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चेहरों की भीड़ – 9

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(पदार्थवादी सोच और भौतिकवादी चिन्तन धारा ने ही राजसत्ता के वर्ग चरित्र को बदलने और अपनी सामाजिक सम्बद्धता की लड़ाईयां लड़ी हैं। उसने राजसत्ता को समझने और समझाने की गंभीर पहल की है। यही कारण है कि उसके खिलाफ ज्यादातर देशों की सरकारें कल भी थीं और आज भी हैं। इसलिये, इस बात को स्वीकार करने में कोई हर्ज नहीं है कि समाज की स्वतंत्रता के बिना, साहित्य की स्वतंत्रता कोरी बकवास है।)

और बकवास करने में, जीवन, समाज और सम्पूर्ण सृष्टी को अथाह बनाने में, भाववादी चिन्तन धारा से आगे, अब तक कोई नहीं निकल सका है। उसके लिये जो दृश्य है, वह अदृश्य से तुच्छ है, कमतर ही नहीं भवसागर है, जी का जंजाल है। जिससे मुक्त होना और जो अदृश्य है, उसे ही परम मान कर, उसमें ही समाहित होना, जीवन का आदर्श है। वह सामाजिक विसंगतियों के प्रति उपेक्षा, निर्पेक्षता और असम्बद्धता के भावों को जन्म देता है। जिसका वास्तविक जीवन से कोई मतलब नहीं है।

इसके बाद भी वह राजसत्ता से सम्बद्ध है।

इसके बाद भी वह समाज को नियंत्रित करने वाला विधान है।

इसके बाद भी वह भौतिक जगत पर अपनी पकड़ को मजबूत बनाने और उसे अपने अधिपत्य में रखने की लड़ाईयां हर पल लड़ता रहता है। उसकी विसंगतियां उसके साथ लगातार बढ़ती और बड़ी होती रहती है। जिससे वह पार पाना नहीं चाहती। भाववादी चिन्तन धारा के पांव के नीचे ठोस जमीन नहीं है, और यही उसका अथाह जगत है। जिसकी थाह भी पदार्थवाद ही लगाता है। भौतिकवादी चिन्तन धारा भाववादी चिन्तन धारा का विलोम है। ऐसा विलोम है, जो उससे पूरी तरह मुक्त एवं स्वतंत्र समाज व्यवस्था है। वह छाया नहीं, वास्तविक है। जहां बकवास के लिये कोई न तो जगह है, ना ही गुंजाइशें हैं।

भाववाद का राजनीतिक चिंतन उस जगत को अपने नियंत्रण में रखने की सोच, विधान और समाज व्यवस्था है, जिसे वह मिथ्या मानता है।

यदि जगत मिथ्या है, तो जनाब, आप उसे हमारे लिये छोड़ दीजिये और अपनी राह पकडि़ये।

लेकिन, कहने पर भी वो ऐसा नहीं करते, दांत से पकड़ लेते हैं। कबीलों का समाज हो, सामंतों की दुनिया हो, चक्रवर्ती सम्राट या साम्राज्य का युग हो, वो भाववादी मिथ्या जगत को पकड़ने में लगे हैं। इतनी कमीनगी से और इतनी निर्ममता से उसे पकड़ने में लगे हैं, कि किसी कथा साहित्य का भयावह दानव भी, जो काम नहीं करता, उसे वो बेहिचक अंजाम दे लेते हैं। लोगों को मारने के जितने तरीके उन्होंने इजाद किये हैं, उतने तरीके जीवन की खुशहाली और मानव समाज को बचाने के लिये आज तक इजाद नहीं किये गये। उन्होंने वैश्विक संरचना को हत्यारा बना दिया है। उनकी समाज व्यवस्था ही क्रमिक हत्या की मशीन है।

वो जीने के लिये श्रम नहीं, जमा करने के लिये श्रम करते हैं। उनका श्रम दूसरों के श्रम को अपने पास जमा करने का ऐसा घिनौना श्रम होता है, जो वास्तव में श्रम नहीं, बल्कि श्रम का शोषण, प्रकृति का दोहन और उसे अपने खाते में दर्ज कराने और लगातार बढ़ाते रहने की ऐतिहासिक साजिश है। यह दूसरे को मार कर जीने का सुख है। चाबुक की फटकार और बंदूक की नाल से निकली हुई गोलियों को हत्यारों ने पीछे छोड़ दिया है। लोगों को गरीबी और अभावों से मारने की तकनीक विकसित कर ली गयी है।

