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लीबिया अब एक देश नहीं!

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‘‘असल में, लीबिया अब एक देश नहीं बचा है‘‘, ‘डेमोक्रेसी नाउ‘ के संवाददाता शरीफ अब्देल कुद्दूस ने अपने हाल-फिलहाल की लीबिया यात्रा के बाद यह कहा। उन्होंने अपने रिपोर्ट में इस बात का उल्लेख खास तौर पर किया है, कि ‘‘वहां कोई सर्वमान्य सरकार नहीं है, जिसका नियंत्रण पूरे देश पर हो।‘‘

कुद्दूस ने लिखा- ‘‘असल में लीबिया टुकड़ों में बंटा हुआ जमीन का टुकड़ा मात्र है। वह फटे हुए चादर की तरह है, जहां शक्ति के लिये संघर्ष चल रहा है। जहां आम लीबियायी अपने अस्तित्व की रक्षा के लिये, क्षेत्रीय, राजनीतिक और कबिलाई मतभेदों के बीच जी रहा है।‘‘ उन्होंने लिखा- ‘‘वहां दो अलग-अलग गुटों का संगठन है, जो एक-दूसरे के विरूद्ध हैं। हर एक के पास अपनी सेना, अपना प्रधानमंत्री और अपनी सरकार है, और दोनों ही अपने वैधानिक होने का दावा करते हैं। यदि आप पूर्वी लीबिया के बएदा और टोब्रक में हैं, तो वहां अंतर्राष्ट्रीय रूप से मान्यता प्राप्त सरकार है, जिसके साथ जनरल खलीफा हफ्तार का समर्थन है, और यदि आप पश्चिमी लीबिया के त्रिपोली में हैं, जहां तेल मंत्रालय है, नेशनल आॅयल कारपोरेशन है, तो यहां मिलिशियायी गुटों द्वारा समर्थित स्वयंभू इस्लामी सरकार है, जिसके नीतिगत समझौते उन कट्टर इस्लामिक मिलिशियायी गुटों से भी हैं, जिन पर उसकी कोई पकड़ नहीं है।‘‘

यह संघर्ष जानलेवा है, यही कारण है कि इस क्षेत्र से बड़ी संख्या में पलायन हुआ है और इससे जो शून्यता यहां पैदा हुई है, उसने ‘इस्लामिक स्टेट‘ जैसे संगठनों को अपना विस्तार करने की नयी जगह दी है।

इन संघर्षों के बीच लीबिया का आम आदमी कहीं भी सुरक्षित नहीं है। शरीफ अब्देल कुद्दूस बताते हैं कि ‘‘एक ड्राइवर ने हमसे कहा- ‘पूर्वी लीबिया में वो मानते हैं, कि मैं फज्र हूं, जो कि लीबियन डाॅन है, पश्चिम में वो अनुमान लगाते हैं, कि मैं करामा हूं, जो कि जनरल हफ्तार समर्थक है, और दर्मा में वो मेरा सिर कलम करना चाहते हैं, क्योंकि वहां इस्लामिक स्टेट है। लीबिया अलग-अलग टुकड़ों में बंट गया है, जहां कई राज्य और कई सरकारें हैं।‘‘

लीबिया में यही अमेरिकी लोकतंत्र है, जिसे कर्नल गद्दाफी के तख्तापलट और हत्या के बाद स्थापित किया गया।

यही वो पेशेवर आतंकी, विद्रोही और अमेरिका समर्थित गद्दाफी विरोधी हैं, जो ‘अरब क्रांति‘ के अमेरिकी दूत हैं। जिन्हें पश्चिमी मीडिया आम लीबियावासी का प्रतिनिधि मानती रही है, और जिनके पक्ष में अमेरिकी नेतृत्व में नाटो देशों ने लीबिया पर हवाई हमले किये। उसे लम्बी लड़ाई के बाद खण्डहरों में तब्दील कर दिया। अब उन्हीं ‘अमेरिकी दूतों‘ के लिये बराक ओबामा इराक और सीरिया पर हमले की स्वीकृति पाने के बाद, चाहते हैं कि लीबिया पर भी हवाई हमले की स्वीकृति अमेरिकी कांग्रेस दे। ‘अल् कायदा‘ की तरह ‘इस्लामिक स्टेट‘ को मिटाने (बढ़ाने) के लिये बराक ओबामा सक्रिय हैं। उनकी नींद उड़ी हुई है। वो लीबिया में मर-कट रहे आम लीबियावासी और इसाईयों की हत्या के लिये ही चिंतित नहीं हैं, बल्कि लीबिया की अर्थव्यवस्था के लिये भी चिंतित, मित्रों के साथ सिर खपा रहे हैं।

