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सरकार के अपहरण का मामला (अंतिम किश्त) | सरकारें आतंकी खेमे में

Syrian civilians search for survivors at the site of reported air strikes by regime forces in the rebel-held area of Douma, east of the capital Damascus, on February 9, 2015. More than 210,000 people have been killed in Syria since the beginning of the country's conflict in March 2011. AFP PHOTO / ABD DOUMANYABD DOUMANY/AFP/Getty Images

आतंकी हमले और युद्ध के आतंक का विस्तार हुआ है, जिसके मूल में नवउदारवादी वैश्वीकरण और मुक्त बाजारवादी अर्थव्यवस्था है।

जन समर्थक सरकारों के अपहरण के आतंकवादी संगठनों को, साम्राज्यवादी देशों के समर्थन से, अपनी सरकार बनाने की नयी समझ दी गयी है। जिसके लिये उन्हें आर्थिक सहायता, कूटनीतिक समर्थन और भारी मात्रा में प्रशिक्षण सहित घातक, हंथियारों की आपूर्ति अमेरिकी सरकार और पश्चिमी ताकतों सहित उनके समर्थक देशों से मिलता है। यह सहयोग और समर्थन और हंथियारों की आपूर्ति आतंकी संगठनों और साम्राज्यवादी देशों की आपसी रजामंदी है। और यह रजामंदी भले ही बनते, बनते बनी है, लेकिन आज तीसरी दुनिया के देशों की शांति एवं स्थिरता के लिये सबसे बड़ा खतरा बन चुकी है। जिसे वैश्विक वित्तीय ताकतें नियंत्रित कर रही हैं। जिनका हित तीसरी दुनिया के देशों की राजनीतिक अस्थिरता और आर्थिक हमलों से जुड़ गया है।

राजनीतिक अस्थिरता की वजह से आतंकवादियों के सहयोग से प्राकृतिक संसाधनों की लूट और खनिज सम्पदा का कारोबार भारी मुनाफे का जरिया बन जाता है, और यदि सरकारों का तख्तापलट हो गया, तो लीबिया की परिस्थितियां बन जाती हैं।

अफ्रीकी महाद्वीप में ‘अफ्रीकाॅम -अफ्रीकन कमाण्ड आॅफ यूएस मिलिट्री- का गठन ही महाद्वीप के प्राकृतिक संपदा के दोहन को सुनिश्चित करने के लिये किया गया है। 2008 में एक काॅन्फ्रेन्स के दौरान वाईस एडमिरल राॅबर्ट मूलर ने कहा था- ‘‘अफ्रीकाॅम का उद्देश्य अफ्रीका से विश्व बााजार तक वहां के प्राकृतिक सम्पदा के मुक्त प्रवाह को सुनिश्चित करना है।‘‘ अमेरिका के इस कार्यक्रम में पश्चिमी देश उसके निकटतम सहयोगी हैं। अफ्रीकाॅम उन आतंकी ताकतों का भी सहयोगी है, जो उनके इस वैध एवं अवैध प्राकृतिक संपदा के दोहन को सुनिश्चित करते हैं। यदि अमेरिकी सरकार और यूरोपीय देश वास्तव में विश्व बाजार में इन अवैध प्राकृतिक सम्पदा के पहुंचने के विरोधी होते, तो अवैध व्यापार के हाथ-पांव ही नहीं उगते। लेकिन, इस रास्ते से वो अपने मुनाफे के साथ, हथियारों को बेचने का अवैध व्यापार से भी, भारी मुनाफा कमाते हैं। लगे हाथ सम्बद्ध देशों की अर्थव्यवस्था को भारी नुक्सान पहुंचाते हैं। यह किसी आर्थिक हमले से कम नहीं होता।

