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जर्मन लोकतंत्र पर फासिस्टवाद का खतरा एवं समाजवादी विकल्प

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यूरोपीय देशों का आर्थिक संकट अब राजनीतिक समाधान की ओर बढ़ रहा है। एक बार फिर फासिस्टवाद के विरूद्ध समाजवादी क्रांति की सोच बढ़ रही है। लोगों को यह लगने लगा है, कि पूंजीवादी व्यवस्था में सुधार की संभावनायें खत्म हो गयी हैं, और सामाजिक विकास के लिये समाजवाद के अलावा और कोई विकल्प नहीं है। ग्रीस में चुनाव के बाद रेडिकल-वामपंथियों का सत्तारूढ़ होना, परिवर्तन की नयी गुंजाइशें बना रही है। जिसे हम ‘‘21वीं सदी के समाजवाद‘‘ या ‘‘विकास के जरिये समाजवाद‘‘ या ‘‘यूरोप में समाजवाद की वापसी‘‘ के रूप में देखें या न देखें, यह हमारे अपने दृष्टिकोंण पर निर्भर करता है, किंतु एक बात बिल्कुल साफ है, कि जनविरोधी सरकारों के विरूद्ध जनसमर्थक सरकारों के लिये लोगों की तलब बढ़ी है।

पूंजीवाद का वित्तीय एकाधिकारवाद की ओर बढ़ने की परिस्थितियों में राजनीतिक रूकावटें पैदा हो गयी हैं। आर्थिक मंदी की चपेट में आने के बाद ऐसा पहली बार हुआ है, कि ग्रीस की आम जनता देश की नयी सरकार के पक्ष में सड़कों पर उतरी है। बोस्निया और हर्जोगोविना के मजदूरों ने गये साल जो प्रदर्शन किये और सड़कों-चैराहों पर सरकार के गठन की जो नयी पेशकश की, उसे भी नया आधार मिला है। यूरोपीय संघ संकटग्रस्त हुआ है और ‘ट्रोइका‘ -यूरोपीय संघ, यूरोपीय सेण्ट्रल बैंक और विश्व बैंक- के खिलाफ जनचेतना में इजाफा हुआ है। जनविरोधी सरकारों के खिलाफ भी नयी चुनौतियां खड़ी हो गयी हैं।

यूरोपीय संघ पर अपनी पकड़ बना कर रखने वाले जर्मनी में भी ऐसी चुनौतियां खड़ी हो गयी हैं।

‘‘फ्री यूनिव्हरसीटी आॅफ बर्लिन‘‘ द्वारा जारी किये गये, एक अध्ययन के अनुसार- ‘‘20 प्रतिशत जर्मनवासियों का मानना है, कि ‘‘सुधानों से लोगों के जीवन में कोई परिवर्तन नही होगा। सिर्फ क्रांति ही समाज का पुर्ननिर्माण कर सकती है।‘‘ जारी किये गये इस अध्ययन का शीर्षक है- ‘‘अगेन्स्ट द स्टेट एण्ड कैपिटल टू रिवोल्यूशन‘ जिसे पूंजीवाद, फासीवाद और नस्लवाद के विकल्पों के आधार पर विश्लेषित किया गया है। जिसके निष्कर्ष के रूप में माना गया है, कि ‘‘जर्मनी में अनुमान से ज्यादा वामपंथी सोच रखने वाले लोग हैं।‘‘

बर्लिन की दीवार गिराये जाने के 25 सालों बाद भी पूर्वी और पश्चिमी जर्मनी के बीच वैचारिक विभाजन बाकी है। पूर्वी जर्मनी में आज भी वामपंथी -समाजवादी सोच के समर्थक ज्यादा हैं। अध्ययन के अनुसार- ‘‘पूर्वी जर्मनी में रहने वाले 60 प्रतिशत लोगों का मानना है, कि समाजवाद पूंजीवाद से श्रेष्ठ विचार और बेहतर समाज व्यवस्था है, जबकि पश्चिम जर्मनी में रहने वाले 37 प्रतिशत जर्मन ऐसा मानते हैं। लगभग 50 प्रतिशत लोगों का मानना है, कि पुलिस प्रशासन और सरकार के द्वारा वामपंथी-समाजवादी सोच रखने वाले, मौजूदा व्यवस्था से असंतुष्ट लोगों पर ‘सर्विलांस‘ बढ़ा दी गयी है। लगभग एक-तिहाई जर्मन को इस बात का डर है, कि अपने देश के नागरिकों की खुफियागिरी करा कर देश तानाशाही की ओर बढ़ रहा है।‘‘

