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अफ्रीका को सैनिक छावनी में बदलने का अभियान

अफ्रीका के 35 से ज्यादा देशों के लिये पेण्टागन ने वर्ष 2013 के सैन्य कार्यक्रमों की घोषणा की है। उसने कहा है कि ”2013 में अफ्रीका के 35 से ज्यादा देशों में अमेरिकी सेना की ‘स्माल आर्मी टीम’ भेजी जायेगी, जिनका तात्कालिक उददेश्य उन देशों की सेना को प्रशिक्षित करना और उन्हें मजबूत बनाना है।” उसने यह भी कहा है कि ”वे सैन्य अभियानों में भी भाग ले सकती है, हालांकि इसके लिये उन्हें सुरक्षा विभाग की तरह से विशेष आदेश लेना होगा।” वह जानकारी अमेरिकी सेना के कमाण्डर इन चीफ जनरल डेविड रोडरिज ने दी।

‘सेकेण्ड कमबैट बि्रगेड’ का यह अभियान 2013 के मार्च से शुरू होगा। पूरे अफ्रीकी महाद्वीप में लगभग 100 युद्धाभ्यास की योजना है, जिसकी शुरूआत लीबिया, सूडान, नाइजर, केन्या और युगांडा से होगी, जहां पेण्टागन की रिपोर्ट के अनुसार, बड़ी संख्या में हथियारबद्ध गुट हैं, जिनका सम्बंध अलकायदा जैसे आतंकी संगठन से है।

अफ्रीकी महाद्वीप के जिन देशों से अमेरिका अपने इस सैन्य अभ्यास की शुरूआत कर रहा है, वहां बकौल पेण्टागन, ”हथियारबद्ध गुट हैं, जो अलकायदा जैसे आतंकी संगठन से जुड़े हैं।” उनके लिये यह सवाल करना जरूरी है कि इन गुटों के पास इतने हथियार कहां से आये? और अलकायदा जैसे आतंकी संगठनों को पैदा किसने किया?

अमेरिका और पशिचमी ताकतों ने ही अफ्रीकी महाद्वीप में हथियारों को भरने का काम किया है, जहां भूख, गरीबी, और बेकारी है। यह दुनिया का एकमात्र ऐसा महाद्वीप है, जो अपनी खाध जरूरतों को पूरा नहीं कर पाता है। जिनके पास विशाल वन एवं खनिज सम्पदा है। जिनका दोहन सदियों से हो रहा है। इंफोवारस डाट काम वेबसार्इट लिखता है कि अमेरिका के इस मिशन के पीछे का एक अन्य उददेश्य, अफ्रीका के प्राकृतिक संसाधन है। यहां तेल के अलावा हीरा, ताम्बा, सोना, लोहा, कोबाल्ट, यूरेनियम, चांदी, इमारती लकडि़यां और फलों का विशाल भण्डार है।

एसोसियेट प्रेस ने टिप्पणी की है कि ”अमेरिका के इस योजना को कर्इ अफ्रीकी देश मिलिट्री बेस की मौजूदगी और वाशिंगटन के प्रभाव के बढ़ने के डर से अस्वीकार भी कर सकते हैंं।”

नवम्बर में आर्मी टार्इम्स न्यूज सर्विस की तरफ से आये रिपोर्ट में कहा गया है कि ”साल 2013 में अमेरिका, अफ्रीका में 3000 से ज्यादा सैनिक तैनात करेगा। यह तैनाती पूरे अफ्रीकी महाद्वीप में होगी।” अमेरिका अफ्रीकी महाद्वीप को सैनिक छावनी में बदलने की योजना पर काम कर रहा है। व्यापक जन असंतोष और टयूनिशिया से शुरू हुआ सत्ता विरोधी आंदोलन, दशकों से स्थापित सरकारों को उखाड़ने में कामयाब रही हैं। जो अमेरिकी समर्थक थे, और जो अमेरिकी समर्थक नहीं थे, वहां विद्रोह खड़ा किया गया। अफ्रीकी देशों के लिये लीबिया अमेरिका के होने का सबक बन चुका है। जिसने अफ्रीका पर वर्चस्व कायम करने के लिये कर्नल गददाफी की हत्या की और लीबिया को मलबों में बदल दिया। पूरे महाद्वीप का सबसे समृद्ध और जनसमर्थक देश, जो अफ्रीका के विकास की योजनाओं से संचालित हो रहा था, आज वह अमेरिकी कब्जे में हथियारबद्ध गुटों के खूनी संघर्षों से घिरा है। जिसका विभाजन तय है। टीएनसी विद्रोही -जिसकी आज सरकार है- और आतंकवादियों को हथियार बांटे गये थे। आज यह कहना मुशिकल है कि लीबिया में सशस्त्र कबिलार्इ गुटों के पास कितने हथियार हैं? और इस समस्या का समाधान क्या है?