इस तरह आतंकवाद वैश्विक वित्तीय ताकतों और यूरो-अमेरिकी साम्राज्यवादी देशों की अनिवार्यता बन गया है। जो उनके आर्थिक एवं राजनीतिक हितों की पूर्ति करता है। यह पूर्ति आतंकवाद के खिलाफ जारी सैन्य हस्तक्षेप से भी हो रही है। यही कारण है, कि आतंकवाद का विस्तार तीसरी दुनिया के देशों में तेजी से हुआ है।

हां, यह कहा जा सकता है, कि ‘‘आतंकवादी हमले अमेरिका और यूरोपीय देशों पर भी हुए हैं।‘‘

जिससे उन देशों में आर्थिक और राजनीतिक संकट कभी पैदा नहीं हुआ। हुआ यह कि तीसरी दुनिया के देशों में सैन्य हस्तक्षेप के लिये वैश्विक स्तर पर तर्क और अपने देश एवं महाद्वीप की आम जनता का समर्थन हासिल करना आसान हुआ।

जो जन समर्थन और राजनीतिक एकजुटता अमेरिकी सरकार ने 9/11 वल्र्ड ट्रेड सेंटर पर हुए आतंकी हमले के बाद हासिल की, पेरिस पर हुए जनवरी 2015 के शार्ली हाब्दो काण्ड के बाद यूरोपीय संघ ने आतंकवाद के खिलाफ महाद्वीपीय एकजुटता का प्रदर्शन किया। जो आर्थिक एवं राजनीतिक संकट से घिरे यूरोपीय संघ के लिये जरूरी था। जिसके लिये कभी अमेरिकी तो कभी यूरोपीय देशों के पत्रकारों का सिर कलम करने का नजारा बार-बार दिखाया गया। और इसी बहाने ‘इस्लामिक स्टेट आॅफ इराक एण्ड सीरिया‘ के खौफ को विस्तार दिया गया, जिसके निशाने पर सीरिया की बशर-अल-असद सरकार है। जिसे सत्ता से बे-दखल करने के लिये अमेरिकी सरकार और यूरोपीय देश और कई अरब देशों ने, पिछले चार सालों से गृहयुद्ध की स्थितियां पैदा कर रखी है। सीरियायी विद्रोहियों तथा आतंकियों को आर्थिक, कूटनीतिक सहयोग एवं हथियारों की आपूर्ति वो कर रहे हैं। इस्लामिक स्टेट के आतंकियों ने ही सीरिया पर हवाई हमले की परिस्थितियां पैदा की। जिसका उल्लेख हम पहले भी कर चुके हैं। हमने अल-नुसरा फ्रंट और इस्लामिक स्टेट का जिक्र भी किया है।

अमेरिकी सरकार और उसके सहयोगी देश अपने आर्थिक, राजनीतिक एवं सामरिक हितों को साधने के लिये आतंकवाद को बढ़ाने और आतंकवाद के खिलाफ सख्त कार्यवाही के नाम पर सैन्य हंस्तक्षेप का खेल खेल रहे हैं। उन्होंने तीसरी दुनिया के देशों और वहां के लोगों को मार कर ही नहीं, अपने हितों को साधने के लिये अपने देश के लोगों को मारने का खेल भी खेला है। अमेरिका के 9/11 से लेकर पेरिस पर हुए आतंकी हमले का सच इससे अलग नहीं है। वैश्विक वित्तीय ताकतें और उनके राजनीतिक मुखौटे का यूरो-अमेरिकी चेहरा अपने एकाधिकार के लिये किसी भी हद तक जा कर, अपने होने की लड़ाई को नया विस्तार दे रहे हैं।

यूरो-अमेरिकी साम्राज्य के युद्ध का आतंक और तीसरी दुनिया के देशों के आतंकवाद के बीच की कडियां आपस में जुड़ी हुई हैं।

क्षेत्रीय एवं इस्लामी आतंकवाद के संचालन के केंद्र में यूरो अमेरिकी युद्ध का आतंकवाद हैं