7 फरवरी को अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली और स्पेन ने एक संयुक्त वक्तव्य जारी किया- ‘‘लीबिया में बैंकों का दीवाला निकल सकता है, यदि अंतर्राष्ट्रीय तेल बाजार में इसी तरह गिरावट जारी रहती है।‘‘ संयुक्त वक्तव्य में इस बात की चेतावनी दी गयी है, कि ‘‘यदि लीबिया की सुरक्षा व्यवस्था में सुधार नहीं हुआ तो उसकी पूरी अर्थव्यवस्था ही खतरे में पड़ जायेगी।‘‘ इस युद्ध ग्रस्त देश के बारे में उनकी चिंता परिस्थितियों को अपने हितों के सांचे में ढ़ालने की ऐसी कार्यवाही है, जिससे आतंकवाद और युद्ध के आतंक के बढ़ने की संभावनायें ही बनती हैं।

इस संयुक्त वक्तव्य में लीबिया से कहा गया है, कि ‘‘वह युद्ध विराम पर सहमत हो, और एक राष्ट्रीय सरकार के रूप में संगठित हो कर राष्ट्रसंघ द्वारा प्रस्तावित वार्ता में सहयोग दे।‘‘ लेकिन ऐसी स्थितियां बनती हुई नजर नहीं आ रही हैं। पूर्वी लीबिया और पश्चिमी लीबिया की सरकारों के अलावा अब लीबिया में ‘इस्लामिक स्टेट आॅफ इराक एण्ड सीरिया‘ के आतंकवादियों ने भी अपनी जगह बना ली है।

egpyt-beheadings15 फरवरी को ‘इस्लामिक स्टेट‘ ने मिस्त्र के 20 इसाईयों की हत्या का विडियो जारी किया। इससे पहले 12 फरवरी को इन लोगों की तस्वीर भी जारी की गयी थी, जिन्हें लीबिया के सिर्ते शहर में बंदी बनाया गया था। मिस्त्र ने लीबिया यात्रा पर प्रतिबंध लगा दिया है। इस्लामिक स्टेट ने पूर्वी लीबिया और मिस्त्र के सिनाई में अपनी गतिविधियां बढ़ा दी हैं। जिसके खिलाफ मिस्त्र की सेना उनके ठिकानों पर हवाई हमले कर रही है। एक मिस्त्री कमाण्डर ने कहा कि ‘‘लाॅयल लीबियन फोर्स भी इस्लामिक स्टेट के खिलाफ अपने देश में सैन्य कार्यवाही कर रही है।’’

मिस्त्र के सरकारी टीवी ने कहा है, कि ‘‘लीबिया में किये गये हवाई हमलों में इस्लामिक स्टेट के 50 आतंकवादी मारे गये हैं।‘‘ सेना ने टेलीविजन स्टेटमेंट जारी कर, जानकारी दी कि ‘‘भोर में किये गये हमले के दौरान आईएस के कैम्प, प्रशिक्षण क्षेत्र और हंथियारों के गोदामों को निशाना बनाया गया।‘‘

मिस्त्र के विदेश मंत्रालय ने जारी वक्तव्य में आईएस आतंकवादियों के खिलाफ ‘इंटरनेशनल काॅलिजन‘ की बात कही है। वक्तव्य में लीबिया में सक्रिय ‘दाएश’ (आईएस) आतंकी संगठन और अन्य आतंकी गुटों के खिलाफ जरूरी कदम उठाने की पेशकश भी की गयी है।

जनरल खलीफा हफ्तार ने मिस्त्र के टीवी चैनल ‘ड्रीम‘ को दिये एक फोन इण्टरव्यू में कहा, कि ‘‘ मिस्त्र की सेना के द्वारा हस्तक्षेप कर के दाएश (आईएस) और अन्य आतंकी गुटों पर हवाई हमलों का वो समर्थन करते हैं।‘‘ लीबिया के युद्धक विमानों ने इसी दौरान मध्य लीबिया के शहर सिर्ते और बेन जवद पर हवाई हमले किये। इससे पहले लीबिया की सेना ने मिस्त्र के युद्धक विमानों का साथ देर्ना में हवाई हमले में दिया।

फ्रांस और मिस्त्र ने राष्ट्रसंघ सुरक्षा परिषद की एक बैठक बुलाई और कहा, कि ‘‘इस्लामिक स्टेट के खिलाफ नये उपाए किये जायें।‘‘ मिस्त्र के विदेश मंत्रालय ने लीबिया में मिस्त्र के नागरिकों के प्रवेश पर रोक लगा दिया है।