इस ‘बहु-वर्षीय रिसर्च प्रोजेक्ट‘ को फेडरल प्रोग्राम- ‘‘डेमोक्रेसी इनिसियेटिव स्ट्रेन्थस्‘‘ के अंर्तगत आयोजित किया गया था। जिसमें 14,000 लोगों को शामिल किया गया था।

20 प्रतिशत जर्मन लोगों का कहना है, कि वो जर्मनी में नव फासिज्म के उदय को वास्तविक खतरा के रूप में देखते हैं, जबकि 48 प्रतिशत लोगों का मानना है, कि गैर जर्मन विदेशियों से घृणां करने की समझ अभी भी जर्मन लोगों में है।

62 प्रतिशत जर्मन अपने देश की वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था के बारे में मानते हैं, कि ‘‘जर्मनी में वास्तविक लोकतंत्र नहीं है, क्योंकि यह पूंजी के द्वारा संचालित है।‘‘ कह सकते हैं, कि निजी वित्तीय पूंजी ने अमेरिकी लोकतंत्र की तरह ही जर्मन लोकतंत्र को अपने गिरफ्त में ले लिया है। जिसकी आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक विसंगतियां उभरती जा रही हैं। आर्थिक असमानता ने सामाजिक असमानता को बढ़ा दिया है, और समाजार्थिक असमानता ने राजनीतिक असंतोष को परिवर्तन की अनिवार्यताओं से उसे जोड़ती जा रही है।

जर्मनी में इस समय 12.5 मिलियन लोग गरीबी की सीमारेखा से नीचे जी रहे हैं। यह आंकड़ा जर्मनी के पुर्नएकीकरण के बाद का सबसे सर्वोच्च आर्थिक असमानता का आंकड़ है। वर्तमान में जर्मनी का गरीबी स्तर 15.5 प्रतिशत है। गरीबों और धनवानों के बीच की दूरियां बढ़ गयी हैं। इन दूरियों के अलावा जर्मनी के अलग-अलग प्रांतों के आम समूह के बीच की दूरिया बढ़ी हैं। विकास एवं समृद्धि की क्षेत्रीय असमानता भी बढ़ी है। संगठन ने बताया है, कि किसी भी व्यक्ति को गरीबी की सीमा रेखा के नीचे तभी रखा जाता है, जब उसकी आय निर्धारित मध्य आय से 60 प्रतिशत कम होती है।

प्रति व्यक्ति 892 यूरो और 4 लोगों के परिवार के लिये, जिसमें 14 साल से कम उम्र के 2 बच्चे हों के लिये 1873 यूरो गरीबी की सीमारेखा का निर्धारण जर्मनी में किया गया है।

बरेम, बर्लिन और मेक्लेन्बर्ग -वेस्टर्न पोमरेनिया उच्च गरीबी स्तर वाले राज्य हैं, यहां गरीबी दर 20 प्रतिशत के स्तर को पार कर गया है। बाडन-वर्थेम्बर्ग और बवेरिया में सबसे ज्यादा अमीर लोग रहते हैं, इन राज्यों में गरीबी दर 11 प्रतिशत से ज्यादा है। आम लोगों के अलावा जर्मनी में मजदूर वर्ग का जीवन स्तर तेजी से गिरता जा रहा है। लगभग 3.1 मिलियन कामगर गरीबी की सीमारेखा से कम वेतन पाते हैं। इन्हें अपना गुजारा करने के लिये अपने खाने और घर को गर्म रखने के खर्च में भारी कटौतियां करनी पड़ती हैं।

