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डाॅ. रमेश कुमार गोहे की तीन कविताएं

1. महुआ बीनते सतपुड़ा के गोंडDr. Ramesh Kumar Gohe

(1)
मेरे ग्राम में ,
तराजू पर चढ़ा हुआ महुआ
कभी नहीं बदलता किलोग्राम में !
साहूकार उसे अपने जादुई करिश्मे से बदल देता है,
चंद सम रुपयों में,
जिनका दस से लेकर कभी-कभी सौ तक
पहुँच जाता है आंकड़ा ,
पर कभी नहीं होता विषम !

(2)
सतपुड़ा के मोटे-काले–तगड़े गोंड
मुंह इन्धारे
टायर की चमरौन्धी चप्पल पहनकर
सिर पर टोकरी औंधी ओढ़कर
लाठी और केतली पानी की लेकर
हाका करते
निकल पड़ते
बीहड़ जंगल में …
झुके-झुके,
होते औंधे-उबड़े,दोपहर तक
महुआ बीनते सतपुड़ा के गोंड
और लौटते हैं सूरज को लाल करके
सिर पर महुआ की टोकरी,
महुओं से चूता रस ,
खारा पसीना और अपने लड़खड़ाते कदम लेकर !

(3)
सतपुड़ा के गोंड
दोपहर में पेज पीकर ,
घुँघनी का चखना कर
ओसारे में कथड़ी बिछाकर
उघड़ा तनकर
लेटते हैं आँगन में सूखते हुए महुओं की रखवाली करने !
लेटे-लेटे कभी झपकी लग जाती
और आवारा मवेशी पिल पड़ते
इनके सूखते हुए महुओं पर !

(4)
पीले महुओं को सूखते हुए देखकर
ख़ुशी से हरा हो जाता है
बीनने वालों का मन |
सूखकर चिपटा हुआ महुआ लेकर
हाट बाजार के दिन
गांवों से निकल पड़ते हैं कतार में
सिर पर छिरे से बंधी महुआ की गट्ठीयां लेकर
ये सतपुड़ा के गोंड
और दुकानदार–साहूकार का तराजू
इन वजनदार गट्ठीयों को बदल देता है चंद सम रुपयों में !
मेरे ग्राम में तराजू पर चढ़ा हुआ महुआ
कभी नहीं बदलता किलो ग्राम में !

 

2. कुत्ता समाज

एक कुत्ता मुझसे सटकर,कूं कूं..करता,दूम हिलाता
जैसे मैं मालिक हूँ उसका
जबकि अपरिचित शहर,
अपरिचित मोहल्ला,और अपरिचित गली !

मैं आश्चर्य चकित था कि पहली बार,
कोई अपरिचित कुत्ता मुझ पर भूंका नहीं है
अपनी गली में कुत्ता भी शेर होता है
कहावत से हम सब वाकिफ हैं

नई जगह पर कई बार
कुत्तों के भय से रूहें कांपी हैं हमारी
किन्तु यह क्या
वहीँ गली के सामने तिमंजिली ईमारत पर
एक कुत्ता हम दोनों को देखकर
रौबदार आवाज में गुर्राता है, भूंकता है

उसकी आवाज में सिकंदर का साहस था
गजनी सा पराक्रम था
जिसे देखते ही मेरी रूह कांप गई
उसका रूप एकदम काला किसी कोबरा नाग की तरह
जिसे देखने में भी भय,और उसके दंश का भी भय

दबंगई आवाज वह फिर गुर्राया
मैं समझ नहीं पाया
वह मेरे ऊपर या मेरे बाजु में खड़े,
कुत्ते को देखकर गुर्राया

अचानक मुझे एक कहावत याद आयी
बाभन कुत्ता नाइ जाति देख गुर्राई
मैं समझ गया यहाँ भी जाति का मामला है
कुत्ते का कुत्ते से बैर होगा
यह कुत्ता समाज का मामला है
कुत्तों के समाज से मुझे क्या लेना देना मैं तो आदमी हूँ
यह सोच मैं आगे बढ़ना ही चाहता था,
कि कुत्ता एक बार फिर गुर्राया

मेरे दिमाग में एक प्रश्न आया
वही कुत्ता मुझे देखकर क्यों गुर्रा रहा है
जबकि परिचय से इस कुत्ते से भी नहीं मेरा
फर्क बस इतना है कि वह ऊपर है ,यह नीचे है

ऊपर से कुत्ता फिर गुर्राया
मुझे भेद समझ में आया
ऊपर वाले का मालिक हमेशा से एक है
जबकि नीचे वाले ने हर आते जाते लोगों को,
मालिक समझने की भूल की
दोनों में नस्लीय भेद है
यह देशी,वह विलायती

कुत्ता समाज में भी कितना भेदभाव है
बिलकुल पूंजीपति और दलित की तरह
अमीरी और गरीबी रेखा की तरह
क्या कुत्ता समाज भी,
मानवी सभ्यता की तरह विकसित हो रहा है ?