हमारे सामने तीन मुद्दे हैं-

  •  नव उदारवादी वैश्विकरण
  • आतंकवाद का वैश्विक विस्तार
  • आतंकवाद और युद्ध के आतंक के जरिये तीसरी दुनिया के देशों की जन समर्थक सरकारों का अपहरण। जो कि अपने देश की सरकार बनाने और अपने लिये समाज व्यवस्था को तय करने के, आम जनता के अधिकारों का अपहरण है।

यदि मुद्दे की बात करें तो, नवउदारवादी बाजारपरक अर्थव्यवस्था की सोच ने अपनी शुरूआत ही लातिनी अमेरिकी देश चिली में सल्वाडोर अलेंदे की समाजवादी सरकार का तख्तापलट करने से किया। 11 सितम्बर 1973 की यह वारदारत 11 सितम्बर 2001 की संयुक्त राज्य अमेरिका पर हुए ‘प्रायोजित आतंकी हमले‘ से कहीं बड़ी है। जिसने गैर-पूंजीवादी एवं समाजवादी बहुधु्रवी विश्व की अवधारणा को, पूंजीवादी खेमे में तीसरी दुनिया के देशों को लाने के अभियान की शुरूआत की। कह सकते हैं, कि 9/11 -चिली सरकार का अपहरण और वल्र्ड ट्रेड सेंटर पर आतंकी हमला- अमेरिकी सरकार का सबसे घिनौना षडयंत्र है। उसी का विस्तार आतंकी सरकार है। जिनके हितों को अमेरिकी हितों से जोड़ने के लिये स्थापित किया गया। अफगानिस्तान, इराक, लीबिया और अब सीरिया के साथ नाइजीरिया में हो रहे आतंकी हमले इस्लामी आतंकवाद और अमेरिकी युद्ध का संकट है।

अफगानिस्तान में अमेरिकी समर्थन से, तालिबान ने जब अपनी हुकूमत कायम की, वास्तव में उसे सोवियत संघ समर्थित समाजवादी सरकार का तख्तापलट करने का तोहफा मिला। अफगानिस्तान को नियंत्रित करने के लिये राष्ट्रसंघ की ओट ले कर, बहुराष्ट्रीय सेनाओं ने अमेरिकी नेतृत्व में प्रवेश किया। हजारों अफगान इस गृहयुद्ध में मारे गये और बहुराष्ट्रीय सेनाओं के सहयोगी के रूप में आतंकी संगठनों का विस्तार हुआ। ब्लैक वाॅटर जैसी निजी सेनाओं ने भी लोगों को मारने का काम किया। समाजवादियों और अपने देश में अपनी सरकार बनाने की मांग करने वालों का सफाया कर दिया गया। धार्मिक कट्टरता और आतंक को खुली छूट मिली। अल-कायदा का जन्म हुआ और अमेरिकी मीडिया के लिये ओसामा-बिन-लादेन नेशनल हीरो बना। जिसे एक दशक बाद अमेरिकी सेना ने बड़े ही नाटकीय ढंग से पाकिस्तान के एबटाबााद में मार गिराया। बराक ओबाम ने व्हाईट हाउस से उसका ‘लाइव‘ देखा। जबकि अल-कायदा और उससे जुड़े आतंकवादी संगठनों को अमेरिकी सहयोग और हथियार आज भी मिल रहे हैं, और वो एशिया और अफ्रीका में अमेरिकी हितों के लिये काम कर रहे हैं।

कहने को अमेरिकी सरकार आतंकवाद के खिलाफ युद्ध कर रही है। और दुनिया को अमेरिकी लोकतंत्र के कपड़े पहना रही है। अफगानिस्तान में ऐसा ही लोकतंत्र है।

