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रूस के द्वारा लातिनी अमेरिकी देशों की सुरक्षा की नयी पहल

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लातिनी अमेरिकी देशों में बढ़ती रूस की सक्रियता अब सतह के ऊपर आ गयी है। द्विपक्षीय आपसी समझौतों के साथ रूस और लातिनी अमेरिकी मित्र देशों की सुरक्षा के आधार पर बन रहे इमारतों का खाका नजर आने लगा है, जिसकी बुनियाद आर्थिक विकास और सामरिक सुरक्षा से बनी है। जिसमें सामाजिक विकास और बहुध्रुवी विश्व की अवधारणायें हैं। जिसका गहरा कूटनीतिक महत्व है। यह एकाधिकारवादी विश्व, अमेरिकी वर्चस्व और अमेरिकी मनमानी के खिलाफ, उसके आर्थिक हमले और सैन्य हस्तक्षेप के खिलाफ उठाया गया ऐसा कदम है, जिसमें चीन की गहरी साझेदारी है।

सच यह है, कि अमेरिकी खतरे के खिलाफ रूस और चीन संयुक्त मोर्चा हैं। वार्ताओं की मेज हैं। जिसमें शामिल होने वाले देशों की तादाद रोज बढ़ती जा रही है। और लातिनी अमेरिकी देशों की साझेदारी महत्वपूर्ण हो गयी है। जिनके लिये चीन आर्थिक सहयोग है, तो रूस समर्थन और सुरक्षा का आधार। आर्थिक हमले, राजनीतिक अस्थिरता और तख्तापलट जैसी कार्यवाही अमेरिकी सरकार पराग्वे, हैती और हुण्डूरास में कर चुकी है, वैसी कार्यवाही वह वेनेजुएला, निकारागुआ और इक्वाडोर में सफलतापूर्वक कर सकेगी, इसकी आशंका कम है। अर्जेन्टीना पर हो रहे आर्थिक हमलों का मकसद भी वहां की सरकार को बदलना है। अमेरिकी हमले के खिलाफ रूस और चीन की आर्थिक एवं सामरिक सुरक्षा की प्रतिरोधक लकीरें भी खिंचती जा रही हैं।

8 जनवरी को बिजिंग में ‘‘चीन-लातिनी अमेरिका एवं कैरेबियन-फोरम का पहला दो दिवसीय सम्मेलन हुआ। जिसके बारे में ई-न्यूज के फरवरी अंक में रिपोर्ट दी गयी है। यह घोषणां की गयी, कि चीन 250 बिलियन डाॅलर का निवेश 10 सालों में महाद्वीप के देशों में करेगा। निकारागुआ नहर निर्माण की भी जानकारी दी गयी है। जो पनामा नहर का विकल्प है। योजना के दूसरे भाग की तहत रूस के रक्षामंत्री सर्गेई शोयगू ने अपने तीन दिन की लातिनी अमेरिकी देशों की यात्रा की शुरूआत 11 फरवरी को की। इस यात्रा के तहत उन्होंने वेनेजुएला, निकारागुआ और क्यूबा की यात्रा की।

11 फरवरी को रूस के रक्षामंत्री वेनेजुएला पहुंचे। जहां उन्होंने वेनेजुएला के रक्षामंत्री व्लादीमिर पाद्रिनो लोपेस और वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मदुरो से मुलाकात की।

सर्गेई और पाद्रिनो के बीच हुई बैठक में रक्षा एवं सैन्य तकनिकी सहयोग के मुद्दे पर बातचीत हुई।

पिछले साल फरवरी में सर्गेई ने कहा था, कि ‘‘रूस अपनी सैन्य उपस्थिति को कई देशों में विस्तार देने की योजना बना रहा है, और उन देशों में वेनेजुएला भी एक देश है।‘‘ उन्होंने कहा था- ‘‘रूसी नौसेना के लिये यह जरूरी हो गया है, कि वह अपने जहाजों एवं पोतों की देख-भाल के लिये उन्हें उन देशों के बंदरगाहों पर ला सके।‘‘ उन्होंने यह भी कहा था, कि ‘‘रूस के लम्बी उड़ान भरने वाले विमान, उनके एयरबेस का उपयोग ईधन भरने के लिये भी कर सकते हैं।‘‘

रूस और वेनेजुएला ने आपसी मिलिट्री-टेकनिकल को-आॅपरेशन को विस्तार 1999 में ह्यूगो शाॅवेज के द्वारा वेनेजुएला की सत्ता संभालने के बाद किया। उससे पहले वेनेजुएला हथियार और सैनिक साज-ओ-सामान अमेरिका, यूरोप और इस्त्राइल से खरीदता था। आज रूस वेनेजुएला का प्रमुख हथियार आपूर्तिकर्ता देश बन गया है। इस क्षेत्र में सहयोग को बढ़ाने के समझौते पर मई 2011 में मास्को में हस्ताक्षर हुआ। जिसका आधार ‘इंटरगर्वमेण्टल एग्रीमेण्ट‘ है।