वह भी नीचे वाले कुत्ते को उसी तरह देखता है
जैसे ऊपर वाला आदमी नीचे वाले आदमी को देखकर सोचता है
कितना छोटा है,कितना ओछा है !

 

3. आदिवासी लड़कियां

(1)
सिर पर लकड़ी के गट्ठे का बोझ लादकर
सुबह सुबह जब एक के पीछे एक कतार में
निकलती हैं आदिवासी लड़कियां
तो मीडिया का एक आदमी मुंह इन्धारे फ्लैश चमकाकर
मिचमिचाती आँखों से खिचता है उसकी एक अधनंगी तस्वीर
घुटने के ऊपर मेहरुनी स्कूली स्कर्ट
सफ़ेद हाफ शर्ट,नंगे पैर,फटी एडियाँ,पपड़ाये ओठ
सीकर बूंद से गलों पर गिरी बालों की लटाएँ
सिर पर सागौन के पत्तों से बनी चुमर
और चुमर के ऊपर रखे लकड़ी के गट्ठे का बोझ

दूसरे दिन अखबार में छपती है खबर
जंगल से चोरी लकड़ियाँ
जंगल से रोज शहर आती लकड़ियाँ
प्रशासन बेखबर,
रोज शहर में बिकती जंगल की लकड़ियाँ !

(2)
सिर पर लकड़ी का गट्ठर लादकर
सुबह सुबह जब कतार में चलती है
आदिवासी लड़कियां
बीच शहर से जेल के सामने से
कलेक्ट्रेट के सामने से
नंगी पैर लड़कियां
उनके पन्तिबद्ध चलने से
बन्ने वाली कतार लगती है
किसी रेल मॉल गाड़ी की तरह
फर्क सिर्फ इतना होता है
रेल गाड़ी और लड़कियों में
ये लौह पद गामिनी नहीं होती
न ही इनके पैरों में चप्पल होती है
सिर पर लकड़ी के गट्ठे का बोझ लादकर
या की भूख का बोझ लादकर
रोज निकल पड़ती है ये लड़कियां
गोंड लड़कियां आदिवासी लड़कियां

दोपहर को घर पंहुचते-पंहुचते
जंगली रास्ते में ना जाने क्या-क्या बेचती
लुटती लुटाती,बेआबरू होकर
दस रूपये का नोट लेकर
घर पहुंचती ये लड़कियां

अखबार में रोज छपता है
जंगल से लकड़ी चोरी करती लड़कियां
किन्तु कभी नहीं छपता
शहरी दरिंदों के द्वारा
जंगल में रोज बलात्कार की जाने वाली लड़कियां
जीवन से रोज लड़कर बचती लड़कियां
10 रूपये में आबरू बेचती लड़कियां

स्कूल जाने की उम्र में
जंगल से लकड़ी बीनकर बेचती लड़कियां
बारह साल की उम्र में माँ बनती जंगल की लड़कियां
दो-चार हजार में जीवन बेचने वाली लडकियाँ

अखबार की दृष्टि अभी इतनी सूक्ष्म नहीं हुई है
कि जंगल की लड़कियों का दर्द देख सके !
जंगल में पैदा होने का मूल्य इन्हें ऐसे चुकाना पड़ेगा
कहाँ जानती थी ये जंगल में बड़ी होती
आदिवासी लड़कियां,गोंड लड़कियां !

-डाॅ. रमेश कुमार गोहे

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4 comments

  1. अमन ऋषि साहू

    महुआ बीनकर…..लकड़ी ले जा कर…जिंदगी की हसींख़ुशी का मोल लगाकर……
    जंगल की लाचार पर गोरखधंधे का खेल….

    अति सुंदर…

  2. जंगल से चोरी लकड़ियाँ
    जंगल से रोज शहर आती लकड़ियाँ
    प्रशासन बेखबर,
    रोज शहर में बिकती जंगल की लकड़ियाँ !
    शसन को इस पर ात्यधिक ध्यान ओउर आम आदमि को इसके लिये कुच करना होगा.आप्कि कवितअ मे स्त्यता है स्र्र्

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