भूख प्राकृतिक है और प्रकृति ने उसके समाधान की व्यवस्था भी दी है। लेकिन समाज व्यवस्था ने उसे जटिल बना दिया है।

भूख और युद्ध को भी जरिया बना लिया गया है। जो जहां है वहीं सम्पत्ति के लिये लड़ और लोगों को मार रहा है। आवाम और मुल्कों को मार रहा है। भाववादी चिंतन धारा को भी उसको माननेवालों ने विकृत कर दिया है। इतना विकृत कर दिया है, कि इतिहास के आईने में उसकी सूरत लगातार बिगड़ती और भयावह होती सूरत ही नजर आती है।

उसने समाज को शक्तिशाली और कमजोर वर्ग में बांटा।

दास और स्वामी के रूप में बांटा,

नस्ल और जाति में विभाजित किया,

शोषक और शोषितों में बांटा।

अपने सुख, सम्पदा और ऐश्वर्य को सामाजिक खुशहाली से ऊपर रखने का विधान बनाया। एक ऐसी समाज व्यवस्था का निर्माण किया जहां तर्कसंगत कुछ भी नहीं है।

उसने मुखौटों की ऐसी व्यवस्था बना ली है, जिसके पीछे सच की कोई सूरत ही नहीं है, और जो है, वह इतनी कुरूप है, कि उसे सौन्दर्य के किसी भी सांचे में ढ़ाला नहीं जा सकता। वह मानव विकास की विपरीत दिशा है। जिसे सामाजिक विकास की ऐतिहासिक दिशा करार दिया जाता है, और यह भी कहा जाता है, कि ‘हम विकास के चरम अवस्था की ओर बढ़ रहे हैं।‘ जबकि पतन और गर्त हमारे चारो ओर है। हमारे लिये, मानव समाज के लिये, असीम विस्तार की राहें अवरूद्ध हैं।

हम संकरी गलियों से जब भी निकलते हैं, हमारे सामने पतली सी सड़क होती है।

लोग समूह में हैं, और अकेले भी। सड़क खाली नहीं। और सड़क से गुजरता हर आदमी महसूस करता है, कि ‘यदि भीड़ इतनी है, तो सड़क को चैड़ा होना चाहिए।‘ भीड़ में समूह और अकेले आदमी की सोच एक सी हो जाती है। मुसीबत भी एक सी है, कि गलियां संकरी और सड़कें पतली हैं। जिसे विस्तार देने के लिये मकानों को पीछे धकेलना ही होगा। दुकानों को वहां से हटाना ही होगा। जो निजी है, उसे सामाजिक करने की जरूरत है। लेकिन पूरी व्यवस्था ही निजीकरण की चपेट में है। व्यक्ति का भी निजीकरण हो रहा है। देश और समाज और दुनिया निजीकरण के दायरे में दम तोड़ रही है। हम मुसीबत में हैं। और यह मुसीबतें हमारे अकेले की नहीं, हमें अकेला करने की है। और यह सरकारें कर रही हैं। बाजार के साथ मिल कर कर रही हैं।

किसी भी देश की समाज व्यवस्था के जीने की मियाद तब खत्म हो जाती है, जब सरकार जन-विरोधी हो जाती है। आज दुनिया की ज्यादातर पूंजीवादी सरकारें, या यूं कहें कि, मुक्त बाजारवादी सरकारें जन विरोधी हो गयी हैं। कह सकते हैं कि उन्होंने अपने होने, और अपने जीने की मियादें पूरी कर ली हैं, उन्हें खत्म हो जाना चाहिए। लेकिन वो खत्म नहीं होतीं, अपने को बनाये रखने की हारी हुई लड़ाई से लोगों की मुशिकलें बढ़ाती रहती हैं। आने वाले कल के लिये मुशिकलें पैदा कर देती हैं। वो सामाजिक विकास की राह में गन्दे कीचड़ की तरह इस कदर फैल जाती हैं, कि उन्हें लांघा नहीं जा सकता, बस उन्हें कुचल कर ही आगे बढ़ा जा सकता है।