12 फरवरी को रूसी रक्षामंत्री सर्गेई शोयगू ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मदुरो से मुलाकात की। इस वार्ता के दौरान दोनों ने कहा कि ‘‘वैश्विक एवं क्षेत्रीय राजनीतिक स्थितियों के बारे में दोनों देशों के दृष्टिकोंण आपस में मिलते हैं।‘‘

इससे पहले दोनों देशों के रक्षामंत्रियों के बीच हुई वार्ता में संयुक्त सैन्य अभ्यास पर सहमति बनी। 11 फरवरी को रूस के रक्षा मंत्रालय ने सुनिश्चित किया कि ‘‘रूस वेनेजुएला के साथ ‘संयुक्त हवाई सुरक्षा अभ्यास‘ में भाग लेगा।‘‘ यह वायु सैन्य सुरक्षा अभ्यास वेनेजुएला और क्षेत्रीय सुरक्षा के लिये अनिवार्य हो गया है। मंत्रालय ने कहा कि ‘‘रूसी युद्धपोतों के वेनेजुएला पोर्ट में आमंत्रण को भी स्वीकृति दी जा चुकी है।‘‘ उन्होंने जानकारी दी कि ‘‘रूसी युद्धपोतों ने पिछले साल वेनेजुएला के बंदरगाह तक सद्भावना यात्रा की थी। जिसे इस साल भी दोहराया जा सकता है।‘‘

ऐसी सद्भावना यात्रा अमेरिकी साम्राज्यवादी विस्तार को रोकने के लिये पूर्व सोवियत संघ की नीति रही है। जिससे क्यूबा की सरुक्षा को सुनिश्चित किया गया था। रूस के राष्ट्रपति पुतिन कई मामलों में पूर्व सोवितय संघ की नीतियों को फिर से पुर्नजीवित कर चुके हैं।

रूस के विदेश मंत्री सर्गेई की मौजूदा यात्रा कम-ओ-बेस उन्हीं नीतियों की पुर्नवापसी है। 12 फरवरी को उन्होंने निकारागुआ की यात्रा की। जहां अमेरिकी हंस्तक्षेप का खतरा निकारागुआ नहर के निर्माण के साथ पहले से ज्यादा बढ़ गया है। जिसका निर्माण चीन के सहयोग से किया जा रहा है। जो पनामा नहर का विकल्प है, जिस पर अमेरिकी वर्चस्व है।

10 फरवरी को निकारागुआ सेना के प्रवक्ता जनरल एडोल्फो जीपीडा ने कहा- ‘‘निकारागुआ युद्धक विमानों की एक खेप खरीदना चाहता है, जिसमें रूसी मिग-29 युद्ध विमान भी शामिल हैं। इन विमानों का उपयोग तटीय क्षेत्रों में नशीले पदार्थों की तस्करी करने वालों के खिलाफ किया जायेगा।‘‘ उन्होंने कहा- ‘‘फाइटर जेट का उपयोग सिर्फ रक्षात्मक रूप में किया जायेगा, ना कि हवाई हमलों के लिये।‘‘ उन्होंने स्पष्ट किया कि ‘‘निकारागुआ इस क्षेत्र के अपने पड़ोसी देशों के लिये किसी भी तरह का सैन्य दबाव या सैन्य हस्तक्षेप जैसी धमकी का निर्माण नहीं कर रहा है।‘‘

12 फरवरी को रूस के रक्षामंत्री सर्गेई ने निकारागुआ की राजधानी मानागुआ में पत्रकारों को बताया कि ‘‘हमारे बीच कई द्विपक्षीय समझौतों पर हस्ताक्षर हुए है, जिनका उद्देश्य रूस और निकारागुआ के बीच मिलिट्री टेकनिकल को-आॅपरेशन को बढ़ाना है। इन समझौतों में रूसी युद्धपोतों के निकारागुआ पोर्ट में रूकने की प्रक्रिया को आसान बनाना भी शामिल है।

