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दीपिका केसरी की तीन कविताएँ

दीपिका केसरी फेसबुक पर कविताएँ लिखती हैं, इनकी कविताएँ पाठकों को आकर्षित करती हैं क्यों कि इनकी कविताओं में जो कंटेंट हैं वे बहुत मजबूत और प्रासंगिक हैं ।

-नित्यानन्द गायेन

1. स्त्रीदीपिका केसरी

तुम अपने शब्दकोश से
स्त्री शब्द हटा दो,
वहाँ लिख दिया करों
मात्र एक अधमरी
देह……..
जिसे स्त्री कहते हैं !!

 

2. स्त्री मुक्ति की कविताएँ

वो कवि था
स्त्री मुक्ति की कविताएँ
लिखता था
कुछ पुरूष थे
स्त्री मुक्ति की बातें
करते थे
कुछ स्त्री थी
वो भी स्त्री मुक्ति
की बातें करती थी,
बस ये बातें थी
जो रोज की जाती थी
कहीं जाती थी
सुनी जाती थी ।
बस ये बात समझ के परे थी
मुक्ति का सही अर्थ क्या हैं
स्त्री को किससे
क्यों , किसलिए मुक्ति चाहिए,
अगर स्त्री इंसान हैं
तो वो भी मुक्त हैं ।
अर्थात्
मुक्ति की बातें करने वाले ही
स्त्री को मुक्त नहीं समझते
तभी तो करते बात
स्त्री मुक्ति की ।

 

3. हर परिभाषा से अलग हैं स्त्री

रोज जश्न मनाती हैं
स्त्रियाँ
एक खास दिन की किसे जरूरत हैं ।
हर परिभाषा से अलग हैं स्त्री
फिर भी पता नहीं बेहिसाब परिभाषा
से बंधी हैं स्त्री ।
मैं एक इंसान हूँ
फिर एक स्त्री
और उसके बाद हैं
सारे रिश्ते ।
संक्षेप में
किसी भी प्रकार शुभकामनाओं
की जरूरत नहीं हैं ।
मुझे क्वीन बनने के लिए
किसी भी किंग की जरूरत
नहीं ।

-दीपिका केसरी

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3 comments

  1. आशीष मिश्र

    अच्छी कविताएं ! पहली कविता ख़ास अच्छी लगी। दीपिका जी को हार्दिक बधाई!

  2. Banwari Kumawat Raj

    मौजूदा समय में कविताओं के नाम पर शब्द-जाल अधिक बुने जा रहे हैं…तुम्हारी कविताओं में ऐसा नहीं है…तुम ज़रूरतभर के सरल-सहज शब्दों में गम्भीर बात कह जाती हो…शब्दों की सजावट से दूर जीवंत संवेदनाओं से सराबोर होती हैं तुम्हारी कविताएं…जो कविता पढऩे की चाह को जिंदा रखती हैं…तुम्हारी कविताओं की ताकत चमत्कृत करती है दीप….लिखती रहो…ताकि बची रहे हम सबमें थोड़ी सी कविता

  3. RAMESH KUMAR GOHE

    आपकी कवितायेँ अच्छी हैं |वास्तव में स्त्री विमर्श सिर्फ बहसों तक ही सिमट कर रह गया है |कोई भी पुरुष अपने घर से स्त्री विमर्श की शुरुआत नहीं करना चाहता |साहित्यकार तो और भी नहीं कई साहित्यकार को मैंने भी देखा है हिन्होंने स्वयं स्त्री विमर्श पर किताबें लिखीं हैं ,घर में अपनी पत्नी से बात तक नहीं करते |खैर….!

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