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काॅरपोरेट की सरकार कहे जाने पर नाराज मोदी

India's PM Modi speaks at the inaugural session of Re-Invest 2015, the first Renewable Energy Global Investors Meet & Expo, in New Delhi

अपनी सरकार को ‘काॅरपोरेट की सरकार‘ कहे जाने से नाराज नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री की हैसियत से राज्य सभा में कहा- ‘‘क्या स्वच्छता अभियान, जन-धन योजना, स्कूलों में टाॅयलेट, पर ड्राॅप मोर क्राॅप, सभी को घर जैसी योजनायें अमीरों के लिये हैं? दलितों व पिछड़ों को स्वरोजगार देने वाली साढ़े पांच करोड़ इकाईयों को कर्ज के लिये मुद्रा बैंक व डिजिटल इण्डिया भी काॅरपोरेट के लिये है?‘‘

सवालों की शक्ल में फैली हुई उनकी नाराजगी का सीधा जवाब है- ‘‘हां, यह काॅरपोरेट के लिये है। काॅरपोरेट की सरकार को चलाने के लिये है।‘‘

यह बढ़ती हुई आर्थिक एवं सामाजिक असमानता की खायी को सूखे पत्तों से पाटने की ऐसी कोशिश है, जिसका लाभ सरकार को मिलेगा और उन्हीं वित्तीय ताकतों को मिलेगा, जिनके लिये हर एक क्षेत्र में पूंजी निवेश की सुविधायें बनायी गयी हैं, जिनके हित में श्रम कानूनों में संशोधन और भूमि अधिग्रहण कानून को अध्यादेशों से लागू किया गया।

मोदी जी, समाज के आईने में अपनी सूरत कभी-कभार देख लेनी चाहिये, सेहत के लिये अच्छा होता है। खोज-खबर मिलती रहती है। बदलते मौसम का अंदाजा लगता है, और लोगों के मिजाज का भी। लेकिन, आप तो अपने ऊपर इस कदर फिदा हैं, या यूं करा दिये गये हैं, कि आईनों पर अपनी तस्वीरें सटा कर उसे निहारते रहते हैं। आप जहां हैं, वहां होने का यकीन खुद को दिलाते रहते हैं। जब आप होते हैं संसद में, आयोजनों, वैश्विक सम्मेलनों या प्रधानमंत्री आवास में, तब भी खुद को दूर खड़े होकर देखते हुए कहते हैं- ‘‘भाई वाह, मैं तो कमाल का हूं।‘‘ इसके बाद भी खुद को सड़क पर खड़ा देख नहीं पाते। यही कारण है कि आप अपने ही रचे छवि को देख कर भौचक हैं। बढ़-चढ़ कर बोलने की अपनी आदतों को भी आपने खुली छूट दे दी है।

आपको लगता है, कि आपने जो कह दिया, उसे मानना और उस पर विश्वास करना ‘राष्ट्र धर्म‘ है।

लेकिन, ऐसा नहीं है। राष्ट्र और धर्म की धुरी अलग है। उसे एक धुरी पर ला कर कसा गया ‘राष्ट्रधर्म‘ राष्ट्रवाद की ऐसी समझ है, जो सिर से लेकर पांव तक खून से सना है। यह मानवीय गरिमा, वैश्विक राष्ट्रवाद और सामाजिक विकास के विरूद्ध है।

जिन ताकतों ने राष्ट्र, धर्म और नस्ल की श्रेष्ठता से औपनिवेशिक साम्राज्य की स्थापना की, जिन साम्राज्यवादी ताकतों ने नवउदारवादी मुक्त बाजारवाद को जन्म दिया, आज आप उन्हीं ताकतों के साथ हैं, उनके ही वित्तीय हितों से संचालित हो रहे हैं। उन्हीं राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय निजी कम्पनियों के लिये अर्थव्यवस्था का निजीकरण और आर्थिक विकास की दिशा का बाजारीकरण कर रहे हैं। ‘मेक इन इण्डिया‘ का सांचा आपके पास है, फिर भी ‘काॅरपोरेट सरकार‘ होने से आप नाराज हैं। जिसका मकसद देश को एक ऐसे उत्पादन इकाई में बदलना है, जहां सस्ते माल और सस्ते श्रमशक्ति से उत्पादित वस्तु और उत्पादन के साधन पर देश की आम जनता की दावेदारी नहीं, ना ही वह साझेदार है, जिसका मुनाफा तो निजी कम्पनियों के लिये सुरक्षित है, लेकिन जोखिम और निवेशनुमा कर्ज आम जनता के कंधे पर है। आप तो कमाल हैं, मोदी जी, हारे तो हूरे और जीते तो थूरे।