रूस लाातिनी अमेरिकी देशों के साथ अपने सहयोग को तेजी से बढ़ा रहा है, विशेष कर सुरक्षा के क्षेत्र में। जिसके तहत हथियारों की बिक्री, रूसी नौ सैनिक युद्ध पोतों को ईधन भरने की सुविधा सहित उनकी देखभाल एवं मरम्मत करने की सुविधा का निर्माण कार्य तथा वैश्विक स्तर पर गश्त लगाने वाले रूसी स्टैरजिक बम वर्षकों के द्वारा इन देशों के एयरबेस का उपयोग शामिल है। जिसकी सबसे बड़ी वजह नाटो सैन्य संगठन के द्वारा पूर्वी यूरोपीय देशों में अपनी सैन्य क्षमता को बढ़ाना है।

133989812_14237222448431n13 फरवरी को रूसी रक्षामंत्री सर्गेई ने निकारागुआ के राष्ट्रपति डेनियल आॅरटेगा के साथ बैठक की। यूक्रेन के मुद्दे पर राष्ट्रपति ने अमेरिका और यूरोपीय संघ के विरूद्ध रूस की नीतियों का समर्थन किया। उन्होंने कहा- ‘‘हम रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन द्वारा यूक्रेन के संकट को हल करने के लिये उठाये गये कदमों का पूरी तरह से समर्थन करते हैं।‘‘

राष्ट्रपति आॅरटेगा ने विश्वास व्यक्त किया कि ‘‘भविष्य में निकारागुआ और रूस के बीच विज्ञान, टेक्नोलाॅजी और अन्य क्षेत्रों में सहयोग बढ़ेगा।‘‘

बैठक के दौरान निकारागुआ के राष्ट्रपति ने विश्व राजनीतिक समस्याओं को बढ़ाने और उन्हें प्रभावित करने में अमेरिका की नकारात्मक भूमिका के बारे में बातें की।

उन्होंने खुले तौर पर कहा कि ‘‘हम देख सकते हैं, और हमें इस बारे में जानकारी है, कि अमेरिका दुनिया भर में भारी तबाही और विध्वंस की परिस्थितियां बना रहा है। वह जहां भी होता है, वहां अशांति और अस्थिरता की शुरूआत हो जाती है।‘‘

इस बैठक के दौरान रूस के रक्षामंत्री ने रूसी सेना में परिवर्तन के बारे में जानकारी दी।

दोनों देशों में यूक्रेन के मुद्दे पर और अन्य वैश्विक मुद्दों सहित क्षेत्रीय राजनीति पर अपने समान नीति एवं अपनी स्थितियों को सुस्थिर किया।

निकारागुआ के पोर्ट पर रूसी युद्धपोतों के आने-जाने की प्रक्रिया को सरल बनाने के समझौते पर हस्ताक्षर होते ही निकारागुआ ऐसा तीसरा देश बन गया जिसके साथ रूस के ऐसे समझौते हैं। दो अन्य देश सीरिया और वियतनाम हैं। आज सीरिया की सुरक्षा के लिये यह समझौता मजबूत आधार है। निकारागुआ के साथ रूस का यह समझौता इस बात की सतर्कता भी है, कि सीरिया की तरह अमेरिका और नाटो देश निकारागुआ को फिर से गृहयुद्ध की आग में धकेल न सकें। ना ही अमेरिकी सरकार निकारागुआ नहर के निर्माण को रोकने के लिये राजनीति अस्थिरता पैदा कर सैन्य हस्तक्षेप की कार्यवाही न कर सके।

यह अनुमान है, कि अमेरिका शीतयुद्ध के सीआईए के ‘कोन्ट्रा आॅपरेशन‘ को फिर से दोहरा सकता है। वह निकारागुआ के राष्ट्रपति ओरटेगा के खिलाफ ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों को हथियार दे सकता है। वह निकारागुआ नहर में जिन किसनों का जमीन जा रहा है, उनमें असंतोष पैदा कर उन्हें विद्रोह के लिये सहयोग एवं समर्थन दे सकता है। ‘द डेली बीस्ट‘ ने नवम्बर में लिखा था, कि ‘‘ग्रामीण हथियारों की मांग कर रहे हैं, ताकि वो अपनी लड़ाई शुरू कर सके। यदि निकारागुआ में गुरिल्ला युद्ध की शुरूआत हो गयी तो निकारागुआ नहर का काम रूक जायेगा, और यदि निकारागुआ में तख्तापलट हो गया तो निकारागुआ नहर का काम पूरी तरह से बंद हो जायेगा।‘‘

रूस अपनी और अपने मित्र देशों की सुरक्षा के लिये बहुआयामी योजना पर काम कर रहा है। इस साल की शुरूआत में रूसी रक्षा मंत्रालय ने चीन और भारत की सेनाओं के साथ सहयोग को बढ़ाने की जरूरत पर जोर दिया था, साथ ही उसने दक्षिण-पूर्व एशिया और अरब जगत से सैन्य सहयोग बढ़ाने की नीति पर भी जोर दिया था। जिसके तहत ‘मिलिट्री बेस‘ की संख्या बढ़ाना भी है।