पेण्टागन की योजना इन मिलिसियायी गुटों के साथ, सरकार विरोधी शकितयों का सफाया करना भी है। सरकार सेना को मजबूत बनाते हुए, उसे अमेरिकी सेना का सहयोगी बनाना भी है, जो अमेरिकी हितों के लिये काम कर सकें। मेजर जनरल डेविड रोडरिज हग ने बताया कि ‘जब तक हमारा मिशन चलता रहेगा, तब तक वह क्षेत्र, जहां मिशन चल रहा है, अज्ञात रहेगा।” उसकी जानकारियां वहां से बाहर नहीं निकल पायेंगी। एक सीमा तक उस देश की ऐसी नाकेबंदी कर दी जायेगी कि खबरें बाहर न निकल सकें। अमेरिकी सेना के लिये जगह और अमेरिकी हथियारों के लिये बाजार बनाने के अलावा, यह अफ्रीकी देशों में अपने लिये सैन्य विस्तार करने की नीति है। सेना के बल पर सरकार चलाने की उसकी नीति हमेशा से रही है, जिसे अमेरिकी सरकार लोकतंत्र कहती है। लोकतंत्र की बहाली को उसने अरब जगत और अफ्रीकी देशों के लिये, किसी भी देश के आंतरिक मामले में हस्तक्षेप का बहाना बना लिया है। ज्यादातर देशों में उसने सैन्य सरकार की ही स्थापना की है।

अमेरिकी साम्राज्य अपने प्रभुत्व विस्तार और अफ्रीका के विपुल प्राकृतिक सम्पदा पर आधिपत्य जमाने के लिये ऐसे कर्इ अभियान चलाता रहा है। 2012 में उसके द्वारा चलाये गये मुख्य आपरेशन कर्इ हैं-

• कटलैस एक्सप्रेस- यह अमेरिका का नौसैनिक अभ्यास था, जिसके केंद्र में घोषित तौर पर सोमालिया बेसिन रिजन में अवैध हथियार, मादक पदार्थ एवं समुद्री डाकूओं पर नियंत्रण स्थापित करना था।
• अफ्रीका इन्देवर 2012- यह कैमरून में चलाया गया ऐसा सैन्य अभ्यास था जिसका मकसद मिलिट्री कम्युनिकेशन में प्रशिक्षण और कोआरडिनेशन था।
• ओबैनगेम एक्सप्रेस 2012- का मकसद गिनी के खाड़ी क्षेत्र में अपनी मौजूदगी को पुख्ता करना था। यह नौसैनिक अभ्यास पशिचमी अफ्रीका के तेल अभियान का केंद्र है। जिसके जरिये वह अपने प्रभुत्व को इस क्षेत्र में स्थापित करना चाहता था।
• साउदर्न एकार्ड 12- बोत्सवाना में स्थापित किया गया, जिसका उददेश्य साउदर्न अफ्रीकन मिलिट्री फोर्स और अमेरिका के बीच सैन्य संबंधों को स्थापित करना एवं उसे बढ़ाना था।
• वेस्टर्न एकार्ड 2012- सिनेगल के साथ सैन्य अभ्यास था। इस अभ्यास में हर तरह के सैन्य अभियान, खुफिया जानकारी इक्कटठा करने से लेकर निशानेबाजी के अभ्यास किये गये।

