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अफगानिस्तान के मादक पदार्थों पर अमेरिकी वर्चस्व

1Erik_AfghanistanBlog20112अफगानिस्तान में 4 लाख 60 हजार अफगान बेघरबार शरणार्थी हैं। अपने ही देश में शरणार्थियों की तरह जी रहे हैं। और दूसरे देशों में जहां भी वो हैं, उन पर या तो गहरी नजर रखी जाती है, या उन्हें वहां से निकालने की कोशिशें होती रहती हैं। 6 दिसम्बर को पाकिस्तान ने लगभग 15 लाख अफगान शरणार्थियों को अपने देश वापस जाने का आदेश दिया है। जहां आतंकी हमले हो रहे हैं, नार्इट रेड टार्इम आपरेशन चल रहे हैं, नाटो सेना के साथ अमेरिकी सेना की वापसी और ड्रोन हमले हो रहे हैं। आम अफगान के जीने का मुददा कहीं नहीं है, उन्हें मारने की आजादी साम्राज्यवादी ताकतों ने अपने हाथों में ले ली है। देश-दुनिया के खबरों के बीच अफगानिस्तान एक राजनीतिक मुददा बन कर रहा गया है। अमेरिका अपनी सेना की वापसी के बाद भी सैनिक ठिकानों को -जिनकी संख्या 500 से ज्यादा है- बनाये रखने की चालबाजी चल रहा है, जबकि नाटो देशों की सेना पर वापसी का गहरा दबाव हैं वो अपने को पिटे हुए और असफल पा रहे हैं।

नाटो देश आस्ट्रेलिया की सेना ने 28 दिसम्बर से ही अफगानिस्तान छोड़ना शुरू कर दिया है। 2013 के अंत तक वह अपनी पूरी सेना को अफगानिस्तान से हटा लेगा। मध्य पूर्व क्षेत्र के डिफेन्स फोर्स के आस्ट्रेलियायी कमाण्डर ने कहा है कि सेना के साज-ओ-सामान और फौजी गाडियां स्वदेश रवाना कर दी गयी हैं, जबकि नौसेना और एयरफोर्स के सैनिक साल 2014 से पहले, अफगानिस्तान छोड़ने की तैयारी कर रहे हैं।” उन्होंने कहा- ”अंत आ गया है, और इसमें कोर्इ शक नहीं है। अब हम अफगानिस्तान से ज्यादा अपनी वापसी में लगे हैं।”

पिछले कर्इ महीनों से आस्ट्रेलिया की सरकार पर अपनी सेना को अफगानिस्तान से वापस बुलाने का दबाव बना हुआ है, क्योंकि अफगानिस्तान में विदेशी सेना पर हमले की कार्यवाही काफी बढ़ गयी है। अमेरिका और यूरोपीय देशों के अनुपात में आस्ट्रेलियायी सैनिकों की तादात (1500) बहुत ही कम है। जिसमें से -2001 से लेकर अब तक- 39 मारे गये और 250 घायल हुए हैं।

नाटो सेना और नाटो देशों से जुड़ी कम्पनियां अफगानिस्तान में, वहां की सरकार और विधि-विधानों से ऊपर मानते हैं। 24 दिसम्बर को अफगान वित्त मंत्री ने जानकारी दी कि विदेशी कम्पनियां जिनका संबंध नाटो देशों से है, जो अफगानिस्तान को चला रही है, वो अफगानिस्तान की सरकार के द्वारा लगाये गये वैधानिक करों को देने से भागती है। वो राजनीतिक परिवर्तन और नाटो पर निर्भर होती है, और सरकार पर दबाव बनावाती है कि उन पर वैधानिक कार्यवाही न की जा सके, जबकि ये विदेशी कम्पनियां सुरक्षा, संचालन, कम्युनिकेशन और मीडिया जैसे क्षेत्रों में काम कर रही हैं। वित्त मंत्रालय ने अपने रिपोर्ट में कहा है कि ”इन कम्पनियों पर 70 मिलियन डालर का वैधानिक कर बकाया है।”

अफगानिस्तान के वित्त मंत्री वहिदुल्लाह तोहिदी ने कहा है कि- ”यदि इन कम्पनियों के द्वारा टैक्स देने में अब टाल-मटोल किया जाता है, तो उन्हें वैधनिक कार्यवाही एवं सजा का सामना करना पड़ सकता है और उनके अफगानिस्तान में काम करने की अनुमति को निरस्त भी किया जायेगा।”

