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मुद्दों का अपहरण जारी है

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देश में मुद्दों का अपहरण जारी है

अन्ना हजारे ने मोदी सरकार के भूमि अधिग्रहण विधेयक के विरोध में 24 फरवरी को दिल्ली में एक रैली आयोजित करने की घोषणा की है। इस रैली में वो देश भर से आये ‘किसानों‘ को सम्बोधित करेंगे।

मुद्दा सही है।

विधेयक का विरोध होना चाहिये।

वामपंथी राजनीतिक दलों ने श्रम कनून में परिवर्तन के साथ भूमि अधिग्रहण कानून का विरोध किया है।

इन दोनों ही विधेयकों का मकसद एक है- राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के पक्ष में दोनों के कानून में संशोधन करना। उसे इस लायक बनाना कि सस्ते में मानव श्रम शक्ति और प्राकृतिक सम्पदा को बेचा जा सके।

जिसका लाभ समाज के बहुसंख्यक श्रमजीवी वर्ग और देश को कभी नहीं मिलता।

सस्ते में श्रम बेचने को सरकार काम का अवसर बताती है, और देश की प्राकृतिक सम्पदा को निजी कम्पनियों को सौंपने को आर्थिक विकास और देश की समृद्धि का जरिया बताती है।

यह तर्क आम जनता के लिये है।

निजी कम्पनियों के लिये सरकार कम लागत में भारी मुनाफा कमाने का प्रस्ताव रखती है।

और सच यही है।

वह भूमि अधिग्रहण के लिये सरकार के हाथों में अधिकार सौंपने में लगी है, ताकि सरकार निजी कम्पनियों एवं काॅरपोरोशनों के लिये भूमि अधिग्रहण कर सके। वैसे, सामाजिक विकास और भवन निर्माण का पुच्छल्ला भी वह लगा कर रखी है। जिसे दिखा कर, आम लोगों को बरगलाया जा सके। अधिग्रहण के विरूद्ध जन प्रतिरोध को रोका जा सके, यह भी कहा जा सके, कि ‘‘हम तो देश की समृद्धि और कमजोर वर्ग के उत्थान के लिये मरे जा रहे हैं।‘‘ सरकार यह भी कहने से नहीं चूकती है, कि उसे जन समर्थन हासिल है। मतलब उसे कानून में मनमानी संशोधन का अधिकार प्राप्त है।

श्रम कानूनों के लिये भी यही तर्क है। सबसे बड़ा तर्क काम का अवसर है। मजदूरों की सुरक्षा, काम की स्वस्थ्य परिस्थितियां, उचित पगार, छंटनी और तालाबंदी से बचने, यूनियन बनाने और संवैधानिक अधिकारों की बात छोड़ दें। सकरार के लिये उत्पादन के साधन पर श्रमिक वर्ग का अधिकार कोई मुद्दा ही नहीं है। उसकी साझेदारी भी नहीं है। वह मैनेजमेंट का हिस्सा नहीं श्रम के एवज में पगार पाने वाला श्रम जीवी है।

अब अन्ना हजारे जी से पूछ लें-

श्रम कानून में संधोधन से तो आपको कोई आपत्ति नहीं है।

चलो कोई बात नहीं।

भूमि अधिग्रहण कानून के विरोध का आधार क्या है?

क्या निजी कम्पनियों और काॅरपोरेशनों को अधिग्रहित जमीनों को देने के आप खिलाफ हैं?

क्या मोदी सरकार के निजीकरण और प्राकृतिक सम्पदा को राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को देने के आप खिलाफ हैं?

या आप भ्रष्टाचारियों के रहते भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की तरह ही भूमि अधिग्रहण कानून को सिर्फ मुआवजे के तराजू में तौलने वाले हैं?

आपके लिये विस्थापन और अपनी जमीन से बे-दखल होने का मतलब क्या है?

क्या ‘लोकपाल‘ की तरह ही यहां भी कोई ‘भू-पाल‘ है?

आप का आंदोलन हमेशा ही गैर-राजनीतिक रहता है। जिसका लाभ आम जनता से ज्यादा उस सरकार को या उस सरकार के विरूद्ध नाराज लोगों की नाराजगी का लाभ उठाने वाली ताकतों और भावी सरकार बनाने वालों को मिलता है। लेकिन मुद्दे राजनीतिक होते हैं।

आप खड़े होते हैं, और आम जनता की नाराजगी और विरोध गंदे पानी सा बह जाता है। आप दूसरे गांधी बन जाते हैं, भारत ब्रिटिश डोमेनियन के सदस्य की तरह वहीं खड़ा रहता है, जहां भूख है, गरीबी है, कुपोषण है और समाज के बहुसंख्यक वर्ग की बद्हाली है।

सरकारों की फजीहत सिर्फ इतनी होती है, कि वो आपको राजी करने की कवायतें करते हैं, और उनका हित सध जाता है, जिनकी उत्पादन लागत कम करने और मुनाफा बढ़ाने में सरकारें लगी हैं। मनमोहन जी दबी जुबान में कहते हैं, मगर मोदी जी की जुबान खुल गयी है। जो इस बात को अच्छी तरह जानते हैं, कि आने वाले कल में श्रम कानून और भू-अधिग्रहण का मुद्दा बड़ा मुद्दा बनेगा।

हम यह तो नहीं कहेंगे, कि आपकी सरकार से साझेदारी है, लेकिन हम यह जरूर कहेंगे कि आपकी लड़ाई से मुद्दों के अपहरण की शुरूआत जरूर हो जायेगी। जिसका लाभ शुरूआती दौर में आम जनता को या तो मिलता हुआ लगेगा या आप उसके खैरख्वाह बन जायेंगे, और बाद में मुद्दे जीवित तो रहेंगे, मगर लड़ाई बंट जायेगी। भ्रष्टाचार विरोध और लोकपाल के मांग की तरह मुद्दे मरियल हो जायेंगे। आम किसान अपनी किस्मत को कोसेगा, और यह समझा नहीं पायेगा, कि भू-अधिग्रहण सिर्फ किसानों का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह आम जनता के हितों के विरूद्ध देश और समाज की सम्पत्ति के निजीकरण का मामला है।

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