अमेरिका के हर सैन्य अभ्यास के पीछे सरकार की सेना का अमेरिकीकरण और उन्हें अमेरिकी हितों से जोड़ने की कवायतें थी। उसके हर एक सैन्य अभ्यास का मूल मकसद आर्थिक एवं राजनीतिक हित रहा है। इन अभ्यासों की तरह ही उसने अन्य कर्इ सैन्य अभियानों को अफ्रीकी देशों में चलाया है। अफ्रीकन लायन, फिलंट लाक, और फोनिक्स एक्सप्रेस ऐसे ही आपरेशन हैं। अफ्रीका कमाण्ड ने अपने प्रेस वक्तव्य में कहा है कि ‘ये अभियान अमेरिका के लिये जितने लाभकारी हैं, अफ्रीका के लिये भी, यह उतने ही लाभकारी हैं।’ जिसकी स्थापना अमेरिका और अफ्रीकन मिलिट्री को आतंकवाद और अन्य तरह के असिथरता पैदा करने वालों के खिलाफ एक साथ मिलकर लड़ने के लिये किया गया है। यह खुले तौर पर ‘जो है’ उसे ही बनाये रखने की अमेरिकी नीति है। जबकि अफ्रीका पूरी तरह असिथर एवं अशांत है। वह परिवर्तन के उस मुहाने पर खड़ा है, जहां अमेरिका और यूरोपीय ताकतें और वहां की सरकारें हैं। मुक्त बाजारवादी नीतियों ने जनअसंतोष को अपने चरम पर पहुंचा दिया है।
अफ्रीका में अमेरिकी शोषण एवं दमन का जो खुलासा विकिलिक्स ने, ”कांग्रेसनल रिसर्च सर्विस की रिपोर्ट” के तहत दिया है कि ”नाइजर डेल्टा और अन्य तेल उत्पादक क्षेत्रों में संघर्ष के बाद भी तेल के कुवें खोदे जा रहे हैं। विशेषज्ञों का अनुमान है कि ”अफ्रीका से अमेरिका अपनी जरूरत का 25 प्रतिशत तेल 2015 तक प्राप्त करने लगेगा।” उस दस्तावेज में अमेरिका के डिफेन्स डिपार्टमेण्ट आफिसियल ने कहा है कि ”अमेरिकी सेना का अफ्रीका में मूल उददेश्य यह सुनिशिचत करना है कि नार्इजीरिया का तेल भण्डार सुरक्षित रहे।”

इस तरह, अमेरिका के द्वारा अफ्रीका में 2013 मिशन का मूल लक्ष्य पशिचमी अफ्रीका में ‘फारिजन आयल आपरेशन’ विदेशी तेल अभियानों को नुक्सान पहुंचाने वाली शकितयों को अपने निशाने पर लेना है, ताकि अमेरिका अफ्रीका से अपने तेल आयात को बढ़ा सके। नार्इजर डेल्टा तेल के भण्डार से पशिचमी कम्पनियों को हटाने की कोशिश करने वाले अफ्रीकी देशों की सैन्य क्षमता और उनकी कोशिशों का विरोध इस मिशन का अघोषित लक्ष्य है। अमेरिका 2013 के इस मिशन से अपने हितों को सुरक्षित करने और अपनी ताकत बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।

2007 में स्थापित ”अफ्रीका कमाण्ड ने अमेरिका और नाटो सेना के पक्ष में, लीबिया में लड़ार्इयां लड़ी। आज लीबिया में अमेरिकी समर्थक ऐसी सरकार है जो अपने ही देश को लूटने वाली ताकतों का साथ दे रही है। लीबिया और कर्नल गददाफी पूरे महाद्वीप को अफ्रीकी संघ में बदलने के लिये तथा अपने तेल व्यापार को ‘डालर’ के बजाये ‘गोल्डेन दिनार’ में करने के पक्ष में थे। उन्होंने अमेरिकी साम्राज्यवाद से दशकों लम्बा संघर्ष किया। आज लीबिया के तेल भण्डार एवं प्राकृतिक गैस भण्डार पर अमेरिकी एवं पशिचमी ताकतों का आधिपत्य है, और वहां गृहयुद्ध जैसी सिथतियां हैं। लीबिया का भविष्य अनिशिचत और पूरी तरह असुरक्षित है। सशस्त्र गुटों के संघर्ष के अलावा लीबिया में जनप्रदर्शन भी हो रहे हैंं अमेरिकी सरकार सशस्त्र गुटों को ही लीबिया की सबसे बड़ी समस्या मान रही है। पेण्टागन अपने 2013 के अभियान से, इन मिलिसियार्इ गुटों के साथ गददाफी समर्थक लोगों के विरेाध को कुचलने की योजना बना सकती है। जिस लीबिया में सामाजिक एवं आर्थिक सुरक्षा थी और जहां काम के अवसर की कोर्इ कमी नहीं थी, आज उसी लीबिया में सामाजिक एवं आर्थिक सुरक्षा का अंत हो गया है, और लोग सरकार से काम मांग रहे हैं। काम के लिये प्रदर्शन हो रहे हैं। 27 दिसम्बर को प्रदर्शनकारियों ने 4 दिनों के लिये आयल टर्मिनल को बंद कर दिया। अर्इज्वेटीना आयल टर्मिनल से ही लीबिया के तेल निर्यात का काम होता है। लगभग 60,000 बैरल तेल बाहर ले जाया जाता है। लीबिया के डिप्युटी आयल मिनिस्टर ने कहा कि ”प्रदर्शनकारी काम की मांग कर रहे हैं।” आज लीबिया की सरकार के सामने देश के पुर्ननिर्माण और आम लोगों के लिये काम करने के बजाये, साम्राज्यवादी हितों के लिये पूरे महाद्वीप में सीरिया जैसी सिथतियां पैदा करना है।