लेकिन, यह आसान नहीं है।

मुशिकलें कई हैं, किंतु सबसे बड़ी मुश्किल यह है, कि सामाजिक रूप से लोगों को इस बात की जानकारी नहीं होती। हम निजी रूप से सामाजिक विसंगतियों को, आर्थिक असमानताओं को, राजनीतिक धोखेबाजी और दमन को झेलते रहते हैं, लेकिन सामाजिक हिस्सेदारी में हाथ तक नहीं बंटाते। यही कारण है, कि हम यह नहीं जानते कि जो है, उससे निजात पाया जा सकता है। या जो है, वह गलत है, और उसे बदला जा सकता है। हम अपने निजी अनुभव और ज्ञान को सामाजिक नहीं बनाते। उसकी जांच-पड़ताल इस रूप में नहीं करते, कि हमारे साथ जो हो रहा है, वह हमारे परिवेश में जीने वाले औरों के साथ भी हो रहा होगा, जहां भी दुनिया में ऐसी परिस्थितियां हैं, वहां भी ऐसा ही हो रहा होगा।

न जाने क्यों दुःख उठाने, या उसे भोगने के लिये, हम अपने को नायाब मान लेते हैं। हम मान लेते हैं, कि यही हमारे भाग्य में लिखा है, किस्मत में बदा है। यही विधि का विधान है। और समाज व्यवस्था भी भाववादी चिंतन धारा में अपरिवर्तनशील ईश्वरीय विधान बन जाता है। जिसे बदलने या बेहतर बनाने का अधिकार हमारे पास नहीं है। यदि कुछ है, तो उसे जीने की, उसे मानने की, और उसी के सांचे में खुद को ढ़ालने की अनिवार्यता।

अब साहित्य यदि इसी सांचे में ढ़ल कर निकलेगा, तो वह समाज के विकास और सामाजिक परिवर्तन की जिम्मेदारियों को कैसे पूरा कर पायेगा?

यदि समाज व्यवस्था का ढ़ांचा ही गलत है, तो उसमें ढ़ले साहित्य का स्वास्थ्य कितना सही होगा?

हमारी सोच सदियों से समाज व्यवस्था की दास है। हमारा जीवन उस पुर्जे की तरह है, जो जंग लगे मशीन के बीच फंसा है। हम जाम में फंसे हैं। बुरी स्थिति यह है, कि सड़क को चैड़ा नहीं किया जा सकता, वहां निजी घराने और दुकानें हैं, और ऐसी सरकारें हैं, जो प्रतिबंधों ओर प्रतिरोधों से भीड़ को नियंत्रित कर के, जो है उसे ही बनाये रखने और घरानों और दुकानों के लिये काम कर रही हैं। रचनायें रचानाकारों की तरह ही व्यवस्था के जाल में फंसी हैं।

यदि आप लीक से हटते हैं, सांचे को तोड़ते हैं, तो कहेंगे- ‘‘अव्यवस्था फैल रही है।‘‘

उनके पास अराजकता के खिलाफ, सिर तोड़ने के लिये हंथौड़ा है।

यदि आप उनके सांचे में ढ़लते हैं, तो आप परिवर्तन के राह की बाधाएं बनते हैं। जहां आपके लिये पुरस्कार और सम्मान तो है, मगर जगह नहीं है।

आने वाले कल का हंथौड़ा आपके सिर को तोड़ेगा, यह तय है।

खुले तौर पर कहें तो साहित्य की स्वतंत्रता के लिये, यदि आप आज की समाज व्यवस्था के सांचे में ढ़लने के खिलाफ हैं, तो सरकारें आपका सिर तोड़ेंगी। और यदि आप आज की समाज व्यवस्था के सांचे में ढ़लते हैं, तो आने वाला कल आपके सिर पर हंथौड़ा सा गिरेगा।

और किसी से शराफत की उम्मीद करना ही बेकार है।

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