इराक में भी बहुराष्ट्रीय सेना के हमले और सद्दाम हुसैन की जनसमर्थक सरकार का तख्ता पलटने के बाद अमेरिकी लोकतंत्र के कपड़े पहना दिये गये हैं। जिसमें 1 मिलियन से ज्यादा इराकियों की हत्या की गयी। अबूगरेब का कारनामा किया गया। और आज इस्लामिक स्टेट के आतंकवादियों ने इराक में ईरान से लेकर सीरिया की सीमा तक और सीरिया में तुर्की तथा गोलान हाईट की सीमा तक के बड़े भू-भाग पर अपना अधिकार जमा लिया है। जिसका मकसद इस्लामिक राज्य की स्थापना है। जिसका मतलब इराक का विभाजन और ईरान की सीमा पर अमेरिकी सेना का पहुंचना है। अभियान शुरू भी है, बराक ओबामा इस्लामिक स्टेट के आतंकवाद को खत्म करने की बात करते हैं। यदि इस्लामिक स्टेट का सफाया अमेरिकी और उसके मित्र देशों की सेना कर देती है, तो सीरिया और इराक के अधिकृत क्षेत्रों पर किसका अधिकार होगा? यह गंभीर सवाल है।

अमेरिकी सरकार इस बात की घोषणा कर चुकी है, कि ‘‘वह सीरिया की बशर-अल-असद सरकार का काम करने के लिये इस्लामिक स्टेट के आतंकवादियों पर हमले नहीं कर रही है।‘‘ मतलब तुर्की की सीमा से लेकर इस्त्राइल अधिकृत सीरिया के गोलान हाईट की सीमा तक का क्षेत्र सीरिया से अलग होगा। जिस पर अमेरिका समर्थित अल-कायदा से जुड़े आतंकी संगठन अल-नुसरा फ्रंट और इस्लामिक स्टेट के आतंकवादियों का कब्जा है। जिन्हें इस्त्राइल से न सिर्फ सहयोग मिल रहा है, बल्कि इस्त्राइल सीमा से सीरिया में आतंकी घुसपैठ भी हो रही है। अमेरिकी सरकार, सीरिया में अमेरिकी ठिकाना चाहती है, जहां से वह असद सरकार को सत्ता से बेदखल करने की कार्यवाही का संचालन कर सके, उसे आतंकी ठिकाना बना सके, और सीरिया की सेना यदि उस क्षेत्र पर अपना अधिकार कायम करने की लड़ाई लड़ती है, तो उसे अमेरिकी प्रतिरोध का सामना करना पड़ेगा। जिसका मतलब होगा- सीरिया या रूस सहित ईरान और सीरिया के मित्र देशों की सम्बद्धता और एक बड़ा युद्ध, युद्ध का आतंक। जिसमें विश्व युद्ध की आशंकायें भी होंगी।

urlयूरोपीय संघ और अमेरिकी सरकार जनसमर्थक सरकारों का तख्तापलट कर सैनिक सरकारों को तरजीह देते-देते अब आतंकवादियों की सरकार की पक्षधर हो गयी है। लीबिया में कर्नल गद्दाफी की सरकार का तख्तापलट कर, उनकी हत्या के बाद, टीएनसी की अंतरिम सरकार बना कर आतंकवाद को नयी जमीन, नयी दिशा दी गयी। आज इस्लामी आतंकी संगठन इसी जमीन पर खड़ा होने की लड़ाईयां लड़ रहे हैं। खुले तौर पर अमेरिकी सरकार और उसके मित्र देशों से इन आतंकी संगठनों की ठनी हुई है, और छुपे रूप में गहरी छन रही है। वो अमेरिकी हितों के लिये काम कर रहे हैं।

इराक और सीरिया में ‘इस्लामिक स्टेट आॅफ इराक एण्ड सीरिया‘ एक इस्लामी राज्य और सरकार बनाने की लड़ाई लड़ रही है।

और नाइजीरिया में बोको-हरम भी आगजनी, लूटमार और हत्यायें कर रही है, ताकि एक अलग इस्लामी राज्य का निर्माण कर सके।

