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मुनाफे का रस

PTI-Narendra-Modi-Suit

‘‘हां तो भाई मेरे! हमारे मोदी जी अच्छे कारोबारी है। ‘‘विवादों की बोली लगवाते हैं, और उसे नीलाम कर देते हैं।‘‘

जहां धंधे की बात हो, वहां मुनाफे का रस टपकने लगता है।

मोदी जी का सूट 4 करोड़ 31 लाख 31 हजार रूपये में बिक गया। जिसे पहन कर वो ओबामा जी के सामने चमके, विरोधियों की नजरों में खटके, और अपनों की नजरों में चढ़ गये। दिल्ली में लगे झाडू से झड़ गये। जिसे देने वाले एक नहीं, कई दावेदार दाता हैं।

अब तो यह मोदी जी ही जानें किससे उन्होंने लिया और क्या दिया? कहां और किससे अपनी कंचन काया की पैमाईशें करायी? किसने सिलाई की और किसने सिलवाया? वे ही यह बता पायेंगे कि हीरों के व्यापारियों ने उतारा सूट क्यों खरीदा? जो उनके नाम का नहीं, उनके काम का नहीं, जो उनके ब्राॅण्ड का नहीं, जिसे वो रिसेप्शन पर टांग कर रखेंगे।

टंगा हुआ सूट ही यह बतायेगा कि हीरा व्यापारी ने कपड़ा क्यों खरीदा?

बहरहाल,

जिसके सामने चमकना था, मोदी जी चमक लिये।

जिनकी नजरों में खटकना था, मोदी जी खटक लिये।

जिनकी नजरों में चढ़ना था, मोदी जी चढ़ लिये।

और जहां झाडू लगना था, वहां झड़ लिये।

अपनी ओर से उन्होंने विवादों पर राष्ट्रवाद का कफन डाल दिया।

लोगों ने मान लिया कि वो सूट पहन कर राष्ट्र की सेवा कर रहे थे। खरीददार ने बताया- वे गंगा प्रेमी हैं। इसलिये नीलामी में भाग लिये। सूट का पैसा गंगा सफाई अभियान में खर्च होगा।

तुर्रा यह कि मोदी जी का इतना क्रेज है, कि नीलामी का समय बीतने के बाद भी लोग 5 करोड़ तक की बोलियां लगाते रहे। हमसे कहिये तो हम भी बोली- दस करोड़ की लगा दें।

मतलब…?

आप बेचें तो बाजार में अधोवस्त्र के खरीददार भी मिल जायेंगे।

बाजार है भाई! बाजार में रोम-रोम के खरीददार हैं।

कहावत पुरानी है- ‘‘नामी बनिया का लीद भी बिकता है।‘‘

कभी बिका या नहीं?

हमें नहीं मालूम।

कहावत है, शायद बिका भी हो।

लेकिन, हमारे मोदी जी पक्के कारोबारी हैं, उन्होंने हीरा व्यापारी के हाथों 10 लाख के उतारा सूट को 4 करोड़ 31 लाख 31 हजार में बेच दिया।

वो पक्के राष्ट्रवादी हैं, सारा धन उन्होंने राष्ट्र को सौंप दिया।

उनका राष्ट्रवाद संघ की चाशनी में डूबा हुआ है।

उन्होंने केसरिया ध्वज को नमन किया है।

ध्वजारोहण किया है।

काली टोपी, सफेद कमीज, खाखी पैंट पहना है।

ड्रम बजाया है।

लाठी-डण्डा भांजा है।

नीलामी के लिये उनके पास और भी बहुत कुछ है।

भारत की बल खाती अर्थव्यवस्था को संभालने के लिये मोदी जी अकेले ही पर्याप्त हैं।

उनके पास चुनावी जीत है। मुक्त बाजार के धागे में पिरोने के लिये उनके पास पांच साल के लिये जीता हुआ हिंदुस्तान है।

सवा सौ करोड़ हिन्दुस्तानियों की बौद्धिक सम्पदा और श्रम शक्ति है।

राष्ट्र और राष्ट्र का निर्माण है।

इसलिये हमने करीदा पढ़ने के अंदाज में कहा-

‘‘हमारे मोदी जी पक्के कारोबारी हैं।‘‘

‘‘लेकिन, इसमें कारोबार कहां है?‘‘ सिर से लेकर पांव तक एक टेढ़ा सवाल खड़ा हो गया।

जिसका सीधा सा जवाब मिला- ‘‘यह सब कारोबार ही है।‘‘

‘‘अच्छा…?‘‘ आश्चर्य के बाद, सवाल फिर से खड़ा हुआ-

‘‘फिर इसमें मुनाफे का रस कहां है?‘‘

‘‘वहीं जहां गन्ने में, गन्ने का रस होता है। जिस पर कोई विवाद नहीं है।‘‘

जिसकी समझ में बात आयी वह भी चुप रहे और जिसकी समझ में नहीं आयी वह भी चुप रहे। सच बोलने का खतरा कोई उठाना नहीं चाहता।

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