मिस्त्र के द्वारा लीबिया पर किये गये हवाई हमलों में, भले ही इस्लामिक स्टेट के आतंकवादियों के ठिकानों पर हमले का दावा किया गया है, मगर 7 लीबियायी नागरिकों के मारे जाने की खबर है, जिनमें 3 बच्चे भी हैं।

लीबिया के मामले में मिस्त्र और यूरोपीय देश बराक ओबामा की तरह ही बातें कर रहे हैं, जो दुनिया में कहीं भी इस्लामिक स्टेट के खिलाफ कार्यवाही करने का व्यापक अधिकार अमेरिकी कांग्रेस से मांग रहे हैं। जिससे इस बात की आशंका पैदा हो गयी है, कि अमेरिका के निशाने पर सीरिया के बाद अब लीबिया है। मिस्त्र के माध्यम से उसने एक नया मोर्चा खोल दिया है।

मिस्त्र के द्वारा लीबिया पर किया गया यह हमला पहला नहीं है। इससे पहले अगस्त में भी संयुक्त अरब अमिरात के साथ मिल कर उसने त्रिपोली पर हवाई हमला किया था, जिससे मिस्त्र की सरकार इंकार करती रही है। यह हमला उसने तब किया था, जब ‘लीबियन डाॅन‘ त्रिपोली और वहां की संसद को अपने कब्जे में लेता जा रहा था। ‘लीबियन डाॅन‘ एक संयुक्त गठबंधन है, जहां मुस्लिम ब्रदरहुड की वरियता है, और मिस्त्र में मुस्लिम ब्रदरहुड राष्ट्रपति अल-सिसि के विरोधी हैं। जिन्हें अदालतों के जरिये फांसी की सजायें दी जा रही हैं। इसलिये 16 फरवरी को जब मिस्त्र ने लीबिया पर हवाई हमले की शुरूआत की त्रिपोली के मुस्लिम ब्रदरहुड बाहुल्य संसद ने उसकी निंदा की, और उसे लीबिया की सम्प्रभुसत्ता का उल्लंघन करार दिया।

जबकि, लीबिया की सम्प्रभुसत्ता का उल्लंघन कर्नल गद्दाफी के लीबिया पर किये गये नाटो हमलों से, बहुत पहले हो चुका है। अब तो लीबिया उन हत्यारों के कदमों पर पड़ा है, जो मानते हैं कि ‘लीबिया में विदेशी जूतों की जरूरत है‘। वो हवाई हमलों के साथ जमीनी कार्यवाही करना चाहते हैं।

16 फरवरी को पूर्व नाटो प्रमुख एण्डर्स फोघ रासमस्सन ने ब्रिटेन के ‘टीवी चैनल 4‘ पर कहा- ‘‘लीबिया की जमीन पर विदेशी जूतों की जरूरत पड़ेगी।‘‘ उन्होंने कहा- ‘‘हमारा छोटा सा जवाब है, कि आप सिर्फ हवाई हमलों से अपना काम लीबिया में पूरा नहीं कर सकते, आपको वहां जूतों की जरूरत पड़ेगी।‘‘ उन्होंने खुद से सवाल किया और उसका जवाब दिया कि ‘‘सवाल सिर्फ एक है- ‘किसके जूतों की जरूरत पड़ेगी?‘ और इस बारे में मेरा मानना है, कि उस क्षेत्र के देशों को इस तरह की सैन्य कार्यवाही में बड़ी भूमिका निभानी चाहिए, लेकिन वो ऐसा तब तक नहीं कर सकते, जब तक पश्चिमी ताकतें उनका समर्थन नहीं करेंगी।‘‘

यह बात विश्व समुदाय के लिये सबसे घिनौनी और शर्मनाक है, कि अमेरिकी सरकार, पश्चिमी देश और नाटो सैन्य संगठन के लिये लीबिया की समस्या का समाधान -जिसे उन्होंने ही पैदा किया- सिर्फ सैन्य कार्यवाही है। मिस्त्र ने कहा है, कि ‘‘लीबिया को दूसरे अन्तर्राष्ट्रीय हस्तक्षेप की जरूरत है।‘‘

फ्रांस की सरकार ने मिस्त्र को अपना समर्थन देते हुए 16 फरवरी को मिस्त्र को राफेल लड़ाकू बमवर्षक विमान देने के समझौत पर हस्ताक्षर किया, जिसके तहत 24 लड़ाकू बमवर्षक विमानों की आपूर्ति होनी है। काहिरा ने लीबिया के दो सरकार और ‘एक-दूसरे के विरोधी‘ प्रधानमंत्रियों में से, एक अब्दुल्लाह थिनि को अपना समर्थन देने की घोषणां की है।