जनवरी के पहले सप्ताह में बोको-हरम के आतंकियों ने बागा और नाइजीरिया के उत्तरी-पूर्वी प्रांत के बोरनो स्टेट के कई शहरों पर हमले किये। उन्होंने वहां के आम नागरिकों पर अंधाधुंध गोलीबारी की और वहां मौजूद सभी चीजों में आग लगा दिया। इस हमले में 2000 लोग मारे गये। जिस समय आगजनी और जनसंहार का खेल चल रहा था, उस दिन ही पेरिस में भी आतंकी हमला हुआ। जिसके लिये नाइजीरिया के राष्ट्रपति गुडलक जोनाथन ने अपनी संवेदनायें प्रकट की, लेकिन नाइजीरिया में हुए आगजनी और हत्याकाण्ड के बारे में उन्होंने कुछ नहीं कहा।

बोको-हरम ने बोरनों राज्य के 27 जिलों में से 20 जिलों पर कब्जा कर लिया है। उसके कब्जे में 20,000 स्क्वाॅयर मील का भू क्षेत्र है, जहां 1.5 मिलियन लोग रहे हैं। 30,000 से ज्यादा लोगों ने पलायन किया है। और यह तादाद लगातार बढ़ती जा रही है। उसने नाइजीरिया की सीमा से लगने वाले पड़ोसी देश- चाड, कैमरून और नाइजर की सीमा तक अपना विस्तार कर लिया है, और इन देशों की सीमा चैकी तक के क्षेत्रों पर अपना अधिकार जमा लिया है। जिसके खिलाफ, नाइजीरिया सरकार के पक्ष में कैमरून और चाड ने सैन्य कार्यवाही शुरू कर दी है। इन बोको-हरम के आतंकवादियों के पास उन्नत किस्म के अमेरिकी और पश्चिमी देशों के हथियार है। आरपीजी, बख्तरबंद सैनिक गाडि़या, एंटी टैंक राॅकेट और जमीन से हवा में मार करने वाले मिसाइल हैं।

2002 में बोको-हरम की स्थापना मोहम्मद यूसुफ ने की थी, जिसे 2009 में नाइजीरिया की सरकार ने मार गिराया। उसके बाद से अबू-बकर-शेकउ ने इसकी कमान संभाल ली है। उसने अपने क्षेत्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय सम्बंधों को बढ़ा लिया है। अमेरिका और नाटो देशों से उसके अच्छे सम्बंध हैं। उसके पास संसाधनों की भी कमी नहीं है।

वाॅयस आॅफ अमेरिका के अनुसार- 2010 में ‘अल-कायदा इन द इस्लामिक मगरीब‘ ने पहली बार बोको-हरम को सार्वजनिक रूप से आर्थिक सहयोग एवं हथियारों को देने की घोषणां की थी। 2011 के राष्ट्र संघ के रिपोर्ट में भी इस बात का उल्लेख है, कि बोको-हरम के लडा़कों को माली में प्रशिक्षण शिविरों में प्रशिक्षण दिया गया। लीबिया युद्ध के दौरान अल-कायदा इन द इस्लामिक मगरीब ने अमेरिकी एवं नाटो सेना के द्वारा कर्नल गद्दाफी के तख्तापलट में सक्रीय भूमिका निभाई। अमेरिकी एवं नाटो सैन्य अधिकारियों ने ‘इस्लामिक मगरीब‘ को प्रशिक्षण एवं हथियार देने की बात स्वीकार भी की है। बोको-हरम को सउदी अरब और ब्रिटेन के नागरिक संगठनों के जरिये भी आर्थिक सहायता मिल रही है। वह खनिज सम्पदा का अवैध व्यापार कर रहा है। नाइजर डेल्टा से बोको-हरम 1,00,000 बैरल तेल प्रति दिन निकालता है।