‘‘फेडरल स्टेटिस्टिक्स आॅफिस‘‘ के आंकड़ों के अनुसार- ‘‘जर्मनी में 2008 से 2013 के बीच गरीबी में जीने वाले मजदूरों की संख्या में 25 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।‘‘ यह वृद्धि दर इस बात का प्रमाण है, कि आम जर्मन और मजदूर वर्ग के लिये जीने की परिस्थितियां लगातार बिगड़ती जा रही हैं, जो उसके औद्योगिक विकास की दिशा और बढ़ती हुई अर्थिक असमानता को भी दर्शाता है। यह वर्ग अपनी मूलभूत जरूरतों को भी पूरा नहीं कर पा रहा है। गरीबी के साथ बेरोजगारी दर लगातार बढ़ रही है, और काम करने की परिस्थितियां भी खराब हुईं। उनके पास अपनी आर्थिक सुरक्षा के लिये कोई उपाय नहीं है। वे बेघर-बार हो रहे हैं।

‘हाउस होल्ड सर्वे-2013‘ के अनुसार- ‘‘साल 2008 से 2013 के बीच 5,30,000 से ज्यादा कम आये वाले मजदूरों की स्थिति यह है, कि वो एक दिन के बाद दूसरे दिन ही पूरा खाना खाने योग्य आय कर पाते हैं।‘‘ मतलब खाद्यान्न के मामले में वे अपनी आधी जरूरतें ही पूरी कर पाते हैं। 4,17,000 से ज्यादा लोग ऐसे हैं, जो अपने घर को गर्म करने के लिये ईधन की व्यवस्था नहीं कर सकते। 3,80,000 कामगरों का कहना है, कि वो समय पर अपने मकान का किराया नहीं दे पाते।

जबकि जर्मनी के 10 प्रतिशत धनवान लोगों के पास कुल प्राइवेट हाउसहोल्ड (परिवार) का 63 से 74 प्रतिशत सम्पत्ति है। इस तरह 4 लाख परिवार के पास बाकी के 3.5 मिलियन परिवारों से ज्यादा सम्पत्ति है।

जर्मनी के 1 प्रतिशत सबसे धनवान लोगों के पास 31 से 34 प्रतिशत सम्पत्ति है। और इन 1 प्रतिशत में भी इस सबसे बड़े लोगों के पास 14 से 16 प्रतिशत के बीच सम्पत्ति है। ये लगभग 80,000 लोग जर्मनी के सबसे गरीब 40 मिलियन लोगों से ज्यादा अमीर हैं।

साल 2002 में जर्मनी में 34 बिलेनियर्स थे, जोकि साल 2012 में बढ़ कर 55 हो गये। 2003 में इनकी कुल संयुक्त सम्पत्ति 130 बिलियन यूरो थी, जोकि 2013 में बढ़ कर 230 बिलियन यूरो हो गयी। सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है, कि 10 सालों में पूंजी का केंद्रियकरण किस गति से हुआ है।

2008 के वित्तीय संकट के बाद सरकारों ने वित्त बाजार में लगभग 12 ट्रिलियन डाॅलर डाला। बैंक बेलआउट जो कि लगभग शून्य प्रतिशत ब्याज दर पर दिया गया, इसके अलावा सेण्ट्रल बैंक द्वारा मुदा की भारी मात्रा में छपाई की गयी। इस क्वांटेटिव इसिंग का लाभ भी समाज के उसी वर्ग को मिला जिनकी सम्पत्ति में 10 सालों में भारी वृद्धि हुई। परिणाम स्वरूप जर्मनी में सामाजिक एवं आर्थिक असमानता इतनी बढ़ गयी कि अब वित्तीय पूंजी के खिलाफ राजनीतिक असंतोष विस्फोटक हो गया है। जिसे आर्थिक सुधारों के रूप में प्रचारित किया गया।

यही कारण है, कि आम जर्मनवासी यह मान कर चल रहा है, कि सरकार के द्वारा किये गये सुधारों का लाभ आम लोगों को नहीं मिलेगा। उनकी यह स्पष्ट धारणां बन गयी है, कि जर्मन लोकतंत्र पर वित्तीय तानाशाही का खतरा बढ़ गया है। उनके सामने समाजवादी क्रांति और समाजवादी समाज व्यवस्था का विकल्प है।

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