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हिंदू राष्ट्र का फार्मूला

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यदि हम कहें कि ‘संघ की अपनी सोच और अपनी समझ है, तो इसका मतलब यह नहीं होगा कि उसने एक नयी सोच और समझ की खोज की है, बल्कि यह होगा, कि वह अपने हिंसाब से अपनी सोच और समझ को परिभाषित कर लेता है। और उसके पास ऐसे सधे हुए लोग हैं, जो उस सोच और समझ को आंख मूंद कर स्वीकार कर लेते हैं।

जमा होते हैं,

ध्वजारोहण करते हैं,

नमन करते हैं,

ड्रम बजाते हैं,

लाठी-डण्डा भांजते हैं,

स्काउट के जमाने का हाफ पैंट पहनते हैं,

और काली टोपी लगाते हैं।

भारत माता की, जय कहना नहीं भूलते हैं।

और लगे हाथ उन तमाम मानवीय मूल्यों को धत्ता बता रहे हैं, जो उनके हिंदुत्व की बदलती हुई परिभाषा के आड़े आती है।

पहले वो अखण्ड भारत के रूप में आर्यव्रत को केंद्र में रख कर भारत माता को स्थापित करते थे, आज कल शायद वो हिंदुस्तान में भारत मााता को रख कर नमन करने लगे हैं, जहां 800 साल बाद 8 महीना पहले दिल्ली पर हिंदू शासक की नियुक्ति हुई है। जो देश को ब्राण्ड बना कर ब्राण्ड इण्डिया की मार्केटिंग कर रहा है। स्वदेशी को खारिज कर ‘मेक इन इण्डिया‘ के मशीनी बाघ को बड़े-बड़ों की चैखट पर पालतू चैपाया के रूप में दिखा रहा है।

यह सर्कस है, भाई

और करतब नरेंद्र मोदी के बाघ का है।

बाघ दहाड़ता है,

रिंग मास्टर चाबूक का भय दिखाता है।

संघ प्रमुख मोहन भागवत नाराज हैं। बाघ या रिंग मास्टर से नहीं, उससे जो सात संदर पार से सुरक्षा के मजबूत घेरे में आया, राजा जी का मेहमान बना, गणतंत्र की वर्दी में उन्हें सलामी लेते देखा और जाते-जाते धार्मिक सहिष्णुता की सीख दे गया।

क्या कहा?

क्या नहीं कहा?

बकवास है।

बराक ओबामा जी को लगा कि महात्मा गांधी की आत्मा दुखी है।

जो जिंदा लोगों की फिक्र नहीं कर पाते वो आत्मा के लिये अक्सर दुखी हो लेते हैं।

वो भी दुखी हो लिये।

उनके दुख से मोदी जी दुखी हुए या नहीं? पता नहीं। भागवत जी आहत हो गये। उनके समर्थकों ने ओबामा को बुड़बक समझा और संघ की केंद्रीय कार्यकारिणी के वरिष्ठ सदस्य इंद्रेश जी ने कहा- ‘‘बराक ओबामा को भारत व महात्मा गांधी के बारे में कोई समझ नहीं हैं उनका बयान भारतीयता का अपमान है। यह टिप्पणी उनकी अज्ञानता और कम समझ को दर्शाती है।‘‘ वैसे ओबामा जी खुद को बुड़बक नहीं समझते यह तो पक्की बात है। यदि ऐसा होता तो वो मोदी जी के बराक नहीं होते।

हमेशा बढ़-चढ़ कर बोलने वाले मोदी जी की कूटनीतिक चुप्पी कायम है। उन्होंने ‘अपने बराक‘ के लिये अब तक कोई बकवास की, ना ही ऐसी जुमलेबाजी की, कि जी खुश हो जाये।

मेरठ में ‘स्वयं सेवक समागम‘ में सर संघ संचालक मोहन भागवत ने कहा- ‘‘संघ सभी धर्मावलम्बियों के लिये है।‘‘

सुनने में अच्छा लगा।

सवाल ने मिजाज खट्टा कर दिया- क्या संघ में शामिल होने के लिये धर्मावलम्बि होना जरूरी है?

