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मोदी सरकार के खेमे में वित्तीय तानाशाही और राजनीतिक एकाधिकार

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अध्यादेशों से लाभ विधेयक पर वृहंस, मोदी सरकार की अर्थनीति है, जिसे मोदी जी आर्थिक विकास और देश के लिये जरूरी मानते हैं। यही उनकी गंभीरता है।

भूमि अधिग्रहण के बारे में केंद्र की मोदी सरकार गंभीर है, क्योंकि, उसके सिर पर काॅरपोरेट जगत की तलवार टंगी है, और वैश्विक वित्तीय ताकतों का हित सवार है। वह न तो इन ताकतों के हितों की अनदेखी कर सकती है, ना ही तलवार के भय से मुक्त हो सकती है। यही कारण है, कि सरकार एक और पूंजी निवेश के हर एक द्वार को, बहुमत में होने के बाद भी, अध्यादेशों से खोलते हुए चल रही हैं, वहीं दूसरी ओर चुनावी लोकतंत्र के भरम को बनाये रखने के लिये आर्थिक विकास का ऐसा तिलस्म रच रही है, कि सामाजिक विकास की वास्तविक दिशायें राष्ट्रवाद की गलियों में भटक जायें। मोदी के मूल में वित्तीय तानाशाही और राजनीतिक एकाधिकार है।

सच यह है, कि सरकार अपनी जन विरोधी नीतियों को राष्ट्रीय हितों के सांचे में ढ़ाल रही है। यह प्रमाणित कर रही है, कि राष्ट्रहित सर्वोपरी है। राष्ट्र की सर्वोच्चता के पीछे, जन की सर्वोच्चता का अंत हो रहा है। जिसका सीधा सा मतलब है, कि वित्तीय तानाशाही और राष्ट्रवादी एकाधिकार की फासिस्ट सोच का विस्तार तेजी से हो रहा है। इस तरह सरकार के हाथों में असीम वैधानिक अधिकार और राज्य के नियंत्रण से बाहर वित्तीय पूंजी को खुली छूट मिल रही है। कह सकते हैं, कि लोकतंत्र पर वित्तीय तानाशाही की वरियता स्थापित हो रही है। राजनीतिक रूप से यह उभरता हुआ फासिस्टवाद है। जो संसद के मौजूदा सत्र में आक्रामक नजर आया।

भूमि अधिग्रहण विधेयक पर चर्चा करने से पहले भारत में उभरते हुए फासिस्टवाद का जिक्र जरूरी है, जिसने लोकतंत्र की सर्वोच्च कार्यपालिका में अपने को खुलेआम किया। प्रधानमंत्री बने नरेंद्र मोदी ने उसे राष्ट्रवाद की चाशनी में डुबा कर पेश किया।

27 फरवरी 2015 को नरेंद्र मोदी ने संसद में कहा-

‘‘मेरी सरकार का एक ही धर्म है- इण्डिया फस्र्ट।

मेरी सरकार का एक ही धर्मग्रंथ है- भारत का संविधान।

मेरी सरकार की एक ही भक्ति है- भारत की भक्ति।

मेरी सरकार की एक ही पूजा है- सवा सौ करोड़ देशवासियों का कल्याण।

मेरी सरकार की एक ही कार्य शैली है- सबका साथ सबका विकास।

इसलिये हम संविधान की सीमा में रह कर देश को आगे बढ़ाना चाहते हैं।‘‘

सदन में चुप्पी नहीं थी, लेकिन मीडिया ने इसे ‘विपक्ष की बोलती बंद‘ करार दिया। उन्होंने यह कहा कि ‘‘प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हिसाब चुकता कर दिया।‘‘ विपक्ष के आरोपों और मोदी सरकार को काॅरपोरेट की सरकार मानने वालों को खारिज कर दिया। मीडिया ने जनहितों के खिलाफ मोदी का समर्थन किया। इस समझ पर हमला किया गया कि श्रम कानून में किये गये संशोधनों की तरह ही भूमि अधिग्रहण विधेयक का नया प्रस्ताव देश की आम जनता के विरूद्ध सरकार काॅरपोरेट जगत के हित में काम कर रही है।

