदी, अमित शाह और राजनाथ सिंह- किरण बेदी को मुख्यमंत्री के रूप में पेश कर अपनी चालें चल लेने की नीतियां बनायी। जो निशाने से काफी दूर लगा। चुनाव प्रचार नरेंद्र मोदी के नाम से किया गया। नरेंद्र मोदी ही भाजपा के ट्रम्प कार्ड थे। इसलिये, दिल्ली की पराजय सही अर्थों में नरेंद्र मोदी की पराजय है। यह नरेंद्र मोदी को उन ताकतों का जवाब है, कि निजीकरण की रहा छोड़ने और मुक्त व्यापार के नये क्षेत्र को वरियता देनेे का परिणाम क्या हो सकता है?

कह सकते हैं हम, कि दिल्ली की पराजय नरेंद्र मोदी के सिर पर टंगी तलवार है।

आप कह सकते हैं, कि ‘‘जनाब, यह सब आपका खयाल है।‘‘

मुझे कोई आपत्ति नहीं, क्योंकि खयाल दुरूस्त है। उन वित्तीय ताकतों के बारे में यदि आप भी जान लें, जो लगभग 300 सालों से अपनी वित्तीय ताकतों का विकास करते हुए उस मुकाम पर आ कर खड़ी हो गयी हैं, जिनके 1 प्रतिशत लोगों के कब्जे में विश्व की लगभग आधी सम्पत्ति है, और 2 प्रतिशत लोगों के कब्जे में विश्व की लगभग 87 प्रतिशत सम्पत्ति है, और उन्होंने इसे कैसे हासिल किया है? तो आपके खयाल भी दुरूस्त हो जायेंगे। आज दुनिया के ज्यादातर देशों की सरकारों का बनना और उजड़ना उनकी मर्जी पर है। जो उनसे सहमत हैं वो सरकारें जनविरोधी हैं, और जो जनसमर्थक सरकारें हैं वो उनके निशाने पर हैं। भारत में काॅरपोरेट की सरकार नयी है, इसलिये उनकी निगरानी में है। मोदी जी उनकी निगरानी में हैं।

नरेंद्र मोदी के सामने दिल्ली की पराजय नहीं, अंकुश है। दिल्ली में देश की आम जनता की सरकार बनाने के भरम को बचा लिया गया, ताकि केंद्र की मोदी सरकार काॅरपोरेट जगत के दबाव में सुरक्षित रहे, और वह विकल्प भी आम जनता के सामने बनी रहे, जिसे आजमाने की छूट उसे होगी। और यह छूट बेमानी है।

केजरीवाल की जीत से खुश होने वालों की कमी नहीं। हमें भी अच्छा ही लग रहा है। भाजपा, संघ और मोदी विरोधी राजनीतिक दल खुश हैं, और वो ताकतें भी खुश हैं, जो केजरीवाल में अच्छे कल की संभावनायें देख रहे हैं। दिल्ली के लोगों की उम्मीदें भी कम नहीं हैं। वो मान रहे हैं, कि बिजली उनके लिये सत्ता होगा। 700 लीटर पानी घरों को निःशुल्क मिलेगा। ठेके पर काम करने वालों को नियमित होने की सुविधायें मिलेंगी। झुग्गी-झोपड़ी वालों को पक्के मकान मिलेंगे। अवैध काॅलोनियों में वैध सुविधायें होंगी। कानून व्यवस्था के साथ महिलाआंे की सुरक्षा का पुख्ता इन्तजाम होगा, और केजरीवाल दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलायेंगे। जिसके लिये दिल्ली के सरकार की निर्भरता -ज्यादातर मामलों में- केंद्र की सरकार पर होगी। जो संसद में बहुमत के बाद भी अध्यादेशों से काम चला रही है। फिर भी लोगों को केजरीवाल से उम्मीदें हैं।

इस बात की पहल भी लोगों के लिये राहत होगी। दिल्ली को और क्या मिलेगा? यह आने वाला कल बतायेगा। लेकिन मूल-भूत परिवर्तन की संभावनायें नहीं बनेंगी, यह तय है, क्योंकि सरकार का उपयोग वो ही वित्तीय ताकतें करेंगी, जिन्होंने केंद्र में मोदी की सरकार बनाने का काम किया है।