नाइजीरिया दुनिया का तेरहवां सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश है। इसके अलावा उसके पास हथियारों के उत्पादन में काम आने वाले कई महत्वपूर्ण खनिज सम्पदा है, जिससे जेट इंटन और मिसाइल सहित इलेक्ट्राॅनिक के सामानों का उत्पादन होता है। जिस पर फ्रांस और अमेरिका का वर्चस्व था। लेकिन अफ्रीकी देशों में चीन की प्रतिद्वन्दिता से फ्रांस और अमेरिका पीछे छूट गये हैं। नाइजीरिया में भी यही स्थिति है। वास्वत में बोको हरम, अल-कायदा इन द इस्लामिक मगरीब और अंसार अल-सरिया जैसे आतंकी संगठन ‘अफ्रीकाॅम‘ के हस्तक्षेप को सुनिश्चित करने और चीन की प्रतिद्वन्दिता पूर्ण उपस्थिति को नियंत्रित करने के लिये बहाने बनाने का काम कर रहे हैं।

‘गार्जियन‘ ने 2012 में लिखा था, कि ‘‘अमेरिका ने अक्टूबर 2008 में ‘अफ्रीकाॅम‘ का निर्माण अफ्रीका में अपने घटते प्रभाव को फिर से पाने और चीन के बढ़ते पूंजी निवेश को नियंत्रित करने के लिये किया था।‘‘ अफ्रीकाॅम अफ्रीका में अमेरिकी सैन्य गतिविधियों को ‘को-आॅरडिनेट‘ करता है। उसने पूरे महाद्वीप को सैन्य प्रतिस्पद्र्धा के चक्रव्यूह में फंसा कर आपसी संघर्षों को बढ़ा कर, युद्ध और हथियारों का माहौल बना दिया है। जिसका लक्ष्य राजनीतिक अस्थिरता को बढ़ा कर सैन्य हस्तक्षेप और उस क्षेत्र की प्राकृतिक सम्पदा का अबाध दोहन है। ऐसी परिस्थितियों को बना कर रखना है, कि महाद्वीप का विकास रूका रहे और आर्थिक विकास का लाभ आम अफ्रीकी तक पहुंचना असंभव की सीमा तक कठिन हो। वह आर्थिक पिछड़ापन और राजनीतिक असंतोष को बनाये रखना चाहता है। बोको हरम और अन्य आतंकी संगठनों को जिसका लाभ मिल रहा है। वह किसान और शहरी वर्ग के लोगों की भर्ती करता है, और समाज के सबसे गरीब तथा बहुसंख्यक वर्ग के लोगों की हत्यायें करता है। आम अफ्रीकी उसके निशाने पर है। जो यूरो-अमेरिकी हंस्तक्षेप और देश की सरकारों के खिलाफ है। जिसमें वर्गगत राजनीतिक चेतना बढ़ती जा रही है। जो चीन के आर्थिक सहयोग और आधारभूत ढांचे के निर्माण के साथ सामाजिक विकास योजनाओं को अफ्रीकी देशों में चलाने की पक्षधर है।

इस तरह सीरिया में जो काम ‘‘इस्लामिक स्टेट आॅफ इराक एण्ड सीरिया‘‘ कर रहा है, वही काम साम्राज्यवादियों के हित में बोको हरम, अल-कायदा इन द इस्लामिक मगरीब और अंसार अल सरिया अफ्रीका में कर रहे हैं। जिसका मकसद ‘इस्लामिक स्टेट‘ की स्थापना है। जिनके पास अमेरिका और यूरोपीय देशों का सहयोग और समर्थन है।

अपने देश की सरकार बनाने के आम जनता के अधिकारों और चुनी हुई तथा जन समर्थक सरकारों के अपहरण का मामला सैनिक तख्तापलट, वैधानिक पद्धति से राजसत्ता पर अधिकार के पड़ाव से होता हुआ, सरकार के अपहरण का मामला अब आतंकवादियों की सरकार के खेमे हैं। जिसके पीछे वैश्विक वित्तीय ताकतें, अमेरिकी सरकार और यूरोपीय देश है।

पिछले आलेखों के लिये अगस्त, 2014 से फरवरी, 2015 के अंकों को देखें।

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