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चेहरों की भीड़ – 8

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(साहित्य में राजनीति के दखल को स्वीकार करना चाहिये। यह मान लेना चाहिये कि यदि समाज राजसत्ता की गिरफ्त में है, तो साहित्य का उसकी गिरफ्त में होना स्वाभाविक है।) लेकिन, आम रूप से हम यह मानना नहीं चाहते, हमारे लिये साहित्य का दर्जा समाज से ऊपर है।

है या नहीं है? होना चाहिये या नहीं होना चाहिये?

यह सवाल ही करना नहीं चाहते।

साहित्य को कुछ लोग कुछ ज्यादा ही पवित्र मानते हैं, और मान लेते हैं, कि राजनीति गंदी चीज है। क्रोध, मद, शोषण, दमन, हंथियार और हिंसा को वो राजनीति मानते हैं। इसलिये मानते हैं, कि जो पवित्र है उसे गंदगी के नियंत्रण से मुक्त होना चाहिये।

लेकिन, वो यह नहीं मानते कि उनकी इस हरकत से साहित्य अगरबत्ती छाप बन जाता है। जो कि वह नहीं है।

वो यह भी नहीं मानते कि यदि राजनीति से बाहर कुछ भी नहीं है, और वह गंदी चीज है, तो हम गंदगी से सने हुए हैं। हम वह सूअर हैं, जो गंदगी खाता है, गंदगी में रहता है, और जीवन के आखिरी सांस तक गंदगी में जीता है।
वो गंदगी को साफ करने से ज्यादा गंदगी से बच कर गुजरने की सीख देते हैं। और यह सीख खतरनाक है।

और बड़ी चतुराई से हमारे जेहन में टांक दिया जाता है, कि ‘‘कोय नृप होय, हमे का हानि।‘‘ जबकि हानि है, यह सामाजिक विकास से जुड़ने या कटने का मुद्दा है। यह सच है, कि न तो साहित्य पवित्र है, ना ही राजनीति गंदगी है।

मैं तुलसी दास या रामचरित मानस की बात नहीं कर रहा हूं मेरे लिये यह प्रचलित मुहावरा है।

और मुहावरे लोगों की जुबान पर तब ही चढ़ते हैं, जब जेहन में वह बात अंटक जाती है। और अंटकी हुई बात नदी के प्रवाह में, विगत के धागे से बंधी, नाव की तरह होती है, जिसकी बुनावट में मकड़ी का जला है। जो प्रवाह और बदलते दृश्य के साथ सोच को बदलने से रोकती सी रहती है। और सत्तारूढ़ वर्ग की श्रेष्ठता के साथ, सामान्य लोगों की निम्नता के लिये रचे गये मुहावरों के साथ ऐसा कुछ खास है।

वैसे मुहावरे रचे नहीं जाते, मुझे मालूम है, लेकिन उनका जन्म समाज में होता है, यह भी मालूम है। इसलिये इन मुहावरों से ज्यादा इन मुहावरों की सोच से बचने और उनके सामाजिक प्रभाव से साहित्य को बचाने की जरूरत है। यह मान कर चलने की जरूरत है, कि साहित्य का घर-परिवार, नाते-रिश्ते और सामाजिक सरोकार समाज में है, जिस पर राज्य की सरकारों ने कब्जा जमा लिया है, जो अब व्यक्ति और समाज की गिरेबां भी पकड़ चुकी है, मतलब साफ है, कि साहित्य की गिरेबां पर भी सरकारों ने हाथ डाल दिया है। अब नृप के होने न होने, हमारे साथ होने या हमारे खिलाफ होने से, हमारा होना न होना, निर्भर करता है। हमारे प्राकृतिक एवं सामाजिक एवं वैधानिक अधिकारों और जिम्मेदारियों को इससे मतलब है।