अफ्रीका में अमेरिका अपनी सैन्य शकित चीन के बढ़ते हुए प्रभाव का सामना करने के लिये भी बढ़ा रहा है। चीन ने अमेरिका और यूरोपीय संघ को पीछे छोड़ते हुए अफ्रीका का प्रमुख व्यापार साझेदार बन चुका है। अफ्रीका और चीन के बीच का व्यापार 2000 में 11 बिलियन डालर का था, जो 2011 में बढ़कर 160 बिलियन डालर हो गया और अनुमान इस बात की है, कि वर्ष 2012 में यह बढ़कर 200 बिलियन डालर हो गया है। अमेरिका अफ्रीकी देशों पर एकाधिकार चाहता है। वह किसी भी कीमत पर वहां के घरेलू एवं बाहर से मिल रही चुनौतियों को कुचल देना चाहता है। वह इस सोच से संचालित हो रहा है कि सैन्य विस्तार से ऐसा किया जा सकता है। उसकी कोशिशें अफ्रीका को अमेरिका के पक्ष में सैनिक छावनी में बदलने की है। वह अफ्रीका के प्राकृतिक संसाधन का अबाध दोहन चाहता है। जिसमें जन विरोधी सैनिक सरकारें तो उसकी मदद कर रही हैं, मगर आम अफ्रीकी अपने देश की सरकार और अमेरिका तथा पशिचमी ताकतों के खिलाफ है। जनप्रदर्शन, विरोध और सशस्त्र विद्रोह की सिथतियां बन गयी हैं।

20 दिसम्बर को राष्ट्रसंघ सुरक्षा परिषद ने माली में विदेशी सैन्य हस्तक्षेप की मंजूरी दे दी है। जिसके अंर्तगत विदेशी सेना, माली सरकार की सेना की मदद करेगी। माली के उत्तरी क्षेत्र में वहां की मिलिटेन्ट ने कब्जा कर लिया है। माली की मौजूदा सिथति पर फ्रांस के द्वारा राष्ट्रसंघ सुरक्षा परिषद में सैन्य हस्तक्षेप का प्रस्ताव लाया गया था। जिसे 1 साल की अनुमति मिल गयी है। किंतु फ्रांस के रक्षामंत्री ने स्पष्ट कर दिया है कि वह माली में फ्रांसीसी सेना नहीं भेजेगा, सिर्फ वैचारिक सहयोग ही दे सकता है।

यह सोचा जा सकता है कि जहां भूख, गरीबी, बेरोजगारी और दमन अपने चरम पर है और जहां से वैशिवक मंदी के खिलाफ, उसकी बाजारवादी आर्थिक नीतियों के खिलाफ बढ़ती हुर्इ जनचेतना है, वहां सैन्य अभियानों से, समस्याओं का समाधान किये बिना कितने समय तक, सिथतियों को अपने नियंत्रण में रखा जा सकता है? सैन्य हस्तक्षेप क्या समस्याओं का समाधान है? जिसके लिये अमेरिकी साम्राज्यवाद अफ्रीकी देशों की सेना को आम जनता और अमेरिकी नीति से असहमत देशों की सरकारों पर लगातार दबाव डालने के लिये प्रशिक्षित कर रही है और उन्हें अपने सैन्य अभियानों में शामिल करने की योजना पर काम कर रही है।

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