तो चलिये, एक आंख वाले को हम काना नहीं, आपकी खुशी के लिये, उसे समाज के हर एक वर्ग को एक ही नजर से देखने वाला मान लेते हैं। और यह नजर तो आपके पास है ही। फिर, जिसके पास एक नजर है, वह समदृष्टा भी होगा ही होगा। नहीं होगा, तो मीडिया यह काम कर देगी। आपने उन्हें अच्छी तरह साध लिया है। उनके मुंह में इतनी मिठास है, कि वो कडुवाहट को देख कर ही बिदक जाते हैं, मक्खी की तरह गुड़ की भेली पर टूट पड़ते हैं। आपके पास गुड़, खांड, चीनी और ख्याती से लेकर पुरस्कार तक देने के लिये है। आप मानते हैं, कि आप सर्वशक्तिमान हैं।

मोदी जी, लगता है, आप खुश हुए। देखिये न आईने पर सटी आपकी सूरत मुस्कुरा रही है। उसकी समझ में नहीं आ रहा है, कि ‘काॅरपोरोट की सरकार‘ कहे जाने पर आप नाखुश क्यों हैं? क्या आप यह प्रमाणित करने पर तुले हैं, कि आपकी इकलौती नजर में गरीबों के लिये सपना हैं जिसे आप सस्ते में बेचने का विज्ञापन करते हैं। वही मुनाफे का साधन और लालच है। बड़ा चारा है।

चलिये, मान लिये कि माल ज्यादा है, इसलिये आप उसे सस्ते में बेच रहे हैं, जिसका मुनाफा उन्हें मिलता है, जिनके लिये आप सचमुच सपने देखते-बुनते हैं, और सत्ता में अपने बने रहने को सुनिश्चित करते हैं। फिर देश के बहुसंख्यक वर्ग को उसके श्रम को, कच्चे माल की तरह नीलाम करना, जो उनका है, उसे उनसे छीन लेना, यह कहते हुए कहां तक जायज है, कि यही आर्थित विकास की सही दिशा है?

प्रकृति के अकूत सम्पदा को आप बेचेंगे।

मानव श्रमशक्ति को आप बेचेंगे,

उन्हीं की हड़पी गयी जमीन पर कल-कारखाने लगायेंगे, खदानें खोदेंगे, शहर और सड़कें बिछायेंगे, देश और समाज को बाजार बनायेंगे,

और उत्पादन के साधन पर उनका हक छीन लेंगे। यही नहीं निजी वित्तीय पूंजी को इतनी जगह दे देंगे, कि आम आदमी के लिये जगह ही न बचे, और यह सब करते हुए यदि आप उसके लिये तिनका हिला कर कहेंगे, कि यह सब उनके लिये है, सरकार काॅरपोरेट की नहीं उनकी, उनके लिये है, तो लोग आपको क्या कहेंगे?

आपने स्वच्छता अभियान की शुरूआत की।

बड़ा अच्छा किया।

दिन 2 अक्टूबर 2014 था। गांधी बाबा हाईजैक हो गये। जनता के हाथों में झाडू थमा दिया गया। अधिकारियों से लेकर राजनेता और मंत्रियों और कई गणमान्य लोगों को आपने नवरत्न बना दिया। मीडिया में खूब हल्ला मचा। जय-जय कार हुआ। मेडिसन स्क्वाॅयर और स्वच्छता अभियान के बीच अमेरिका में आपने क्या किया? यह हल्ला के हवाले हो गया।

बौद्धिक सम्पदा और भारत के पेटेंट लाॅ में भारी संशोधनों को आपने ओबामा के सामने स्वीकृति दी, दवा उत्पादक अमेरिकी कम्पनियां खुश हुईं। भारत के जेनरिक दवाईयों के दर्जा का घटना तय हो गया। दवाईयां महंगी हो गयीं। आम जनता के हित में यह ‘कमाल‘ हुआ। आम जनता खुश हुई।

फिर आपकों यह तो बताना ही चाहिये कि आपके स्वच्छता अभियान का प्रभाव देश की आम जनता के आर्थिक स्थिति पर क्या पड़ेगा?