साहित्य को समाज में ही जीना है।

उसे धक्के खा कर एक किनारे लगने की जरूरत नहीं, बल्कि उसकी हिस्सेदारी जरूरी है।

हमें अगरबत्ती जला कर पढ़ने वाले साहित्य की जरूरत नहीं, जिससे अपने घरों में रखने, पढ़ने-पाठ करने और सीख लेने की संगठित सलाह उन लोगों के द्वारा दी जा रही है, जो कहते हैं कि ‘‘बहुत दिनों के बाद हमारे लिये देश में काम करने का अच्छा माहौल बना है।‘‘ और यह भी कहते हैं, कि ‘‘हम राजनीति नहीं करते।‘‘ जबकि, वो राजनीति को नियंत्रित करने में लगे हैं। उस सरकार को नियंत्रित करने में लगे हैं, जिसे केंद्र में स्थापित करने का काम राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय वित्तीय ताकतों ने किया है, ताकि राजसत्ता का उपयोग वो अपने हितों में, अपने आर्थिक हितों को सुरक्षित करने के लिये कर सके। और सच यह है, कि दोनों ही ताकतें साहित्य और राजनीति से आम जनता को काट कर रखने की कवायतें कर रही हैं।

अब आप ही बताईये कि-

  •  साहित्य को धूप-दशांग दिखा कर रट्टामार धर्म के दर्जे में जीना चाहिये?
  • बाजार में बिकने वाला सामान बनना चाहिये? या
  • उन लोगों के साथ होना चाहिये, जिनके खिलाफ वित्तीय ताकतें, और जन विरोधी सरकारें हैं?

जो कहते हैं, ‘‘राजा कोई भी हो, इससे हमें मतलब नहीं रखना चाहिये।‘‘ लेकिन वो चाहते हैं, कि ‘राम राज‘ हो। जो वर्गों में बंटे समाज को ‘राम राज्य‘ का पाजामा पहना देते हैं।

और ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है, जो लोगों के सिर पर काला कैप, काला रूमाल बांध, हाथों में हथियार थमा देते हैं। कि ‘‘मारो! जो भी तुम्हारे खिलाफ है, उसे मारो। हत्या का सबाब हासिल करो। जन्नत के लिये लोगों को दोजख की आग में जलाओ। सिर कलम करो।‘‘ और वास्तव में उनके खिलाफ वह आदमी होता है, जो दुनिया को बेहतर बनाने और मिल जुलकर जीने के लिये दिन-रात मेहनत करता है। जिसके सामने ऐसी परिस्थितियां बनायी जाती हैं, कि वह मरें या हाथों में हथियार थामें। और यह सब सिर्फ इसलिये है, कि  चंद लोगों को मारने का कारोबार उन कारोबारियों के लिये कर रहे हैं, जो दुनिया के प्राकृतिक संसाधन, मानव श्रमशक्ति और सम्पदा को अपने नाम दर्ज कराना चाहते हैं।

कुछ लोग कहते हैं- वेदों में हमारा ज्ञान है, महाकाव्यों में जीवन का सार है।

कुछ लोगों के लिये- कुरान और सरिया ही खुदा का विधान है। पैगम्बर हमारी जान है।

कुछ लोगों ने मान लिया है, कि बाइबिल से बड़ी कोई चीज नहीं, जिसके लिये, हमारे लिये ईसा सलीब पर चढ़ा। सूली पर चढ़ा ईसा ही पवित्र है। जोकि उनका अपना कारनामा है।

ईसा से पूछे तो पता चलेगा, वो सूली पर चढ़ना नहीं चाहते थे।

पैगम्बर किसी की जान नहीं।

और जिन्होंने वेदों और महाकाव्यों में जान फूका वो भी नहीं जानते थे, कि उन्होंने कुछ ऐसा इजाद किया है, जिसके आगे कोई ज्ञान नहीं है।