18 फरवरी को राष्ट्रसंघ सुरक्षा परिषद की आपात बैठक में मिस्त्र के विदेश मंत्री समिह शुक्री ने लीबिया पर लगाये गये हंथियारों की आपूर्ति-प्रतिबंधों को हटाने की मांग की। जिसका समर्थन लीबिया के विदेश मंत्री मोहम्मद अल दायरि ने किया। मिस्त्र के विदेश मंत्री ने कहा, कि ‘‘भले राष्ट्रसंघ के विशेष दूत लीबिया में शांति के लिये समझौता वार्ता चला रहे हैं, लेकिन वर्तमान लीबिया की स्थिति ऐसी है, कि लीबिया की सेना को हथियारबद्ध करना, पहले से भी ज्यादा जरूरी हो गया है।‘‘

2011 में लीबिया पर हथियारों की खरीदी एवं उसे हथियार बेचने पर प्रतिबंध लगाया गया था। जिसे अब मिस्त्र किसी भी कीमत पर हटवाना चाहता है, ताकि वह लीबिया में अपने समर्थन की सरकार को मजबूत कर सके।

अमेरिका ने इस प्रस्ताव पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा, कि- ‘‘अमेरिका दूसरे देशों के अपने खुद के सुरक्षा व्यवस्था और अपनी सुरक्षा के निर्णय के अधिकार का सम्मान करता है।‘‘ यह सम्मान कितना वास्तविक और किन चालबाजियों से भरा है? आसानी से समझा जा सकता है।

ब्रिटिश विदेश सचिव फिलिप हैमण्ड ने कहा, कि- ‘‘समस्या यह है, कि लीबिया में ऐसी सरकार नहीं है, जो कि प्रभावशाली और अपनी क्षेत्रीय सुरक्षा को नियंत्रित कर सके। वहां ऐसी सेना भी नहीं है, जिसे विश्व समुदाय प्रभावी ढ़ंग से समर्थन दे सके।‘‘ उन्होंने आगे कहा, कि ‘‘किसी एक पक्ष को हथियारों की आपूर्ति से इस अरब देश की समस्या का समाधान नहीं हो सकता।‘‘ असल में लीबिया की समस्या वहां हथियारों की कमी नहीं, बल्कि वहां सरकार का न होना है। उन्होंने जोर दे कर कहा कि ‘‘हम इस बात पर विश्वास नहीं करते कि सैन्य कार्यवाही से लीबिया की समस्या का समाधान हो सकता है।‘‘ उनकी सोच है, कि ‘‘लीबिया में एक राष्ट्रीय संयुक्त सरकार की स्थापना से ही आतंकी गुटों के खिलाफ संघर्ष करने में सहयोग होगा।‘‘ उन्होंने स्पष्ट किया, कि ‘‘राष्ट्रसंघ सुरक्षा परिषद हथियारों पर लगे प्रतिबंधों को तब तक समाप्त नहीं करेगी, जब तक कि लीबिया में एक संयुक्त सरकार की स्थापना नहीं हो जाती है।‘‘

लीबिया में हो रहे भयानक हिंसा की वजह से, पिछले महीने मिस्त्र के लोगों का पलायन बड़ी संख्या में, लीबिया से हुआ। अपनी जान बचाने के लिये भागे इन मिस्त्रवासियों के पास अपने देश में कोई काम नहीं है। अब उनके सामने लीबिया जा कर जान का जोखिम उठाने या मिस्त्र में अपने घरों में बैठ कर बेकार रहने का निर्णय लेने की विवशता है।

मार्च के पहले सप्ताह में मिस्त्र की सरकार ने कहा, कि ‘‘लीबिया से 33,000 देशवासी अपने घर लौट आये हैं। यह आंकड़ा 15 फरवरी को जारी इस्लामिक स्टेट के वीडियो के बाद का है। जिसमें मिस्त्र के 20 कामगरों की हत्या की गयी है। उस समय लोगों ने जान बचाने के लिये लीबिया से भागना कुबूल किया, लेकिन अब उनके सामने मिस्त्र में रोजी-रोजगार की समस्या है।