फरवरी की शुरूआत में ही ‘नाटो‘ ने घोषणां की है, कि ‘‘वह ‘रैपिड रिस्पाॅन्स फोर्स‘ में सैनिकों की संख्या 13,000 से बढ़ा कर 80,000 कर रहा है, और अपने 6 सदस्य देशों में 6 नये कमाॅण्ड पोस्ट बनायेगा।‘‘ जो कि रूस के पड़ोसी देश हैं। नाटो का यह कदम रूस की सामरिक घेराबंदी का हिस्सा है। वह चीन की तरह ही रूस को अपने दबाव में लेने की नीति पर काम कर रहा है, ताकि वह इन देशों की वैश्विक चुनौतियों को नियंत्रित कर सके। वह एशिया प्रशांत क्षेत्र की तरह ही अरब, लाल, काला सागर एवं अटलांटिक सागर क्षेत्र को भी अस्थिर एवं उसके संतुलन को बिगाड़ने पर तुला हुआ है। वह एक नये सैन्य प्रतिस्पद्र्धा को बढ़ाने पर लगा है।

रूस के रक्षामंत्री ने लातिनी अमेरिकी देशों की यात्रा के अंतिम पड़ाव पर क्यूबा के राष्ट्रपति राउल कास्त्रो से मुलाकात की। बैठक के दौरान कहा गया कि ‘‘रूस और क्यूबा के आपसी सम्बंध सैन्य एवं सैन्य तकनिकी क्षेत्र में सकारात्मक निर्माण की दिशा का विस्तार कर रहे हैं।‘‘

रूसी रक्षामंत्री ने कहा- ‘‘हमारे सम्बंध सेना के क्षेत्र में विध्वंसक नहीं, बल्कि रचनात्मक और अविध्वंसक हैं। हम अपने सहयोग को नौसैनिक क्षेत्रों में भी विस्तार दे रहे हैं।‘‘ उन्होंने रूसी युद्धपोतों के लिये हवाना पोर्ट को खोलने के प्रति आभार प्रकट किया। उन्होंने क्यूबा की सेना को इस साल होने वाले- ‘‘इंटरनेश्नल वाॅर गेम्स‘, ‘फोर्थ इंटरनेशनल सिक्यूरिटी कान्फ्रेंस‘ और ‘इंटरनेशनल साइंटिफिक एण्ड टेक्निकल फोरम आर्मी 2015‘ में शामिल होने का आमंत्रण दिया।

क्यूबा के राष्ट्रपति राउल कास्त्रो ने कहा- ‘‘क्यूबा की सेना और सैन्य प्रतिनिधि इन आयोजनों में हिस्सा लेंगे।‘‘

रूसी रक्षामंत्री ने कहा- ‘‘रूस और क्यूबा के दृष्टिकोंण वैश्विक एवं क्षेत्रीय सुरक्षा मुद्दे पर पूरी तरह से एक-दूसरे से मिलते हैं।‘‘ उनहोंने कहा ‘‘हम न्यायसंगत बहुध्रुवी विश्व की अवधारणां से बंधे हैं। जो समानता, अंतर्राष्ट्रीय कानून के प्रति निष्ठा और आपसी सम्मान पर आधारित है। जिसमें संयुक्त राष्ट्र की केंद्रिय भूमिका है।‘‘ उन्होंने क्यूबा और रूस के दीर्घकालिक संम्बंधों को रेखांकित करते हुए क्यूबा को लातिनी अमेरिकी देशों की स्वतंत्रता और आत्म निर्भरता का प्रतीक करार दिया। उन्होंने कहा ‘‘हमारी वरियता उच्च स्तरीय बैठकों में किये गये समझौतों को कार्यरूप में बदलना है।‘‘

इसी दौरान वेनेजुएला और इक्वाडोर के विदेश मंत्रियों और तेल एवं खनिज मंत्रियों ने 12 फरवरी को मास्को की यात्रा की। जिसका मकसद तेल उत्पादक ओपेक देशों और गैर ओपेक देशों के बीच, अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में की गयी गिरावट के बीच सही नीति का निर्धारण करना था, ताकि इसके आर्थिक एवं राजनीतिक प्रभावों को संतुलित किया जा सके। जिसने तेल उत्पादक देशों की अर्थव्यवस्था को न सिर्फ संकटग्रस्त कर दिया है, बल्कि नये वैश्विक वित्तीय संकट को आमंत्रित कर दिया है।

लातिनी अमेरिकी देशों की रूस की यह यात्रा इन देशों की सुरक्षा की नयी पहल है। जिसका निर्णायक महत्व है।

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