23 दिसम्बर को अफगानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करजर्इ ने इन विदेशी आकाओं पर पूरे अफगानिस्तान में भ्रष्टाचार फैलाने का आरोप लगाया। उनहोंने घोषणा की कि ”साल 2014 में अमेरिकी नेतृत्व वाली विदेशी सेना की अफगानिस्तान से वापसी के बाद ही, अफगानिस्तान को भ्रष्टाचार से उबरने में मदद मिलेगी।” ”ट्रांसपरेसी इण्टरनेशनल” द्वारा हाल में पबिलक सेक्टर में भ्रष्टाचार पर कराये गये अंतर्राष्ट्रीय सर्वे के अनुसार अफगानिस्तान सबसे भ्रष्ट देशों में सबसे बुरे तीन देशों मे से एक है।

राष्ट्रसंघ के एक रिपोर्ट के अनुसार 1 अगस्त से 31 अक्टूबर 2012 के बीच आम अफगान के मारे जाने की संख्या में पिछले साल के इसी समय की तुलना में 28 प्रतिशत की वृद्धि हुर्इ है।

”यूनार्इटेड नेशन एसिसटेंश मिशन इन अफगानिस्तान” ने 14 दिसम्बर को एक रिपोर्ट जारी किया है, जिसमें कहा गया है कि 2012 के तीसरे तिमाही में 967 आम अफगान मारे गये हैं और 1590 घायल हुए हैं। यह बढ़ोत्तरी पिछले 5 सालों से लगातार जारी है। 2011 में 3021 लोग मारे गये थे, जबकि 2010 में 2790 लोगों ने अपनी जान गवांर्इ थी।

12 दिसम्बर को जारी ‘यूनार्इटेड नेशन आफिस आन ड्रग एण्ड क्रार्इम’ की रिपोर्ट के अनुसार 2001 में अमेरिका के नेतृत्व में अफगानिस्तान में हुए सैन्य हस्तक्षेप के बाद, वहां मादक पदार्थों के उत्पादन और उसकी तस्करी में इजाफा हुआ है। रिपोर्ट में कहा गया है कि ”विदेशी सेना ने मादक पदार्थ के व्यापार को बढ़ावा दिया है।

हाल के एक रिपोर्ट के अनुसार 95 प्रतिशत ड्रग्स अफगानिस्तान के दक्षिणी और पूर्वी प्रांतों में पैदा किया जाता है, जो मुख्य रूप से अमेरिकी और बि्रटिश सेना के नियंत्रण में है। अधिकृत आंकड़ों के अनुसार ड्रग का गैरकानूनी उत्पादन बड़ी मात्रा में अफगानिस्तान के पांच प्रांतों- बैजिज़, फराह, हेलमंड, केंडाहान और उरूज़गान में होता है और ये पांच प्रांत अफगानिस्तान के सबसे असुरक्षित प्रांत हैं।

र्इरान की एंटीड्रग पुलिस ने दिसम्बर की शुरूआत में यह जानकारी दी है कि ”अफगानिस्तान में हर साल 700 टन हेरोइन का उत्पादन होता है।” और यह चौंकाने वाला सच है कि अफगानिस्तान में उत्पादित ज्यादातर मादक पदार्थों पर सीआर्इए का कंट्रोल है। एक सीमा तक सीआर्इए के नियंत्रण में यह अवैध कारोबार चलाया जा रहा है।

आज के मौजूदा अफगानिस्तान के लिये अमेरिका जिम्मेदार है। 26 दिसम्बर को अफगानिस्तान के पशिचमी प्रांत हीरात में लोगों ने अमेरिकी नेतृत्व वाली सेना द्वारा संचालित डेडली नार्इट रेडस -घातक रात्रिकालीन छापामारी- के खिलाफ प्रदर्शन किये। जिसका नेतृत्व अफगान कबीले के बड़े बुजर्ुग कर रहे थे। उन लोगों ने नाटो के इस आपरेशन की निंदा की तथा सरकार से इसे समाप्त करने की मांग की।

प्रदर्शनकारियों ने बताया कि विदेशी सैनिक उनके गांवों के आवासीय क्षेत्र में घुस आते हैं और लोगों की गिरफ्तारियां होती हैं, उन्हें यातनायें दी जाती हैं। लोगों को मारा जाता है। ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं जब अमेरिकी सेना ने बिना किसी वजह के लोगों की सामूहिक हत्यायें की हैं। अमेरिका ने अफगानिस्तान में एक साल के अंदर सबसे ज्यादा बार ड्रोन हमले का नया कीर्तिमान बनाया है। साल 2012 में 447 ड्रोन हमले किये। यह हमला पिछले 8 सालों में पाकिस्तान पर किये गये 338 हमलों से भी ज्यादा है। 2011 में 294 में हमले हुए थे। आतंकवादियों के विरूद्ध जारी इन हमलों में ज्यादातर आम अफगान ही मारे जाते हैं।

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