फिर उन्होंने कहा- ‘‘विविधता में एकता ही देश की पहचान है।‘‘

सवाल ने मिजाज को और बिगाड़ दिया कि ‘‘फिर घर वापसी का हंगामा क्यों? जो जहां है, उसे वहीं बने रहने दें।

फिर सुनने को मिला- ‘‘विविधता में एकता ही असल हिंदुत्व है।‘‘

यह भी सुनने को मिला कि ‘‘हिंदुत्व को धन-बल और वैभव से सींचना होगा। अच्छा, पक्का और सच्चा हिंदू ही भारत को सिरमौर बनायेगा।‘‘ और यह भी कि ‘‘हिंदुस्तान एक हिंदू राष्ट्र है।‘‘

और ‘अच्छा, पक्का और सच्चा‘ होने की बाढ़ सी लग गयी। सवाल धक्का-मुक्की पर उतारू हो गये।

‘धन, बल, वैभव‘ उल्टे स्वास्तिक की तरह चकराने लगे। और ‘हिंदुत्व‘ से ‘हिंदुस्तान‘ सिंचने लगा।

मोदी जी की ‘राजनीतिक एकाधिकार‘ की तलब और ‘वित्तीय पूंजी की तानाशाही‘ को भावनात्मक आधार मिल गया।

भागवत जी कहते हैं- ‘‘लम्बे समय के बाद देश में संघ को अनुकूल माहौल मिला है।‘‘

और यह भी झाड देते हैं, कि ‘‘संघ राजनीति नहीं कहता।‘‘

समझना मुश्किल हो गया, कि भाजपा को लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के पीछे खड़ा करने का कमाल केसे हुआ?

क्यों संघ के सेवक भाजपा का प्रचार कर रहे थे?

क्यों उन्हें ऐसा लग रहा है, कि संघ के लिये, लम्बे समय के बाद, अनुकूल माहौल मिला है?

क्यों ‘हिंदू राष्ट्र‘ के लिये जोश और जुनून भरा जा रहा है।

हिंदू राष्ट्र की जरूरत किसे है? देश की आम जनता ने तो, यह मांग कभी की ही नहीं।

udrlजिस दिन मेरठ में संघ सेवकों का समागम संघ प्रमुख की उपस्थिति में हो रहा था। उसी दिन वाराणसी में विश्व हिंदू परिषर की स्वर्ण जयंती पर ‘हिंदू सम्मेलन‘ का आयोजन उसके अंतर्राष्ट्रीय संयोजक एवं अध्यक्ष अशोक सिंघल की उपस्थिति में हुआ।

यदि एक ने कहा- ‘‘भारत हिंदू राष्ट्र है।‘‘

तो दूसरे ने कहा- ‘‘भारत को हिंदू राष्ट्र बनाना है।‘‘

और दोनो में कोई फर्क नहीं है। भागवत भावनात्मक रूप से भारत को हिंदू राष्ट्र मानते हैं, और सिंघल उसे संवैधानिक दर्जा भी दिलाना चाहते हैं। एक की मूंछ घनि है, तो दूसरे के आंखों पर काला चश्मा है।

सिंघल जी ने संदेश दिया, कि ‘‘यदि हिंदुस्तान को हिंदू राष्ट्र बनाना है, तो वेद का ज्ञान जरूरी है।‘‘ और अब वो वेदों का ज्ञान बढ़ायेंगे। इस तर्क के साथ कि ‘‘जिस प्रकार गैर हिंदू धर्म के लोग कुरान और बाइबिल रखते हैं, उसी प्रकार हिंदुओं को भी घर में गीता, रामायण, वेद और पुराण जरूर रखना चाहिये और उसका ज्ञान लेना चाहिये।‘‘

ज्ञान से किसी को कोई परहेज नहीं है, लेकिन किसी धर्म का धर्मावलम्बी बनने के लिये ज्ञान अज्ञानता से बड़ा अभिशाप बन जाता है। उस धर्म को मानने वालों को भी कहना पड़ता है, कि ‘‘इस्लाम का सम्बंध इस्लामी आतंकवाद से नहीं है।‘‘ लेकिन योगी से सांसद बने आदित्य नाथ कहते हैं- ‘‘पाकिस्तान को विश्व घृणां की दृष्टि से देखता है। यूरोप, अमेरिका समेत सभी गैर-मुस्लिम देशों में लोग मुसलमानों को शक की नजर से देखते हैं। जेहाद के नाम पर सिर्फ नफरत फैलाई जा रही है।‘‘ इसी तर्क के तहत उन्होंने कहा- ‘‘हिंदू राष्ट्र की बात करना गलत नहीं है। हिंदू यदि घर वापसी चाहता है, तो उसका विरोध क्यों हो रहा है।‘‘ उन्होंने कहा- ‘‘सबसे अधिक अमेरिका में नस्ल भेद है। इसके शिकार खुद ओबामा भी हुए हैं।‘‘ लगे हाथ उन्होंने यह भी कहा, कि ‘‘भारत में तो सभी जाति व धर्म के लोग सद्भावना से एक साथ रहते हैं।‘‘