भारत में वैधानिक पद्धति से सरकार के अपहरण का खेल खुलेआम होगा? यह देखना है। मगर होगा, यह तय है।

केजरीवाल ने ठीक कहा है, कि ‘‘इतनी बड़ी जीत से मुझे डर लग रहा है।‘‘ सरकारों को आम जनता के समर्थन से अब डरने की जरूरत है। यह डर वाजिब है। मोदी जी इस डर को भूलने की गल्ती कर चुके हैं। वित्तीय ताकतों के हाथों में देश की सरकार है, जिस पर पांच साल में कुछ ऐसा करने की जिम्मेदारी है, जिसे पूरा करने के लिये उसे हांफना और दौड़ना ही पड़ेगा। देश की सरकार अपना कद घटाने और आम जनता से अपने देश की सरकार बनाने के हक को छीनने के अभियान का हिस्सा है। चुनावी जन समर्थन की तनी हुई रस्सी पर जहां मोदी जी खड़े हैं, वहीं केजरीवाल साहब भी खड़े हैं। और दोनों ही करतबबाज हैं।

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One comment

  1. Rajeev Ranjan Prasad

    भारत में चुनाव लगातार होते हैं। हार-जीत की पैमाइश पर जोर-आजमाइश भी खूब होती है। लेकिन, परिणाम हमेशा हर स्थिति में स्वीकार्य-शिरोधार्य होते हैं। 2004 में राजग आउट हुई और कांग्रेस काबिज हुई, तो यह नहीं था कि कांग्रेस का चेहरा अचानक जनता की निगाह में झक सफेद हो गया था। यह चुनावी विकल्प जनतंत्र के हवाले से लोगों को मिला एक सशक्त हथियार है जो अहिंसक है, अचूक है और कारामाती भी। 2015 में केजरीवाल और मोदी दोनों बारी-बारी से जीते और दोनों का विश्व बैक, वित्तीय कारपोरेट अथवा फोर्ड फाउंडेशन सरीखे अन्यान्य बहुराष्ट्रीय कंपनियों से कोई गिला-शिकवा नहीं है। दोनों के पास खूबसूरत अल्फ़ाज हैं; जेबी मुहावरें हैं जिन्हें दोनों अपने हित-पक्ष में कारगर तरीके से इस्तेमाल कर ले जाने में दक्ष-प्रवीण हैं। आजकल जनपक्षधरता की वैचारिक-भूगोल दिशाहीन है। संगठन का घोर अभाव है। सामूहिक चिंतन और सोच-प्रणाली का टोटा है; और जो हैं वे ज़मीन से उखड़े हुए सुविधाभोगी और मौकापरस्त लोग हैं। उनके पास भुने हुए चने की तरह चनाचुर-गरम टाइप मसालेदार शब्द और भाषा हैं जिसमें आम आदमी पार्टी के योगेन्द्र यादव और आशुतोष जैसे माननीय-आदरणीय लोग आते हैं। इनकी शब्दावली भीड़ को जनता कहती है और टोपी को अरविन्द केजरीवाल। ऐसे में जिसके सर टोपी है; वही है आम आदमी पाटी। चाहे मोदी हों या अरविन्द केजरीवाल; ऐसी राजनीति सफल नहीं होती है। हां इस अदला-बदली की राजनीति में अपना उदार और जनरूपी चेहरा बनाने-दिखाने का सुअवसर जरूर मिल जाता है। हर ताकतवर व्यक्ति को अपने से अधिक ताकतवर व्यक्ति से दुश्मनी नहीं ठाननी चाहिए। यह सीख अरविंद सीख चुके हैं। केन्द्र सरकार के मंत्रियों के साथ ‘फोटो सेशन’ में अरविन्द जितने प्रफुल्लित नज़र आ रहे हैं यह इसी सांठ-गांठ का परिणाम है। अब इन दोनों के लिए जनता मोहरे है।(काश! मैं पूरी तरह ग़लत साबित होउं।)

