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अश्विनी तिवारी की चार कविताएँ

अश्विनी तिवारी फोटो1. काश 

काश की मना कर देता वह
पुराना जंग लगा हंसिया
पकी पीली बालियों को काटने से ,
तलाशता मखमली म्यान
और नक्काशीदार चांदी की मूठ।।
काश की वह जिद्दी भारी हथौड़ा
महसूस करता अपनी हथेलियों के छाले
जिनसे बनाता है कठोर अनगढ़ इस्पात को
उपयोगी….किसी काम लायक ।।
काश की ओढ़ लेती
गंवार लज्जा बेशर्मी की सभ्य स्वीकार्य घूँघट
और बन जाती किसी नवयवना की शील का घातक हथियार।
काश की झोपड़ियां तैयार करते
बहुमत और धकेल देते लोकतंत्र को अट्टालिकाओ से बाहर…..
सपाट कंकरीले जलते हुए संवैधानिक मैदान में।
काश की खो जाता
सोने के सिक्कों का वैभव भटकता वह भी
निरीह भूखे पेट ठिठुरता फटे हाल अभावों के सर्द मौसम में।
किलोलें करती मानवता
खेतों में मुस्काने फलती
भूख की आग बुझाने वाला देव न बनता
आत्महंता लेती तान सीना
मजदूरी जब गर्वित होता सर्वहारा !!

 

2. मैं, शून्य और ब्रह्माण्ड

एक शून्य मस्तिष्क की उलझी धमनियों के बीच
एक विशाल शून्य अतिशय विशाल बिल्कुल शांत
न हवा, न बादल,
न आकाश, न परिंदे, न भाषा,
न संवेदना,
बस एक शून्य
और उस शून्य में भटकता एक छोटा सा बिंदु
उसकी असीम सत्ता को चुनौती देता हुआ
अस्तित्व की एक मात्र परिभाषा परिमेय
और अपरिमेय के बीच का अंतर होने
और न होने के बीच का विभाजक मात्र एक बिंदु
जहाँ सिमटी थी मेरी सुसुप्त चेतना
जो विचर रही थी असंख्य आकाशगंगाओं में,
अनगिनत मंदाकिनियों के बीच
अंडाकार परिपथ पर नाचते हुए
किसी जलते हुए ग्रह के चारों ओर
पथरीली जमीन पर
अचानक फूट पड़े कुछ अंकुर
रेंगने लगे कुछ कीट
मन ने उगा लिए पंख
और उड़ने लगा नीले आकाश में,
रंग-बिरंगे पंछियों के बीच दौड़ने लगा
गीली लिजलिजी ज़मीन पर देखते ही देखते
उसे मिलते गए भाले बर्छियां तलवार फावड़े हंसिया
चेहरे पर अंजुरी भर पानी के छपाके के साथ शुरू हुआ
संतुष्टि को साधने का क्रम
और हर बार कुछ और पाने की चाह चाह ……….
स्वाद की ,ज्ञान की ,सुविधाओं की सरलतम जीवन की चाह
वर्चस्व की, आधिपत्य की
बृहद शून्य गौंड़ हुआ चार कदम की चाह ने ईश्वर बनाया,
नियम बनाये, सरहदें बनायी,
बंदूकें और बम बनाए
और उनसे बचने को बनायी चहारदीवारी
और उसी चहारदीवारी में बैठा मनुष्य असुरक्षित है
अपने ईश्वर के साथ
जंगलों में वीभत्सतम जीवों का शिकारी
खुद से ही बचने के तलाशता है रास्ते अपनी ही मादाओं को नोचता है
और ईश्वरत्व की आड़ में तलाशता है मुक्ति
साला कितना विद्रूप उपहास है लो !
अब सिमटने लगा है शून्य शिराओं और धमनियों में बहने लगा है धूप
दीप-मन्त्र, अजान और न जाने क्या क्या
इतिहास के पलटते पन्नों में दिखने लगे हैं
घोड़े की टापों से कुचले हुए सर, धर्म और सत्ता के नशे में
कटते मरते लोग पेट की आग में
जीवन जलाते लोग मैं भी आ गया हूँ वापस
अपनी लम्बी यात्रा से शायद पागल हूँ ……….
तभी तो उस छोटे से बिंदु में तलाश रहा हूँ
वह बड़ा सा व्यापक शून्य ताकि देख सके
मनुष्यता अपना वास्तविक रूप अपना भगवान्
और धर्म अपना घोषित वर्चस्व और ……………..
ब्रह्माण्ड के अस्तित्व में अपनी सार्थक पहचान |

 

3. बेस्वाद ज़िंदगी

रोज़ सवेरे कानों में आती है एक आवाज़
एक कर्कश आवाज़………
और मै निकल पड़ता हूँ जरूरतों के ठेले पर ।
जहां आलू और प्याज तौलते हैं सामर्थ्य, एक पॉलीथीन में
बांधते हैं औकात और थमा देते हैं मेरे हांथों में
ख्वाहिश पनीर की।
अनायास ही चले जाते हैं जेब में हाथ टटोलते हैं
कुछ खनखनाती खामोशियाँ , और फिर……..
चमकती तश्तरी में सजाता हूँ मसालेदार लटपटा ख्वाब …..
लौट पड़ते हैं कदम इच्छाओं के रसोईघर में,
जहां…….. काटता हूँ जरूरतों की चाक़ू से
जीवन के एक एक अंश का पारिश्रमिक, लगाता हूँ
छौंका अधूरी हसरतो का , खाता हूँ और निकल जाता हूँ ।
क्योंकि बाकी है अभी भूख बहुत कुछ पाने की,
बाकी है अभी सपना …..
डायनिंग टेबल को और सजाने की,
ऊब सा गया हूँ….
जख्मों का निवाला खाते खाते,
बाकी है अभी ख्वाहिश …..
कुछ नयी सब्जियां उगाने की !!

 

4. चलो! धब्बों को साफ़ करते हैं

तुम्हारी जमीन सरकार की
तुम्हारी औरतें सरकार की
तुम्हारे बच्चे सरकार के
तुम्हारा घर कुआँ
तुम्हारी साँसे तक
सरकार की
उस सरकार की
जो तुम्हारी उंगली का कतरा भर धब्बा है
चलो ! धब्बों को साफ़ करते हैं…….

-अश्विनी तिवारी

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2 comments

  1. आशीष मिश्र

    कवि की दृष्टि बहुत साफ़ है, वह अपने चारों तरफ़ की दुनिया को विश्लेषित कर सकता है और अभिव्यक्ति की तड़प भी देख सकते हैं ! बधाई !!

  2. Pratibha gotiwale

    बेहद सशक्त कविताएँ ।

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