फिर इस संतुलन को बिगाड़ने की कोशिश क्यों हो रही है मठाधीश महोदय?

यदि सभी का घर भारत है, तो घर वापसी का अभियान क्यों है?

हमें तो नहीं लगता कि विश्व हिंदू परिषद ने राष्ट्र का निर्माण किया है, लेकिन प्रमुख उद्यमी आर.के. चैधरी कहते हैं, कि ‘‘राष्ट्र निर्माण में विश्व हिंदू परषिद निर्णायक भूमिका निभा रहा है। समाज को जोड़ने में उसकी पहल सराहनीय है।‘‘ उन्होंने अशोक सिंघल और आदित्य नाथ के लिये कहा- ‘‘उनकी गर्जना ने नई पीढ़ी को ऊर्जा और स्फूर्ति दी है। यही शक्ति भारत को शक्तिशाली व विकसित राष्ट्र बनाने का मार्ग प्रशस्त करेगी।‘‘

घपला है भाई!

हिंदू को जोड़ना समाज को जोड़ना नहीं है।

गर्जना शिकार और हमले की तैयारी होती है।

ऐसी ऊर्जा और स्फूर्ति से राष्ट्र कभी जुड़ता नहीं आतंक को नया रूप मिलता है।

पाकिस्तान को आतंकी देश जिसने बनाया, उसी अमेरिकी राष्ट्रपति का स्वागत आपके हिंदू राजा जी भारत के गणतंत्र दिवस पर मुख्य अतिथि बना कर करते हैं।

यदि अमेरिका में सबसे अधिक नस्लवाद है, तो ऐसे नस्लवादी देश के राष्ट्रप्रमुख के साथ बैठ कर आपके मोदी जी रिश्तों की गांठ क्यों बांध रहे हैं? क्यों सात फेरे ले रहे हैं?

यह तो बड़ी ना-इंसाफी है, कि जो गलत है, उसी से यारी गांठी जा रही है। उसी के होने से आप आश्वस्त होते हैं। उसी के नक्शेकदम पर चलते हैं और कहते हैं कि आपको हिंदू राष्ट्र चाहिये।

समझना मुश्किल है भागवत जी, कि गोरी दुनिया में हिंदू खाल विश्व को एक होने का संदेश कैसे देगी?

यह समझना और भी मुश्किल है, कि भारत को यदि इस्त्राइल बनने की सीख आपकी समझ है, तो अरब देश और फिलिस्तीनियों से इस्त्राइली घृणां और हमलों को आप कहां रखेंगे? उन इस्त्राइली सैनिकों को आप कहां रखेंगे जो गर्भवती फिलिस्तीनी महिलाओं की हत्या सिर्फ इसलिये करते हैं, कि एक गोली से दो जानें जायेंगी। कि फिलिस्तीनियों के नस्ल का सफाया हो सकेगा। भारत को यदि आप इस्त्राइल बनायेंगे, तो यह ‘सफाया अभियान‘ कहां चलायेंगे।

बड़ी गंदी सोच है भाई! हिंदुओं के लिये या किसी गैर हिंदू के लिये भय का माहौल न रचें। धर्म किसी देश का सही आधार नहीं, ना ही वह कारोबारी इकाई है, मगर संघ और भाजपा और अब, सरकार का यही मुख्य मुद्दा है।

लेकिन, हमारे लिये मुद्दे की बात यह है, कि देश को बाजार के पिंजड़े में न डालें। आदमी सर्कस का हिंसक जानवर नहीं। पिंजड़ा, सर्कस, चाबूक आौर बाजार हमें मंजूर नहीं।

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