    मोदी के जलवे से देश में ‘घर-धर मोदी’ हुआ है। अब दिल्ली में सचाई का दीपक उजाला करेगा। ये दोनों ‘स्मार्ट फैसले’ लेंगे; नीति-निर्णयों में हामी भरेंगे और आपसी मिलीभगत से एक दिल्ली में विकास का डुगडुगी बजाएंगे, तो दूसरा दिल्ली के बाहर के क्षेत्रों में बाज़ार को आमंत्रित कर नए भारत की परिकल्पना साकार करेंगे। स्मार्ट शहर बनाएंगे। विदेशी शिक्षण संस्थान खोलेंगे। सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों और प्राधिकरणों की निलामी कर देश की आय बढ़ने और सेंसेक्स में उछाल आने की बात करेंगे। महंगाई ईंट-पत्थर और कंक्रीट से जुड़े अट्टालिकाओं को देख हरसेंगी और लोग उनमें रहने की चाहत लिए बेमौत मर रहे होंगे। देश की बहुसंख्यक आबादी के पास अपना जीवन जारी रखनें के लिए जरूरी रोजगार और आर्थिक संसाधन नहीं होंगे और मध्यवर्ग शाॅपिंग-माॅलों, सिनेमाघरों, डिस्कोथिक, कैबरे और रेस्तरां में ऐश-मौज कर रही होगी। वहीं आभिजात्य वर्ग उस कोटि में गिने जाएंगे जिसमें 2 प्रतिशत लोगों का धन कभी ‘फोब्र्स’, तो कभी ‘न्यूजवीक’ और ‘टाइम’ मैग्जीन में जगह पाता है। समाचार-पत्रों में घटनाएं होंगी; लेकिन उन घटनाओं को पढ़ने वाले चेहरे तो होंगे; लेकिन उनकी अपनी आपाधापी और जीवन की निरंतरता ने उन्हें बेसुध-बेजान कर दिया होगा।

    कुछ दिलचस्प कविताएं-कहानियां होंगी जिसके चमकीले शब्द अर्थच्यूत होंगे; लेकिन जिनका छपना लगातार जारी रहेगा। एक बड़ी आबादी प्रतिरोध की दृष्टि के लिए याचक बन याचना करेगी और छद्म विचारधारा का आवरण ओढ़े बुद्धिजीवी उनके बंदूक की नाल साफ करने, उठाने और चलाने की आदत को सही ठहरायेंगे; लेकिन उन्हें इस दलदल से निकालेंगे हरगिज नहीं। अहिंसा का रचयिता और सत्य का प्रतिपालक अपनी ही देश में सत्य की अग्निपरीक्षा में पराजित होगा; लेकिन उसके साथ देने वाले मित्र-बिरादर किसी रूप में उसके ग़लत होने की आलोचना भी साफ शब्दों में साहसिक ढंग से कर पाने में असमर्थ होंगे। आज की तरह कल भी हम बिफरेंगे; राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय हाल-हालात पर; सरकारों के अपहरण के मामलों पर; अपनी बुज़दिली और तवायफपन पर। इसी तरह साल-दर-साल बीतेंगे। चुनाव के मौसम आएंगे। बाज़ार सजेंगे; संचार-माध्यम विज्ञापन में कूकेंगे; और फिर एक-नम्बरी या दो नम्बरी में से किसी न किसी एक का चुनाव होगा।

    अगलेा विश्लेषण भी इसी तरह धारदार, पैने और प्रखर होंगे। और हम भी इसी तरह पाठक-दर्शक बन वक्त-बेवक्त जरूर शामिल होंगे।

    आप कहेंगे, दुनिया ऐसे ही चलती है। तो सच मानिए, उस घड़ी मैं भी पूरी निर्लज्जता से यह स्वीकार कर चुका होउंगा; क्योंकि तबतक मेरे पास भी कोई सरकारी नौकरी होगी; और उसकी विडम्बना गाने के ढेरों बचावी तौर-तरीके। आप कुछ नहीं कहेंगे; क्योंकि खतरा लेने के लिए चीजों को तोड़ना होता है। और जो स्वयं टूट-टूटकर जुटा हो; वह फिर से टुकड़ों में बदलने की भूल नहीं करेगा और सलाह भी नहीं देगा।

    खैर! हमें राजनीति की समझ नहीं है। काशी हिन्दू विश्वविद्याालय जैसे बंद अकादमिक समाज के बीच रह-सह कर मैंने अपने को जितना सोचने-समझने लायक बनाया है; यह उसकी फौरी प्रतिक्रिया है।

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