शायद कुछ नहीं।

‘जन-धन योजना‘ के तहत जमा राशि का आप क्या करेंगे?

विवादहीन रूप से देश की आर्थिक तरक्की के लिये काम करेंगे, और मेक इन इण्डिया के मशीनी बाघ की सेहत बनायेंगे। आधारभूत ढांचे का निर्माण करेंगे। जिसका लाभ आम जनता को मिलेगा।

क्या सचमुच मिलेगा? जब अर्थव्यवस्था की गाड़ी निजीकरण की पटरी पर दौड़ रही है, तब मुनाफा आम जनता को कैसे मिलेगा? देश और समाज को कैसे मिलेगा? उन वित्तीय विश्व विजेताओं का क्या होगा, जो दुनिया की अर्थव्यवस्था पर अपना आधिपत्य चाहता है?

हां, यह अच्छी बात है, कि स्कूली बच्चे अब टाॅयलेट में पेशाब करेंगे। दीवारों और ओने-कोने को राहत मिल जायेगी। बड़े शौचालयों का मुंह देखेंगे। हाजत-पानी के दौरान भी आपका गुण गायेंगे। आपको दुआ देंगे।

और जहां तक ‘पर ड्राॅप मोर क्राॅप‘ का सवाल है, और कृषि-उत्पादन बढ़ाना ही इस नारानुमा योजना का मकसद है, तो आपने किसानों से किये गये किसी भी वायदे को अब तक पूरा नहीं किया है। इसके विपरीत उन्हें दी जाने वाली सब्सिडी से लेकर कृषि उत्पादन के खरीदी मूल्यों पर आपने, वो हमले किये हैं, जिसका लाभ मण्डी और बाजार को मिलता है, किसानों को नहीं। कृषि को उद्योग पर निर्भर रखने की नीति भी आपकी है। फिर भी आप कहते हैं, कि ‘‘कोई आपको बताये, कि आप किसान विरोधी कैसे हैं?‘‘ आपने तो गांवों को गोद लेने की राह दिखायी है। यही तो ग्रामीण क्षेत्रों के विकास की गोद जी गयी योजना है। जिसके माई-बाप आप हैं।

अब आप ही बताईये जहां पूंजी की प्रधानता होगी और कृषि उद्योग पर निर्भर होगा, वहां किसानों के लिये जीने की गुंजाईशें नारों से तो नहीं बनेंगी।

फिर आप दलितों और पिछड़ों के लिये जिस पांच करोड़ इकाईयों के लिये मुद्रा बैंक से कर्ज की जिस सुविधा का जिक्र कर रहे हैं, उसने तो मुझे हैरत में डाल दिया है। क्या यह बताने की जरूरत है, आपको कि जहां भी बैंक है, वहां वित्तीय ताकतें हैं। और जहां वित्तीय ताकतें हैं, वहां उनके लिये भारी मुनाफा है। आम जनता तो पिसने के लिये ही होती है।

इसलिये, आप अपनी नाराजगी को निजीकरण का कपड़ा पहना दीजिये, उसकी नग्नता भी ढंक जायेगी और आप खम ठोंक कर कहने लायक हो जायेंगे, कि काॅरपोरेट सरकार ही मुक्त बाजार व्यवस्था का सच है, और आप सच से नजरें नहीं चुराते। आपके इस ‘‘नमो मंत्र‘‘ को मीडिया अच्छे से उठा लेगी। वह यह प्रमाणित कर देगी कि काॅरपोरेट की सरकार का होना देश और देशवासियों के हित में है। बेवजह आप नाराज हो रहे हैं। काॅरपोरेट की सरकार होना तगमा है, तगमा लगा कर घूमिये। कोई हर्ज नहीं है। जब नमो मंत्र टंका, उपहार में मिला 10 लाख का सूट करोड़ो में नीलाम हो सकता है, तो नीलामी में लगा देश तो न जाने दौलत के कितने ढूह लगायेगा?

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