साल 2011 से मिस्त्र के हजारों लोग काम की तलाश में लीबिया गये, बावजूद इसके कि वहां अस्थिरता फैली थी और सैकड़ों हथियारबद्ध मिलिशियायी गुट अपना नियंत्रण स्थापित करने की लड़ाईयां लड़ रहे थे। लीबिया में मिस्त्र के लोगों के लिये स्थिति तब नियंत्रण से बाहर हो गयी, जब पिछले साल दिसम्बर में इस्लामिक स्टेट से सम्बद्ध अंसार-अल-सरिया आतंकी गुट ने 13 और कुल 20 मिस्त्र के कामगरों का सिर्ते शहर में अपहरण कर लिया।

27 वर्षीय आतिफ साद मोसाद, जो कि जुलाई 2013 में लीबिया गये थे और जनवरी में वापस अपने देश आ गये, ने कहा, कि ‘‘आईएसआईएस अंसार-अल-सरिया का अभिन्न अंग है। दोनों मिल कर काम करते हैं, लेकिन वहां अंसार-अल-सरिया का नियंत्रण है।‘‘ जिनके नियंत्रण में सिर्ते के साथ-साथ त्रिपोली और लीबिया का सबसे बड़ा दूसरा शहर बेंघाजी पूरी तरह से है।

मिस्त्र के द्वारा सिर्ते पर किये गये हवाई हमले के बाद इस्लामिक नेतृत्व वाला मिलिशिया गुट- फज्र लीबिया, जिसका नियंत्रण त्रिपोली और लीबिया के प्रमुख शहरों पर है, ने लीबिया से मिस्त्र के लोगों को बाहर निकालने की बात की।

मोसाद ने बताया, कि ‘‘अपहरण के समय लीबिया में मिस्त्र के दूतावास का रवैया भी हमारे लिये उपेक्षा का था। किसी ने हमारी मदद नहीं की, सिवाये एक लीबियायी व्यक्ति के, जिसने हमारे अलावा कई इसाईयों को अपने घर में 15 घंटों तक छुपा कर रखा।‘‘

मिस्त्र के हजारों कामगरों में से ज्यादातर लोग लीबिया में कन्सट्रक्शन और क्राॅफ्ट सेक्टर में काम करते हैं। अपने देश की बद्त्तर आर्थिक स्थितियों की वजह से युवा मिस्त्रवासी इस युद्धग्रस्त क्षेत्र में आज भी काम की तलाश में आते हैं। स्थितियां इतनी बद्त्तर हैं, कि लीबिया से वापस आये लोग अब भी मिस्त्र से वापस लीबिया जाना चाहते हैं।

इश्हाक नाम के एक मिस्त्री कामगर ने कहा- ‘‘मिस्त्र में हमारे लिये काम के अवसर ही नहीं हैं। हम वापस लीबिया जायेंगे, फिर चाहे हम जीयें या मरें। हम वहां जा कर मरना कुबूल करेंगे, बजाये यहां रह कर भूख से मरने के।‘‘ वो लीबिया की स्थिति में सुधार चाहते हैं। वो यह मानते हैं, कि उनका देश (मिस्त्र) उनकी कोई मदद नहीं करेगा।

पिछले महीने मिस्त्र की सरकार ने कहा था, कि ‘‘लीबिया से लौटे लगभग 30,000 देशवासियों के काम की व्यवस्था की जायेगी।‘‘ मिस्त्र के मानव संसाधन मंत्रालय ने ऐसे लोगों को क्षतिपूर्ति देने की बात भी की है। मंत्रालय का अनुमान है, कि ‘‘80 हजार से 1 लाख मिस्त्र के लोग काम पाने के लिये संघर्ष कर रहे हैं।‘‘ जिसके मिलने की उम्मीद नहीं बनती। इसलिये, उनके सामने फिर से लीबिया जाने का जोखिम उठाने के अलावा और कोई रास्ता ही नहीं है।

लेकिन, लीबिया में अब कोई सरकार ही नहीं है, और मिलिशियायी और आतंकी गुटों के साथ पूर्वी लीबिया और पश्चिमी लीबिया की सरकारों के बीच भी संघर्ष जारी है। बराक ओबामा हमले की स्वीकृति चाहते हैं, पश्चिमी ताकतें दूसरे सैन्य हस्तक्षेप की मांग के पक्ष में हैं, और मिस्त्र हवाई हमले कर रहा है। ओबामा की खूनी ख्वाहिशें बढ़ती जा रही हैं।

यह उल्लेखनीय है, कि 20 मार्च 2011 को नाटो सेना ने लीबिया पर हवाई हमले की शुरूआत की थी। और यह भी उल्लेखनीय है, कि 20 मार्च 2003 को अमेरिकी नेतृत्व में बहुराष्ट्रीय सेना ने इराक पर हमला किया था।

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