जिस संविधान को नरेंद्र मोदी धर्मग्रंथ बता रहे हैं। वह संविधान धर्म ग्रंथ नहीं बल्कि देश की राजनीतिक संरचना का लोकतांत्रिक आधार है, जिसका उल्लंघन खुलेआम हो रहा है। उसके लोक कल्याणकारी दिशा को अवरूद्ध किया जा रहा है। देश को आम जनता की पाली से निकाल कर उन लोगों की पाली में खड़ा किया जा रहा है, जो उसके वैश्विक खरीददार हैं। जिनके लिये राष्ट्रवाद आम जनता को वित्तीय तानाशाही के सांचे में ढालना है।

नरेंद्र मोदी ने संसद में राजनीतिक दलों को और जन प्रतिनिधियों को राजनीतिक खिलवाड़ बना दिया। उन्होंने खुले तौर पर संसद में देश की आम जनता को ‘‘राजनीतिक धोखे देने का प्रस्ताव रखा। प्रधानमंत्री बने नरेंद्र मोदी ने भूमि अधिग्रहण विधेयक पर राजनीतिक दलों से समर्थन मांगते हुए कहा- ‘‘मौजूदा बिल में किसानों के खिलाफ कोई प्रावधान होगा, तो हम उसे बदलने को तैयार हैं। इसे प्रतिष्ठा का विषय मत बनाइये। श्रेय राजग सरकार नहीं लेगी। बाहर प्रदर्शन कीजिये पर संसद में विधेयक पारित कराईये, ताकि राज्य के विकास का रास्ता खुले।‘‘

‘‘बाहर प्रदर्शन, भीतर समर्थन‘‘ का यह सिद्धांत क्या देश की आम जनता को धोखा नहीं है?

क्या यह जनता को फुसलाये रखने और संविधान की मूल भावनाओं को धोखे में डालना नहीं है?

क्या यह ऐसे लोकतंत्र का खुला मसौदा नहीं है, जिसमें आम जनता के विरोध का कोई वास्तविक महत्व नहीं है?

क्या यह विरोध और समर्थन को अर्थहीन बनाना नहीं है?

यह पूंजीवादी लोकतंत्र का ‘रिपब्लिकन‘ और ‘डेमोक्रेटिक‘ छाप ऐसा प्रस्ताव है, जिसमें जन भावनाओं के लिये कोई जगह नहीं है।

देश की संसद में नरेंद्र मोदी के इस प्रस्ताव को विपक्ष ने अपनी स्वीकृति नहीं दी, शायद यह अच्छी बात है, लेकिन अर्थहीन संशोधनों के साथ बहुमत की सरकार ने लोकसभा में भूमि अधिग्रहण विधेयक को ध्वनिमतों से अपनी स्वीकृति दे दी। उसे पारित मान लिया गया।

मीडिया ने विपक्ष की आलोचना की, अपने को राजनीतिक विश्लेषक और विशेषज्ञ समझने वाले लिक्खाड़ों ने मोदी का समर्थन किया। ‘मेक इन इण्डिया‘ की जय और आर्थिक विकास, पूंजी निवेश को सुनिश्चित बताया। विकास दर की बातों से कर्ज और आर्थिक अनिश्चयता और सट्टेबाज अर्थव्यवस्था के निजीकरण की नीति को दबा दिया गया।

भूमि अधिग्रहण विधेयक को सिर्फ किसानों के हित-अहित से जोड़ कर देखने की सोच को विरोध-समर्थन का आधार बनाया गया।

क्या वास्तव में भूमि अधिग्रहण- सिर्फ किसानों का मामला है?

क्या श्रम कानून में किये गये संशोधनों का प्रभाव सिर्फ श्रमिकों पर पड़ेगा?

क्या यह समाज के बहुसंख्यक वर्ग के हित-अहित का मामला नहीं है?