उन्हें कहां पता था, कि उनका वास्ता पोंगा, कठमुल्ला और उन लोगों से पड़ना है, जो उसे सलीब का एक हिस्सा बना देंगे।

ऐसे ही लोगों ने दुनिया को मुक्त व्यापार का ऐसा क्षेत्र बना दिय है, जहां युद्ध है, आतंक है, दमन और शोषण है। अमानवीय सच है। कह सकते हैं, कि पगलाये हुए चंद लोगों ने एक पगलायी हुई सभ्यता को जन्म दिया है। जिन्हें देख कर घिन आती है, ऐसा लगता है, जैसे किसी बरसाती मेढ़क को कपड़ा पहना दिया गया है। जिसका पेट इतना फूल गया है, कि फटने-फटने को है। लेकिन सांप अपने ही जहर से नहीं मरता। यह सभ्यता भी सिर्फ अपने जहर से  नहीं मरेगी।

उसने अपने जहर को कई पुश्तों के रगों में उतार दिया है। सामाजिक सोच की रगों में उसने जहर घोल दिया है। यह जहर धीरे-धीरे लोगों को मारता ही नहीं, लोगों को काटता भी है। एक-दूसरे को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा कर देता है।

इस्लामिक आतंकवादी सीरिया और इराक में किसे मार रहे हैं?

उसे ही न जो पगलायी हुई सभ्यता के खिलाफ है।

बोको-हरम के लड़ाके भी इसी पगलायी हुई सभ्यता के कारिंदे हैं, जो पगलाये हुए अमीरों के लिये एक ऐसा मुल्क चाहते हैं, जहां कमर तो सबकी झुकी रहे, मगर सिरों के उठते ही उसे धड़ से अलग कर दिया जाये। नाइजीरिया का खेल अफ्रीका का सच है। लीबिया में कर्नल गद्दाफी के न होने और उनके महाद्वीपीय सपनों को उनके साथ ही खत्म करने का परिणाम है और यह सब जिन्होंने किया, वे ही साहित्य के -पवित्र साहित्य के- ठेकेदार हैं।

यह अनोखा सच है, कि युद्ध के आतंक का सम्बंध आर्थिक और राजनीतिक है।

इसलिये साहित्य में राजनीतिक दखल की बात होनी ही चाहिये। हमें खुद से यह सवाल भी कर लेना चाहिये, कि क्या राजनीति -राजसत्ता- की औकात इतनी बढ़ गयी है, कि वह साहित्य को अपनी गिरफ्त में रख सकती है?

यदि यह जवाब आपके पास हो कि जब समाज राजसत्ता की गिरफ्त में है, तब साहित्य उसकी गिरफ्त से बाहर कैसे रह सकती है। तब आप मान लें कि आपकी सोच की दिशा सही है।

बातों को कडुवाहट से स्वीकार करने की आदत हमें डाल लेनी चाहिये। साहित्य को समाज के ऊपरी आसन की जरूरत कभी नहीं पड़ी। उसे जब भी उस आसन पर बैठाया गया, वह राजसत्ता की चाकर बनायी गयी। भांटों को याद करें, राज दरबारी कवितयों को याद करें, सुल्तानों के इतिहासकारों को याद करें, और यह भी याद करें कि भाववादी चिंतनधारा सदियों से राजसत्ता के नियंत्रण में है।

पदार्थवादी सोच और भौतिकवादी चिंतन धार ने ही राजसत्ता के वर्ग चरित्र को बदलने और अपनी सामाजिक सम्बद्धता की लड़ाईयां लड़ी है। उसने राजसत्ता को समझने और समझाने की गंभीर पहल की है। यही कारण है कि उसके खिलाफ ज्यादातर सरकारें कल भी थीं, और आज भी हैं। इसलिये इस बात को स्वीकार करने में कोई हर्ज नहीं है, कि समाज की स्वतंत्रता के बिना साहित्य की स्वतंत्रता कोरी बकवास है।

(जारी)

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