हमारे खयाल से- यह समाज के बहुसंख्यक वर्ग के हित एवं अहित का मामला है। इसे सिर्फ श्रमिकों या सिर्फ किसानों के सांचे में डाल कर देखना उनके संयुक्त एवं उनकी एकजुटता की सोच के विरूद्ध है। और इस मामले में पक्ष एवं विपक्ष या सत्तारूढ़ वर्ग और उसे हटा कर सत्ता पर काबिज होने वाले दलों की सोच में कोई खास फर्क नहीं है। सभी सवाल और सवालों के जवाब का दायरा एक ही है।

यदि हम यह सवाल करें, कि सरकार श्रम कानूनों और भूमि अधिग्रहण कानूनों को क्यों नया रूप देना चाहती है? तब ही हम समस्या के मूल चरित्र, उसके वर्गहित और उसे मौजूदा सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक ढांचे में हो रहे परिवर्तन के रूप में देख पायेंगे। और यही मोदी सरकार के काॅरपोरेट की सरकार के होने की शिनाख्त है। या कहिये, उसकी शिनाख्त करने का सही तरीका है।

मोदी जी ने जब से सत्ता संभाला है, उन्होंने सिर्फ और सिर्फ एक ही काम किया है- बाजारपरक अर्थव्यवस्था के निर्माण के लिये देश की अर्थव्यवस्था का निजीकरण और उसके अनुरूप राजनीतिक कार्यशैली का निर्माण

जिसकी आर्थिक दिशा- वित्तीय तानाशाही है, और

जिसकी राजनीतिक दिशा- राजनीतिक एकाधिकार है।

वास्तव में, यह राज्य की श्रेष्ठता का सिद्धांत है, जिसके तहत व्यक्ति राज्य एवं राज्य की सरकार के लिये होता है। उसके नैसर्गिक एवं वैधानिक अधिकारों के ऊपर राज्य के प्रति कर्तव्य की बाध्यकारी प्रतिबद्धता होती है। उसका निजी एवं सामाजिक जीवन राज्य की अमानत है। मूलतः वास्तविक लोकतंत्र उसके मिजाज से मेल नहीं खाता।

किंतु, बाजारवादी ताकतों ने दुनिया के ज्यादातर देशों की सरकारों को अपनी गिरफ्त में ले लिया है। इन्हीं ताकतों ने राज्य की सरकारों और उसकी वित्तीय संरचना में अपनी वरियता स्थापित कर ली है। चुनी हुई सरकारें भी उनकी गिरफ्त में आ गयी हैं।

भारत में मोदी की चुनी हुई सरकार भी उन्हीं वित्तीय- वैश्विक ताकतों की गिरफ्त में है। मोदी का ‘मेक इन इण्डिया‘ सही अर्थों में राष्ट्रीय एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियों, पूंजी निवेशकों के लिये निर्यात पर आधारित ऐसा कार्यक्रम है, जिसमें देश के प्राकृतिक संसाधनों का दोहन, मानव श्रम शक्ति का शोषण और सवा सौ करोड़ लोगों का खुलाबाजार है। जिसके लिये श्रम कानून एवं भूमि अधिग्रहण का संतुलन सरकार के जरिये वित्तीय ताकतों के पक्ष में मोदीजी की अनिवार्यता है।

तीसरी दुनिया में नव उदारवाद वास्तव में वैश्विक वित्तीय ताकतों की तानाशाही है। और इसी तानाशाही की बुनियाद भारत में नरेंद्र मोदी मजबूत कर रहे हैं, जिसकी पहल मनमोहन सिंह के उदारीकरण से की गयी। वो इस बात को अच्छी तरह जानते हैं, कि मनमोहन सरकार की केंद्र से विदाई और उनके नाम से जीते गये चुनाव में स्पष्ट बहुमत का क्या मतलब है। वो गहरे दबाव में हैं। गुजरता हुआ हर एक दिन उनकी विदाई की आशंका और जीत के डर के बीच से गुजर रहा है।

यही कारण है, कि मोदी सरकार हर हाल में अपनी प्रतिबद्धता का प्रदर्शन करती रहती है। वह बहुमत में होने के बाद भी अध्यादेशों का सहारा लेती है, ताकि उसकी प्रतिबद्धता वैधानिक औपचारिकताओं के जाल में न फंसे, और यदि फंस जाये तो राह निकालने या समझौते की स्थितियां बनाने का उसके पास समय हो। वह मनमोहन सरकार की नियति अपने लिये नहीं चाहती। वह आर्थिक पहल राजनीतिक जोड़-तोड़ और अपने इरादों की मजबूती दिखा कर, उसे देश और किसानों के हितों में दिखा कर, एक नकली लड़ाई का आयोजन कर रही है, जिसका लक्ष्य आम जनता को धोखे में डालना है।

नरेंद्र मोदी ने यह बात बहुत पहले ही स्पष्ट कर दी थी, कि ‘‘सरकार भूमि अधिग्रहण के मामले में पीछे नहीं हटेगी।‘‘ सरकार ही नहीं वित्तीय ताकतें भी इस बात को अच्छी तरह जानती हैं, कि ‘‘भूमि अधिग्रहण का विरोध होगा।‘‘ और यह विरोध स्वाभाविक है। लोकसभा में और लोकसभा से विधेयक के पारित होने के बाद भी विरोध जारी है। यह विरोध राजनीतिक और गैर राजनीतिक भी है। इस मामले में विरोध जारी है। यह विरोधी राजनीतिक और गैर-राजनीतिक भी है। इस मामलें में सरकार की नीति बिल्कुल साफ है, कि वह विरोध को अलग-अलग मोर्चों में बांट कर उसे गलत दिशा देगी, एक आम सहमति का दिखावा करेगी। सरकार समर्थक मीडिया मोदी के पक्ष में इस सीमा तक गाना गायेगी कि भूमि अधिग्रहण आर्थिक विकास की अनिवार्यता बन जायेगी। जिसका एक ही मतलब होगा, कि ‘‘किसानों को अपनी जमीन सरकार को सौंप देनी चाहिये।‘‘

कह सकते हैं, कि यह सरकार की अपनी शराफत है, जो टंगी हुई तलवार के नीचे होने के बाद भी दिखा रही है, लेकिन इस शराफत को छोड़ने में उसे वक्त नहीं लगेगा। अभी सरकार की कोशिश टंगी हुई तलवार और पूंजीवादी दिखावटी लोकतंत्र को बनाये रखने की है, ताकि सतह के नीचे वित्तीय ताकतें मजबूत हो जायें, और राष्ट्रवाद के जरिये राजनीतिक एकाधिपत्य स्थापित हो जाये।

केंद्र की मोदी सरकार के लिये काॅरपोरेट जगत में समर्थन है, और मीडिया मोदी जी को स्थापित करते हुए चल रही है, इसलिये प्रचारित सत्य यह है, कि देश की आम जनता का समर्थन भी मोदी जी के पास है। यह भरम फैला हुआ है, कि नरेंद्र मोदी जो भी कर रहे हैं, वह देश और देशवासियों के हित में है। लेकिन, भूमि अधिग्रहण विधेयक ने मौजूदा सरकार की विसंगतियों और उसका काॅरपोरेट जगत के लिये काम करने की नीतियों को उजागर करना शुरू कर दिया है।

उजागर होती विसंगतियां यदि वर्गगत राजनीतिक चेतना का रूप ले लेती हैं -जिसकी संभावना कम है- तो यह मोदी सरकार पर भारी पड़ेगा, और यदि ऐसा नहीं होता है, तो मोदी की नीतियों की सफलता देश और देश वासियों पर भरी पड़ेगी। वैसे वित्तीय तानाशाही और राजनीतिक एकाधिकार का बढ़ना तय है। क्योंकि प्रतिरोध का स्वरूप अनिश्चित है, और सरकार तथा मीडिया देश की आम जनता को मोदी जी के खेमे में खड़ा कर रही है, जहां वित्तीय तानाशाही और राजनीतिक एकाधिकार है। भले ही मोदी जी के लिये इण्डिया फस्र्ट है, संविधान धर्मग्रंथ है, देश भक्ति है, और सवा सौ करोड़ देशवासियों का कल्याण उनकी पूजा है।

अब बलि के लिये आम जनता कितनी तैयार है? देखना यही है।

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